-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) को परिवर्तनकारी समझौता कहा है। वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, इस फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से हर साल करीब 4 अरब यूरो (43 हजार करोड़ रुपए) के टैरिफ कम होंगे और लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए मौके बनेंगे। इस वक्त भारत और ईयू मिलकर वैश्विक जीडीपी का करीब 25% और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अपने पास रखते हैं।
कहा जा रहा है कि यह समझौता व्यापार संबंधों में विविधता लाने और अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करने में मदद करेगा, इससे हर साल ड्यूटी में चार अरब यूरो की बचत होगी। अब ये बचत वास्तव में कितनी सच होगी ये आनेवाला वक्त बताएगा, किंतु आज बड़ा सवाल है कि हम चीन की तुलना में ईयू को अपना सामान बेचने के लिए कितने तैयार हैं। इसके लिए जो कुशल ब्रेन चाहिए, क्या वह हमारे भारत में रुक पा रहे हैं?
आंकड़ें आज बता रहे हैं कि पिछले एक वर्ष (2024-25) में भारत का ईयू के साथ व्यापार अधिशेष लगभग अमेरिकी डॉलर 15.2 बिलियन रहा। इसके हिसाब से संतुलन लाभ लगभग +11% से +13% अनुमानित है। जबकि चीन के ईयू के साथ व्यापार में बहुत बड़ा सरप्लस है– यूरोस्टाट के आंकड़ों के मुताबिक ईयू ने चीन को लगभग यूरो 513-€517 बिलियन के माल इंपोर्ट किया और लगभग यूरो 213 बिलियन के एक्सपोर्ट किए, जिससे लगभग यूरो 300+ बिलियन का ‘ट्रेड डेफिसिट’ (यानी चीन को अधिशेष) रहा। इसे प्रतिशत में देखें तो लगभग +58% से +60% के आसपास चीन का बड़ी मात्रा में एक्सपोर्ट के कारण लाभ माना जा सकता है। तुलनात्मक रूप से एक वर्ष में यदि भारत का लाभ +12% है तो चीन हमसे कई गुना आगे है, उसका लाभ +58% पर है।
ग्वालियर के रहनेवाले दो भाइयों की कहानी हमारे सामने है, सनू और मनू । मनू ने पढ़ाई पूरी की और वो आज सैन फ्रांसिस्को में गूगल के साथ है। आनेवाले समय में हो सकता है, वो हमेशा के लिए वहीं बस जाए! उसका छोटा भाई सनू जिसका हाल ही में इसरो से जुड़े अध्ययन संस्थान में सिलेक्शन हुआ, किंतु उसने वहां जाना उचित नहीं समझा। घरवालों ने लाख समझाया, मां तो इस बात से दुखी है, बेटा सुन नहीं रहा। भविष्य में इसरो का वैज्ञानिक बनता बेटा, कितने गर्व की बात होती! किंतु दूसरी ओर सिस्टम का नकारापन और व्यवस्था का दोष भारत की युवा पीढ़ी के सिर चढ़कर बोल रहा है!
हर साल देश छोड़कर जानेवाली तमाम प्रतिभाओं की तरह उसका भी कहना है कि भारत में योग्यता के साथ न्याय नहीं होता, किसी ओर का नहीं अपने परिवार में मैं ऐसे कई उदाहरण देख चुका हूं। इसलिए मैं भी विदेश ही जाऊंगा, जहां व्यक्ति का चयन उसकी योग्यता और प्रतिभा के आधार पर होता है! निश्चित ही मनू जैसे भारत छोड़ चुके और सनू जैसे युवा जो भारत छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं, इन तमाम प्रतिभाओं के पलायन के आंकड़े आज हमें डरा रहे हैं।
विदेश मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2020 में 85 से 94 हजार भारतीयों ने विदेशों में नागरिकता या दीर्घकालिक रेजिडेंसी ली थी, तीन साल बाद 2023 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 3.98 लाख हो गई। 2024 में 19 नवम्बर तक ही यह आंकड़ा 3.48 लाख पार करता दिखा। 2024 में 2.06 लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ी, जो भले ही 2023 के 2.16 लाख से थोड़ा कम है, किंतु दो लाख से ऊपर बने रहना इस संकट की गंभीरता को दिखाता है। पिछले 14 वर्षों में 20 लाख से अधिक भारतीय स्थायी रूप से विदेश बस चुके हैं और इनमें से अधिकांश उच्च-शिक्षित तथा कुशल पेशेवर हैं।
नीति आयोग की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट इस तस्वीर को और साफ करती है। इसके अनुसार भारत से हर एक विदेशी छात्र के आने के मुकाबले 25 भारतीय छात्र विदेश पढ़ने जाते हैं। 2024 में 13.36 लाख भारतीय छात्र विदेश गए, जबकि भारत आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या नगण्य रही। यह असंतुलन बताता है कि भारत वैश्विक शिक्षा और शोध का केंद्र बनने के बजाय प्रतिभा निर्यातक देश बन गया है।
