पुणे: भारतीय इतिहास में कुछ युद्ध और बलिदान ऐसे हुये हैं जिनका उदाहरण पूरे विश्व में नहीं मिलता। ऐसा ही एक युद्ध सिंहगढ़ के किले में हुआ और ऐसे अद्भुत यौद्धा थे तानाजी मालुसरे। जिन्होंने अपने प्राण देकर भी सिंहगढ़ का युद्ध जीता। वह भी सीमित सैनिक संख्या से। तब शिवाजी महाराज ने कहा था- किला तो जीत लिया पर सिंह चला गया”
तानाजी सदैव अद्भुत ऊर्जासे ओतप्रोत रहते थे। उन्होंने शिवाजी महाराज के हर युद्ध अभियान में भाग लिया था। युद्ध में लगे किसी भी घाव पर उनके मुंह से कभी “कराह” नहीं निकली। अपने जीवन के इस अंतिम युद्ध में उनकी ढाल टूट गई थी, एक हाथ भी कट गया था। पर वे रूके नहीं, निरंतर आगे बढ़े। दूसरे हाथ से तलवार चलाई और किलेदार के सीने में तलवार घोंपकर ही भूमि पर गिरे। अपने प्राणों की अंतिम श्वाँस के साथ किये गये प्रहार ही इस युद्ध का निर्णायक रहा और किले पर “हिन्दवी स्वराज्य” का भगवा ध्वज फहर गया।
ऐसे अद्भुत योद्धा तानाजी मालसुरे का जन्म तिथि अज्ञात है। जन्म वर्ष 1626 है। उनका जन्म महाराष्ट्र प्राँत में सतारा जिला अंतर्गत ग्राम गोदावली में हुआ था। इस परिवार के शिवाजी महाराज के परिवार से पीढ़ियों से संबंध थे। तानाजी के पिता कालोजी, शिवाजी महाराज के पिता शाहजी राजे के अनेक सैन्य अभियान में सहभागी रहे थे और माता पार्वती मालसुरे भी माता जीजाबाई की निकटस्थ थीं। युद्ध अभियान में ही तानाजी के पिता की मृत्यु हो गई थी तब माता जीजाबाई ने इस परिवार को पूरा संरक्षण दिया। माता जीजाबाई जब शिवनेरी छोड़कर पुणे आईं तब मालसुरे परिवार भी उनके साथ आया। आयु की दृष्टि से तानाजी शिवाजी महाराज से चार साल बढ़े थे लेकिन दोनों में गहरी आत्मीय मित्रता थी। वे और शिवाजी महाराज बालसखा थे। तानाजी बचपन से बहुत साहसी, फुर्तीले और बहुत निडर स्वभाव के थे। उन्हें पहाड़ी रास्तों पर चलने और पहाड़ के ऊपर तेजी से चढ़ने की शैली का भी ज्ञान था। तानाजी शिवाजी महाराज के अति विश्वस्त सेना नायक बने। वे शिवाजी महाराज के प्रत्येक सैन्य अभियान में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती थी। अफजल खाँ के वध की रणनीति में भी पूरी सैन्य जमावट तानाजी की थी। जिस सिंहगढ़ के युद्ध में उनका बलिदान हुआ इस युद्ध को संसार के विशिष्ट युद्धों मे गिना जाता है। चूँकि मराठा सैनिकों की कुल संख्या 342 थी जबकि किले की सुरक्षा केलिये पाँच हजार मुगल सैनिक तैनात थे। यह प्रसिद्ध किला पुणे से लगभग तीस किलोमीटर दूर और समुद्रतट से 4300 फ़ुट ऊँचाई पर पहाड़ी किला है। पहले इसका नाम कोंडाणा था। इस नाम से इस किले के निकट एक गाँव भी बसा हुआ है। आरंभ में इस किले पर यदुवंशी राजाओं का शासन रहा है। इनका अंतिम शासक ‘नागनायक’ थे। इस राजवंश का पतन मुहम्मद तुगलक़ के आक्रमण से हुआ। इसके बाद इसपर अहमदनगर के मलिक अहमद का अधिकार हुआ। फिर बीजापुर के सुल्तान का। शिवाजी महाराज ने बीजापुर के सुल्तान को पराजित करके इस किले पर अपना अधिकार किया था। उन्होंने इसी किले को अपना निवास भी बना लिया था। शिवाजी महाराज ने अपने पिता शाहूजी राजे का अन्तिम संस्कार भी इसी किले में किया था। इस कारण माता जीजाबाई की स्मृतियाँ इस किले से जुड़ गई थीं। लेकिन 1665 में राजा जयसिंह की मध्यस्थता में शिवाजी महाराज की औरंगजेब से एक संधि हुई जिसमें सिंहगढ़ का यह किला मुगल सल्तनत के अधिकार में आ गया। औरंगजेब ने धोखेबाजी की और शिवाजी महाराज को कैद कर लिया। इससे यह संधि आगे न चल सकी। शिवाजी महाराज औरंगजेब की कैद से सुरक्षित महाराष्ट्र पहुँचे और अपने सभी किले वापस लेने के अभियान में जुट गये। उन्हें सफलता भी मिली। लेकिन यह किला रह गया था। औरंगजेब ने एक और चालाकी की। उसने इस किले का किलेदार एक हिन्दू उदयभान सिंह राठौर को नियुक्त कर दिया।
