बृज खंडेलवाल
दिल्ली । की आख़िरी सुबह है। सर्दियों की धुंध अब भी इंडस्ट्रियल एरिया पर छाई हुई है। जगन्नाथ अपनी छोटी-सी फैक्ट्री का शटर उठाते हैं। अंदर तेल, लोहे और पसीने की जानी-पहचानी गंध फैली है। एक तरफ़ दफ़्तर में कंप्यूटर और डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं। घर पर उनकी पत्नी रजनी ने चाय का पानी चढ़ा दिया है। टिफ़िन बाँधते हुए, बच्चों के स्कूल के संदेश देखते हुए और बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल करते हुए वह धीमी आवाज़ में चल रही ख़बरें सुन रही है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, एआई और भविष्य जैसे शब्द कमरे में तैरते हुए बड़े अच्छे लगते हैं।
इधर 85 साल के दादाजी मोबाइल पर दोस्त से राजनीति पर बहस कर रहे हैं, जबकि उनकी दंतहीन पत्नी सलीके से गोलियाँ और कैप्सूल गिनकर रख रही हैं। बेटी राधिका और बेटा नवीन डाइनिंग टेबल पर न्यू ईयर पार्टी की तैयारी कर रहे हैं।
यही है आज का शहरी भारत , सोच, परिवार, आस्था और परंपरा में गहराई से रचा-बसा देश, जो ख़ामोशी से एल्गोरिद्म, डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से चलने वाले भविष्य की ओर बढ़ रहा है।
जगन्नाथ जैसे परिवारों के लिए तरक़्क़ी कोई बड़ी हेडलाइन नहीं है। वह छोटे-छोटे बदलावों में महसूस होती है , मोबाइल से तुरंत भुगतान, ऑनलाइन डॉक्टर की सलाह, सरकारी स्कूल में बच्चे का कोडिंग सीखना। युद्धों, वैश्विक सुस्ती और जलवायु संकट की चिंता के बावजूद, 2025 में भारत की अर्थव्यवस्था ने चौंकाने वाली मज़बूती दिखाई है। दुकानें आबाद हैं, हाइवे फैल रहे हैं, फैक्ट्रियाँ गूंज रही हैं। घरेलू ख़पत मज़बूत है। छोटे कस्बों तक बुनियादी ढांचे के काम दिख रहे हैं।
आज के युवा नारे नहीं, हुनर चाहते हैं। आबादी का आधे से ज़्यादा हिस्सा 35 साल से कम उम्र का है। रोज़गार और मौक़ों का दबाव बहुत बड़ा है, लेकिन यही भारत की सबसे बड़ी ताक़त भी है। आधार और यूपीआई जैसे डिजिटल पब्लिक सिस्टम ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी को ख़ामोशी से बदल दिया है । सब्ज़ी बेचने वाला डिजिटल पेमेंट लेता है, पेंशन सीधे गाँव के बुज़ुर्ग तक पहुँचती है, सब्सिडी रास्ते में नहीं गुम होती। जिस देश में कभी फ़ाइलों और बिचौलियों का बोलबाला था, उसके लिए यह कोई छोटी क्रांति नहीं है।
राजनीति में भी निरंतरता और स्थिरता की चाह दिखती है। बड़े राज्यों में हालिया चुनाव नतीजों ने बुनियादी ढांचे, कल्याण योजनाओं और आर्थिक विकास पर केंद्रित लंबी नीतियों में लोगों का भरोसा मज़बूत किया है। स्थिरता निवेशकों को भरोसा देती है और आम नागरिकों को अपनी ज़िंदगी की योजना बनाने का सुकून।