आईआईटी के टॉप 1000 रैंकर्स में से कम से कम एक-तिहाई आगे चलकर विदेश चले जाते हैं। 67 प्रतिशत उच्च-योग्य प्रोफेसर भारत के बजाय विदेश में नौकरी को अधिक महत्व देते हैं। पी-एचडी के बाद पोस्ट-डॉक के लिए अमेरिका और यूरोप जाने वाले युवा वैज्ञानिक अक्सर वहीं स्थायी नागरिक बन जाते हैं। उनकी लैब, उनकी खोजें और उनके स्टार्टअप स्पिन-ऑफ भारत के स्थान पर विदेशों में जन्म लेते हैं। रही सही कसर नीट-पीजी में मिस्टर माइनस 40 को भी योग्य मानेजाने वाले हमारे सिस्टम ने पूरी कर दी है! ऐसे में यही कहना होगा कि यह सिर्फ ब्रेन ड्रेन नहीं, बल्कि नॉलेज ड्रेन है।
भारत की शिक्षा-प्रणाली से निकले कई लोग आज वैश्विक सत्ता और अर्थव्यवस्था के शीर्ष पर हैं। जिसमें कि सुंदर पिचाई, सत्या नडेला, शांतनु नारायण, अरविंद कृष्णा, अजय बंगा जैसे कई नाम गिनाए जा सकते हैं, ये सभी कायदे से भारत की ताकत बनना चाहिए किंतु आज इनकी रिसर्च, पेटेंट, टैक्स और रोजगार सृजन का लाभ भारत के बजाय अमेरिका और अन्य विकसित देशों उठा रहे है। भारत ने दिमाग तैयार किए, लेकिन उनसे पैदा होने वाली समृद्धि दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है।
मीटस्ट्रीम.एआई के को-फाउंडर और डायरेक्टर सिद्धार्थ शिवसुब्रमण्यम का कहना है कि अमेरिका में चीजे बहुत तेज चलती हैं, निवेशक और ग्राहक जल्दी फैसले लेते हैं और इससे कंपनी की ग्रोथ की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। भारत से प्रतिभा पलायन की असल वजह इकोसिस्टम की कमी और तेजी से आगे बढ़ने की चाह है।
सिद्धार्थ की तरह भारत की आंतरिक स्थितियों को लेकर जब युवा और पेशेवर अपने अनुभव साझा करते हैं, तो एक जैसी समस्याओं का ही जिक्र करते हैं। भ्रष्टाचार, धीमी और जटिल नौकरशाही, प्रदूषण, ट्रैफिक, असुरक्षित भोजन और हवा, ओवरवर्क कल्चर और सम्मान की कमी। कई लोग यह भी कहते हैं कि वे सिर्फ ज्यादा सैलरी नहीं, सामान्य और सुरक्षित जीवन की चाह रखते हैं। उनके लिए महिलाओं की सुरक्षा, बेहतर हेल्थकेयर और साफ वातावरण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना करियर।
आज भारत हर साल 35 से 50 अरब डॉलर की उत्पादकता खो रहा है। एआई और इनोवेशन में पेटेंट और रिसर्च बाहर जा रही हैं। भारत का डेमोग्राफिक डिविडेंड, जिसे उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, धीरे-धीरे बर्बाद हो रहा है। इसलिए सामाजिक असमानता भी बढ़ रही है। ऐसे में चिंता यही है कि हमारा सिस्टम अपने आप को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए कितना तैयार कर रहा है? निश्चित ही यूरोपीय संघ से भारत का सौदा छप्पर-फाड़ अवसर है।
वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास के शब्दों में “यदि प्रधानमंत्री मोदी गंभीरता से अपने सचिवों से 27 यूरोपीय देशों, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैंड आदि के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौतों के मुताबिक बाज़ार खुलवाएं, प्रक्रिया-कायदे आसान बनवाएं तो भारत के लिए अवसर ही अवसर हैं।”…यूरोपीय संघ के साथ करार हो चुका है लेकिन अमल में ढेरों बाधाएं हैं। दिल्ली के नौकरशाहों और क्रोनी पूंजीपतियों की लालफीताशाही व स्वार्थों की नीति व नीयत अंडगे वाली है। दूसरी ओर यूरोपीय संघ के नेता चीन से भी सौदा पटा रहे हैं।
आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी नौकरशाही फुर्ती से ट्रंप के बनवाए अवसरों का लाभ उठा रहे हैं। फिर भारत के बाजार में चीन जैसा छाया है उसके आगे कैसे पश्चिमी कंपनियों के धंधे, पूंजी निवेश के रास्ते निकलें? निश्चित ही इन प्रश्नों के जवाब हमें जरूर ढूंढने चाहिए, अन्यथा एक महान अवसर हम खो देंगे, चीन ईयू पर सर्वत्र छाया हुआ दिखाई देगा! चीन इन दिनों अपने यहां विशेष प्रोग्राम और आर्थिक पैकेज देकर दुनिया भर से प्रतिभाओं को वापिस बुला रहा है, ऐसे में भारत की क्या योजना है? अभी तक कुछ पता नहीं है!



