दिल्ली में सांस लेना हुआ दुभर

आपको जान कर हैरानी होगी कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया संस्थानों में पर्यावरण को लेकर कोई डेस्क नहीं है, जहां पर्यावरण जैसे गंभीर मसले पर रिपोर्टिंग करने वाले विषय की समझ रखने वाले पत्रकारों की तैनाती हो

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल तकरीबन 12 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण के कारण होती है। जिसकी वजह से देश की जीडीपी में 03 फीसदी का नुकसान होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसके पीछे खेतों की पराली, गाड़ी से निकलने वाले धुआं, फॉसिल फ्यूल और इंडस्ट्री से निकलने वाले धुएं को बढ़ते प्रदूषण का जिम्मेदार माना है। यही कारण है कि प्रदूषण ना सिर्फ दिल्ली के लिए बल्कि समूचे विश्व के लिए एक चिंता का विषय बना हुआ है।

उज्ज्वल मिश्रा अर्नव

प्रदूषण दिल्ली, पंजाब, हरियाणा के साथ-साथ पूरे उत्तर भारत के लिए भी मुसीबत बन चुका है। यह दिल्ली के आलावा उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड और पश्चिम बंगाल को भी सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। केंद्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2019 में वाराणसी को देश के सबसे प्रदूषित शहरों की श्रेणी में रखा गया था। हालांकि दिल्ली अक्सर केंद्र में होती है। कारण है दिल्ली में मीडिया का केंद्र होना जिसके वजह से प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही दिल्ली को ही ज्यादातर केंद्रित किया जाता है। परन्तु एक सच्चाई यह भी है कि जब प्रदुषण का स्तर बेहद ही खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है तब सरकार को या फिर मीडिया को इस विषय को उठाने का मौका मिलता है उससे पहले ना ही मीडिया पर्यावरण को लेकर कभी सजग रही है ना ही सरकारें।

आंकड़े – आपको बता दें कि “IQAir” की 2020 “वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट” में 106 देशों के प्रदूषण स्तर की जांच की गई जिसमें दुनिया के 50 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 35 भारत में पाए गए। जिसमें दिल्ली को 10 वें सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर और दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी बताया गया है। लिहाजा यह एक बेहद ही चिंताजनक स्थिति है। कुछ रिपोर्ट्स तो यह कहती हैं कि दिल्ली में रहने वाले लोगों की आयु वहां की प्रदूषित हवा के कारण 10 वर्ष कम हो रही है। लोगों के फेफड़े वक्त से पहले खराब होने लगते हैं वहीं उन्हें आगे चलकर अस्थमा जैसी समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। हालाँकि, दिल्ली की वायु गुणवत्ता में वर्ष 2019 से वर्ष 2020 के बीच लगभग 15% का सुधार दर्ज किया गया है।

राजधानी दिल्ली में जब कभी प्रदूषण का स्तर अधिक हो जाता है तो यहां सरकार द्वारा एक (GRADED RESPONSE ACTION PLAN) को लागू कर दिया जाता है। जिसके अंर्तगत प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए दिल्ली में फैक्ट्रियां , कंस्ट्रक्शन वर्क के साथ साथ स्कूलों को बंद कर दिया जाता है , साथ ही ऑड-इवेन जैसे फार्मूले लागू कर दिए जाते हैं। जिससे प्रदूषण को कम करने में बहुत कम ही सही पर मदद
मिलती है।

प्रमुख कारण – दिल्ली में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण शहर की लैंडलॉक भौगोलिक स्थिति के साथ साथ पड़ोसी राज्यों (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में पराली जलाने की घटनाएँ , वाहन उत्सर्जन , औद्योगिक प्रदूषण , बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियाँ मुख्य रूप से शामिल हैं। मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंसेज के अंर्तगत आने वाली एक एजेंसी “SAFAR” अर्थात (सिस्टम ऑफ एयर क्वॉलिटी & वेदर फॉरकेस्टिंग) ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के पीछे 46 % ज़िम्मेदार “पराली” को माना है। आपको बता दें कि यह एजेंसी वायु गुणवक्ता की जांच कर उस पर रिसर्च करती है , और प्रदूषण के पीछे की मुख्य वजह का पता लगा कर अपना रिपोर्ट्स तैयार करती है। पड़ोसी राज्य जैसे पंजाब और हरियाणा में अक्सर किसान अपने समय और पैसे बचाने के लिए खेतों की पराली जला देते हैं। जिससे की पराली का धुंआ सीधे दिल्ली की तरफ आने लगता है और उसके कारण दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पिछले साल नवंबर में जब पराली (Stubble) जलाए गए उस पूरे समय में दिल्ली में PM 2.5 का औसत स्तर 144 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया था। जबकि, दिसंबर में यह 157 माइक्रोग्राम्स प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा शहर के 15 स्थानों पर “एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन” का निर्माण किया गया है। यह तकनीक शहर के प्रदूषित वातावरण में धूल के कणों का पता लगाती है। साथ ही इसकी मदद से पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली जहरीली गैसों का भी पता लगाया जा सकता है। कुछ रिपोर्ट्स की मुताबिक ये उपकरण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले छह हानिकारक कारकों को भांप कर समय से पर्यावरण प्रदूषण पर लगाम लगाने में कारगर साबित हो रहे हैं।

फिलहाल वाराणसी के पंद्रह जगहों पर एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन बनाए गए हैं जिसमें “तरना, पंचक्रोशी मार्ग, पड़ाव, कैंट स्टेशन, अर्दली बाजार, बौलिया, कंदवा, BHU, आदमपुर, भेलूपुर, मलदहिया, चितरंजन पार्क, मंडुवाडीह, शास्त्री चौक और सारनाथ ” शामिल है। यहां की हवा को साफ बनाए रखने के लिए इसकी निगरानी “रियल टाइम एम्बिएंट एयर क्वालिटी मानिटरिंग स्टेशन” से की जाती है और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) की सूचना हर दस मिनट पर कंट्रोल रूम में भेजी जाती है। इस तकनीक में छह तरह के अत्याधुनिक सेंसर लगे हुए हैं जो कि शहर की वायु में प्रदूषणों के मानकों की रियल टाइम सूचना कंट्रोल रूम को देते हैं। लिहाजा मुझे लगता है कि इस तरह के उपाय अन्य राज्य सरकारों को भी करना चाहिए जिससे कि बढ़ते प्रदूषण पर रोक लगाया जा सके।

आपको जान कर हैरानी होगी कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया संस्थानों में पर्यावरण को लेकर कोई डेस्क नहीं है, जहां पर्यावरण जैसे गंभीर मसले पर रिपोर्टिंग करने वाले विषय की समझ रखने वाले पत्रकारों की तैनाती हो। यहां तक की सरकारों की भी नींद तभी खुलती है जब स्थिति भयावह हो जाती है। कारण हमारा चुनाव करना भी है। जब तक आप और हम जैसे लोग पर्यावरण जैसे विषय की गंभीरत को नहीं समझेंगे और निरर्थक मुद्दों पर सरकार चुनते रहेंगे, तब तक ऐसा ही होता रहेगा। हमें कहीं न कहीं गंभीर और महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार का चुनाव करना होगा जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य , रोजगार, गरीबी और पर्यावरण शामिल हों। साथ ही पर्यावरण के प्रति हमें भी सजग होना होगा। जितना हो सकें यातायात के साधनों का प्रयोग करें , बदलते वक्त के साथ साथ पेट्रोल डीजल वाहनों की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग करें अपने आस पास ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाएं ताकि हम अपने आने वाले भविष्य को एक बेहतर पर्यावरण दे सकें।

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