एक बार जीजाबाई किसी यात्रा पर थीं वे उस किले के समीप से निकली। वहाँ मुगलों का ध्वज देखकर बहुत दुखी हुईं। उनकी चर्चा शिवाजी महाराज से हुई। अगले दिन शिवाजी महाराज ने इस किले पर पुनः अधिकार करने केलिये विश्वस्त सेना नायकों से परामर्श किया। उन दिनों तानाजी अपने पुत्र रायबा के विवाह की तैयारी कर रहे थे लेकिन जैसे ही उन्होंने सिंहगढ़ युद्ध योजना की बात सुनी तो वे तैयारी छोड़कर शिवाजी महाराज के पास आये और किले पर आक्रमण की कमान संभाल ली। इस अभियान में तानाजी के साथ उनके भाई सूर्याजी मालुसरे और मामा शेलार राव भी थे। इस दल में कुल 342 सैनिक सिंहगढ़ रवाना हुये। यह रणनीति बहुत गुप्त थी। सभी सैनिक एक साथ नहीं निकले। अलग अलग रास्तों से किले के अलग अलग कौने पर पहुँचे। इनमें कुछ किले की दीवार पर चढ़ने में भी सिद्धहस्त थे। ये सैनिक अंधेरी रात में चुपचाप किले की दीवार पर चढ़े ऊपर रस्सियाँ बाँधकर नीचे लटकाई जिससे अन्य सौनिक भी ऊपर पहुँच गये। सबेरा होते होते सभी सैनिक किले में प्रवेश कर गये। किले की सुरक्षा केलिये पांच हजार मुगल सैनिक तैनात थे। इसमें दो हजार से अधिक सैनिक किले के अंदर थे। मराठा सैनिकों की रात भर चली इस कार्रवाई की किसी को भनक तक नहीं लगी। सूरज निकलने के साथ ही मारकाट आरंभ हो गई। मराठा सैनिकों ने सबसे पहले किले के मुख्य द्वार और शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया। किले के द्वार पर तोपखाना भी था। तोपखाने पर भी मराठा सैनिकों का अधिकार हो गया और तोप गरज उठी। कोई बाहरी मुगल सैनिक भीतर न आ सका। जिन्होंने प्रयास किया वे तोप के गोलों से ढेर हो गये। इसके बाद तानाजी किलेदार की ओर बढ़े। किलेदार की रक्षा केलिये मुगल सैनिकों की संख्या अधिक थी। लेकिन बिना कोई परवाह किये मराठा टुकड़ी वीरता के साथ आगे बढ़ी। तानाजी सबसे आगे थे। युद्ध में उनकी ढाल टूट गई, हाथ पर तलवार पड़ी। तानाजी ने अपने सिर की पगड़ी हाथ पर बांधी और दूसरे हाथ से तलवार चलाते हुये आगे बढ़े। उनके सामने किलेदार उदयभान सिंह था। उदयभान के वार से तानाजी का एक हाथ भी कट गया लेकिन वे दूसरे हाथ से तलवार उदयभान के सीने के पार कर दी। उदयभान ढेर हो गया। तानाजी भी गंभीर रूप से घायल हो गये थे और वहीं गिर पड़े। वह 4 फरवरी 1670 की तिथि थी। हिन्दवी स्वराज्य स्थापना केलिये उनका बलिदान हुआ। तानाजी के भाई सूर्याजी मालुसरे ने सिंहगढ़ अर्थात कोंढाणा किले पर भगवा ध्वज लहराया। अगले दिन शिवाजी महाराज ने किले में प्रवेश किया। तानाजी की मृत देह को देखकर शिवाजी महाराज को बहुत दुख। उन्होंने कहा “गढ़ आणा पण सिंह गेला” अर्थात् किला तो हाथ आ गया लेकिन मेरा शेर चला गया। शिवाजी ने तानाजी मालुसरे के नाम पर किले का नाम कोंढाणा से बदलकर सिंहगढ़ रखा। साथ ही पुणे के नरबीर वाकेवाडी नामक स्थान का नाम भी तानाजी वाडी रखा गया। पुणे के पास सिहंगड़ा में तानाजी मालुसारे का एक स्मारक भी है। वहां उनकी एक प्रतिमा भी स्थापित है।
4 फरवरी 1670 : यौद्धा तानाजी मालसुरे का बलिदान