फिर भी, उम्मीद के नीचे कुछ जिद्दी चुनौतियाँ हैं । रोज़गार उतनी तेज़ी से नहीं बढ़े हैं, असमानता चुभती है, पानी की कमी, प्रदूषित नदियाँ और बढ़ता तापमान किसान और शहरवासी दोनों को परेशान करता है। जाति और लैंगिक भेद जैसे पुराने सामाजिक बँटवारे अब भी संभावनाओं को सीमित करते हैं। बाहर की दुनिया में भारत को बढ़ते तनावों के बीच रिश्तों और प्रतिद्वंद्विताओं का संतुलन साधना है।
यहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई कहानी में प्रवेश करती है —। न विज्ञान-कथा की तरह, न किसी ख़तरे के रूप में, बल्कि एक ख़ामोश मददगार के तौर पर। समझदारी से इस्तेमाल हो, तो एआई भारत को बिना सामाजिक ताने-बाने को तोड़े आगे छलांग लगाने का मौक़ा दे सकती है।
शिक्षा में एआई, रट्टा-प्रथा की जकड़न तोड़ रही है। ग्रामीण स्कूल का बच्चा अब व्यक्तिगत पाठ, अनुकूल परीक्षाएँ और वर्चुअल ट्यूटर पा सकता है। भाषा की दीवारें टूट रही हैं। सीखना अब याद करने से ज़्यादा समझने पर आधारित हो रहा है । यह सिर्फ़ सुधार नहीं, एक आज़ादी है।
स्वास्थ्य सेवा में भी एक ख़ामोश क्रांति चल रही है। एआई आधारित जाँच से बीमारियाँ जल्दी पकड़ में आती हैं। टेलीमेडिसिन उन गाँवों तक पहुँच रही है, जहाँ विशेषज्ञ कभी नहीं पहुँचे। जिन परिवारों ने दूरी या ख़र्च के कारण इलाज टाल दिया था, उनके लिए यह जीवन और क्षति के बीच का अंतर बन सकता है।
खेती में, जहाँ परंपरा सबसे गहरी है, एआई अपनी क़ीमत साबित कर रही है। मौसम का अनुमान, मिट्टी का विश्लेषण और फसल योजना के औज़ार जोखिम घटाते हैं और आमदनी बढ़ाते हैं। ज़मीन की पुरानी समझ बादलों में मौजूद नई बुद्धिमत्ता से मिलती है। साथ मिलकर, वे ग्रामीण आजीविका को इज़्ज़त और स्थिरता का वादा देती हैं।
शासन भी बदल रहा है। प्रणालियाँ तेज़, पारदर्शी और व्यक्तिगत मनमानी पर कम निर्भर हो रही हैं। तकनीक मानवीय मूल्यों को नहीं हटाती, लेकिन मानवीय पक्षपात को कम कर सकती है। ख़ासकर महिलाएँ लाभ में हैं, क्योंकि दूरस्थ काम और डिजिटल उद्यमिता पुराने बंधनों को सीधे टकराव के बिना चुनौती देती हैं।
जगन्नाथ की फैक्ट्री में लौटें तो छोटे बदलाव साफ़ दिखते हैं । स्टॉक डिजिटल तरीके से ट्रैक होता है, मशीनें कम बर्बादी करती हैं, नए बाज़ारों से ऑर्डर आते हैं। उनके बच्चे ऐसे करियर की बात करते हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। रजनी मोबाइल से बचत और बीमा आत्मविश्वास के साथ संभालती हैं। परंपरा बनी रहती है । बड़ों का सम्मान, पारिवारिक भोजन, सुबह की प्रार्थना। लेकिन भविष्य धीरे से दस्तक दे रहा है, दरवाज़ा तोड़ नहीं रहा।
यही भारत की असली ताक़त है । बदलाव को अपनाने की क्षमता, बिना हिचकोले खाए।
भारत के उत्थान की कहानी सिर्फ़ बोर्डरूम में नहीं लिखी जाएगी; वह घरों, खेतों, कक्षाओं और फैक्ट्रियों में लिखी जाएगी । ख़ामोशी से, लगातार, उम्मीद के साथ।



