मशरूम उत्पादन में अव्वल बन सकता है झारखंड

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पद्मश्री अशोक भगत 

झारखंड में यदि मशरूम की व्यावसायिक खेती की जाए, तो यह स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति बदल सकता है. हालांकि हाल के दिनों में इस दिशा में थोड़ा काम हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यापारिक योजना के तहत इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है. 

विकासशील देशों में भारत तेजी से आगे की ओर बढ़ रहा है. एक अनुमान में बताया गया है कि आने वाले 10 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था चीन को पछाड़ कर दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बन जायेगी. अब यहां गुणवत्तापूर्ण विकास की बात होने लगी है. विगत कुछ वर्षों में सरकार ने खाद्य गुणवत्ता पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. प्रधानमंत्री लगातार श्रीअन्न की बात कर रहे हैं. ऐसे में हमारे लिए मशरूम एक बेहतर विकल्प प्रदान कर सकता है. मशरूम का न केवल आसानी से, अपितु कम लागत पर उत्पादन किया जा सकता है. इसके लिए भारत की जलवायु भी बेहद सकारात्मक मानी जाती है. दुनिया में बड़ी संख्या में कवक पाये जाते हैं. अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, पूरे विश्व में 15 लाख कवक हैं, जिसमें से केवल 11 लाख कवक का ही अब तक अध्ययन हो पाया है. उनमें से 14,000 कवक मशरूम हैं, जिनमें से मात्र 3,000 ही खाने योग्य है. अमेरिका और यूरोपीय देशों ने केवल बटन मशरूम पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया है. उसी प्रकार जापान, चौन आदि देशों ने शिटेक और ओरिकुलेरिया जैसे मशरूमों के उत्पादन पर अपना ध्यान केंद्रित किया है. इसके अलावा भी कई ऐसे मशरूम हैं, जो न केवल खाने में स्वादिष्ट होते हैं, अपितु स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पोषक हैं.
 
मशरूम में भरपूर मात्रा में फाइबर, सेलेनियम, विटामिन सी, विटामिन डी जैसे पोषक तत्व पाये जाते हैं. एंजाइम से परिपूर्ण मशरूम का इस्तेमाल करने से कई बीमारियां दूर रहती हैं. इनमें एंटीबायोटिक पाये जाते हैं, जो हमारे शरीर में नयी कोशिकाओं का निर्माण करते हैं. चीन में इसे महाऔषधि माना जाता है, तो रोम में लोग इसे ईश्वर  का आहार मानते हैं, मशरूम में लीन प्रोटीन होता है, जो वजन घटाने और मांसपेशी बनाने के लिए आदर्श है. फंक्शनल फूड सेंटर द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट की मानें, तो डायबिटीज के मरीजों के लिए मशरूम आदर्श आहार है. इसमें न फैट होता है, न कोलेस्ट्रॉल. कार्बोहाइड्रेट भी इसमें न के बराबर होता है, जबकि प्रोटीन, विटामिन और खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं. यह हड्डियों को भी मजबूत बनाता है. इसमें प्राकृतिक इंसुलिन है, जो डायबिटीज के रोगियों के लिए वरदान है. 

मशरूम में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट्स हानिकारक रेडिकल्स से बचाते हैं. इसमें एगोंथायोनीन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने में बहुत प्रभावी है. दिल की बीमारी में यह वरदान है, तो कैंसर के रोगियों के लिए यह दैवीय औषधि से कम नहीं है. जापान में किये गये एक शोध के अनुसार, मशरूम के सेवन से प्रॉस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है. इधर मशरूम उत्पादन में क्रांति आयी है. वर्ष 1960 में वैश्विक स्तर पर मशरूम का उत्पादन केवल 1.7 करोड़ टन था, जो वर्तमान में बढ़ कर चार करोड़ टन तक पहुंच गया है. इसका अत्पादन लगातार बढ़ रहा है. पिछले दशक में इसके उत्पादन में 200 गुना से अधिक वृद्धि हुई है और उम्मीद की जा रही है कि 2050 तक इसका उत्पादन 10 करोड़ टन तक पहुंच जायेगा. गुणवत्तापूर्ण मशरूम उत्पादन में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. यह न केवल गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न की समस्या का समाधान करेगा, अपितु ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगा. भारत का वातावरण मशरूम उत्पादन 
की दृष्टि से बेहद अनुकूल माना जा रहा है. झारखंड की बात करें, तो यहां मशरूम पहले से ही खाद्य शैली का अंग रहा है. झारखंड और अगल-बगल के वन क्षेत्रों में बारिश के दिनों में एक खास प्रकार का जंगली मशरूम मिलता है. इसे स्थानीय भाषा में खुखड़ी कहा जाता है. गुणवत्ता और स्वाद की दृष्टि से खुखड़ी का कोई विकल्प नहीं, लेकिन यह सीमित समय में प्राप्त होता है. झारखंड में यदि मशरूम की व्यावसायिक खेती की जाए, तो यह स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति भी बदल सकता है. हालांकि हाल के दिनों में इस दिशा में थोड़ा काम हुआ है, लेकिन बड़े पैमाने पर व्यापारिक योजना के तहत इस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है. 

इसके उत्पादन से ग्रामीणों में कुपोषण की समस्या का समाधान तो होगा ही, इसका व्यापार कर लोग बढ़िया आमदनी भी कर सकते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल झारखंड में सालाना लगभग 50 टन मशरूम का उत्पादन हो रहा है. लेकिन यहां इसके उत्पादन की अपार संभावना है. बिहार की तुलना में झारखंड की जलवायु मशरूम उत्पादन के लिए बेहतर है, लेकिन बिहार देश का प्रथम मशरूम उत्पादक राज्य बन गया है, जबकि झारखंड अभी बहुत पीछे है. इसके लिए यहां बेहतर आधारभूत संरचना की जरूरत है. दूसरी यहां की सबसे बड़ी समस्या चूहा है, जो मशरूम का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है. झारखंड के किसान इस दृष्टि से पिछड़ रहे हैं. यदि मशरूम की खेती पर ध्यान दिया जाए, तो झारखंड देश का प्रथम मशरूम उत्पादक राज्य बन सकता है. इसके लिए सरकार को भी इस दिशा में थोड़ा ध्यान देना होगा. 

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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