वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. शैलेश शुक्ला को ‘पत्रकार रत्न सम्मान’ से अलंकृत

लखनऊ। हिंदी पत्रकारिता, साहित्य, जनसंचार और वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ पत्रकार, प्रख्यात साहित्यकार, शोधकर्ता और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मीडिया विशेषज्ञ डॉ. शैलेश शुक्ला को अखिल भारतीय काव्य, कथा एवं कला परिषद, महू (इंदौर), मध्य प्रदेश द्वारा प्रतिष्ठित ‘पत्रकार रत्न सम्मान’ से अलंकृत किया गया है। यह सम्मान उन्हें पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके बहुआयामी, दीर्घकालिक और उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था अखिल भारतीय काव्य, कथा एवं कला परिषद द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान उन व्यक्तित्वों को समर्पित है, जिन्होंने अपने लेखन, चिंतन और रचनात्मक कर्म के माध्यम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र जीवन को नई दिशा प्रदान की है। डॉ. शैलेश शुक्ला का चयन इस सम्मान के लिए किया जाना न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि समूचे हिंदी जगत के लिए गौरव का विषय माना जा रहा है। डॉ. शैलेश शुक्ला हिंदी और जनसंचार के क्षेत्र का एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने पत्रकारिता, साहित्य, शोध, अध्यापन, संपादन और भाषा प्रौद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएच.डी. उपाधिधारक डॉ. शुक्ला हिंदी और जनसंचार में स्नातकोत्तर होने के साथ-साथ मानव संसाधन प्रबंधन एवं विपणन में एमबीए की उपाधि भी प्राप्त कर चुके हैं। एक सशक्त कवि, लेखक, संपादक और चिंतक के रूप में डॉ. शुक्ला की एक हजार से अधिक रचनाएँ देश-विदेश के लगभग दो सौ समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, शोध जर्नलों और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें कविताएँ, गीत, लेख, शोध-पत्र, साक्षात्कार, कहानियाँ और सामयिक टिप्पणियाँ शामिल हैं। वे पाँच पुस्तकों के लेखक, बीस से अधिक पुस्तकों एवं पत्रिकाओं के संपादक तथा विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित चालीस से अधिक पुस्तक अध्यायों के रचनाकार हैं। शोध और अकादमिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके पचास से अधिक शोध-पत्र प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डिजिटल मीडिया के युग में हिंदी साहित्य की उभरती प्रवृत्तियों पर किया गया उनका शोध कार्य विशेष रूप से चर्चित रहा है। वर्तमान में वे ‘सृजन संसार’ अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक के रूप में कार्य करते हुए हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। डॉ. शुक्ला ने पत्रकारिता और अध्यापन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान की हैं। वे सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम हिंदी अधिकारी रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालय में संचार विषय तथा सिक्किम विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर हिंदी के विद्यार्थियों को अध्यापन कार्य किया है। गृह मंत्रालय, भारत सरकार के राजभाषा विभाग के अंतर्गत हिंदी शिक्षण योजना, गंगटोक में अधिकारी-प्रभारी के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के वैश्विक संवर्धन में भी डॉ. शैलेश शुक्ला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों के सहयोग से सैकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों, वेबिनारों और साहित्यिक आयोजनों का सफल संचालन और संयोजन किया है। उनके प्रयासों से मॉरीशस, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, कुवैत, कतर, बेल्जियम, नीदरलैंड और अनेक अन्य देशों में हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार को नई ऊर्जा मिली है। डॉ. शुक्ला की प्रतिभा और योगदान को समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जाता रहा है। उन्हें भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार 2019-20’ तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा ‘नवोदित लेखक पुरस्कार 2003-04’ सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। हाल ही में उनका चयन अमेरिका स्थित Knowledge Networks द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित ERAI Fellowship 2026 के लिए भी किया गया है, जो कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) की नैतिकता, शासन और उत्तरदायी उपयोग से जुड़े वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच माना जाता है। साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, लेखकों, पत्रकारों और शुभचिंतकों ने डॉ. शैलेश शुक्ला को प्राप्त इस सम्मान पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह सम्मान उनके चार दशकों से अधिक समय से निरंतर जारी रचनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक योगदान की स्वाभाविक पहचान है। उनके लेखन और विचारों ने न केवल हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को समृद्ध किया है, बल्कि नई पीढ़ी के लेखकों, शोधार्थियों और पत्रकारों को भी प्रेरणा प्रदान की है।…

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