रायपुर : भारतीय राजनीति में स्वातन्त्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर का नाम सदैव चर्चा में रहता है। मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु से अपना जीवन स्वतन्त्रता की बलिवेदी में
यह सावरकर के क्रान्तिकारी विचारों, कार्यों, दर्शन और भारतीय संस्कृति, हिन्दू राष्ट्र के प्रति उनकी अगाध,असंदिग्धश्रद्धा का ही परिणाम है कि — वे जनमानस के हृदय में अपना अद्वितीय स्थान तो बनाए हुए हैं।साथ ही उत्तरोत्तर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का मस्तक उन्नत ही होता जा रहा है।
साथ ही उनका अनादर व अपमान करने वालों के लिए भी वे वर्षों से पत्थर में सर पीटने का विषय बने हुए है। हालाँकि इसके केन्द्र में स्वार्थ पिपासु राजनीति है जिसे पता है कि — सावरकर के दर्शन में कितना अपार ओज और तेज है । उन्हें यह भी पता है कि – वीर सावरकर के विचारों- सिद्धान्तों को लोक द्वारा आत्मसात करने पर भारत-भारतीयता और भारतीय संस्कृति की ध्वज पताका सदैव फहराती रहेगी। इससे उसी सत्ता की प्रतिष्ठा होगी जो भारत की सनातन संस्कृति के प्रति निष्ठावान होगी।
इस कारण से सावरकर सदैव एक संगठित गिरोह के निशाने पर सदैव बने रहते हैं। हमें यह तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि — सावरकर उस समय से ही क्रान्तिकारियों के महान आदर्शों में स्थापित हो चुके थे । जब स्वतन्त्रता आन्दोलन के बहुचर्चित नेता — चाहे गाँधी जी हों ,सुभाषचंद्र बोसहों,सरदार पटेल
महात्मा गाँधी तो दक्षिण अफ्रीका से सन् 1915 में भारत वापस आए थे। किन्तु सावरकर सन् उन्नीस सौ के प्रवेश के साथ ही क्रान्तिकारी कार्यों में अपने अपूर्व तेज के साथ गतिमान थे। बालगंगाधर तिलक उनसे अत्यंत प्रभावित थे। तिलक जी ने श्याममजीकृष्ण वर्मा द्वारा लन्दन में भारतीय छात्रों के लिए हॉस्टल के रुप में स्थापित ‘इण्डिया हाउस’ में सावरकर को भेजा। इंडिया हाउस क्रांतिकारी निर्माण की फैक्ट्री के तौर पर चर्चित थी। वहाँ तिलक जी ने उन्हें पढ़ने के उद्देश्य से — क्रान्तिकारी गतिविधियों के प्रसार के लिए भेजा था।
सावरकर कौन थे ?
सन् उन्नीस सौ चार 1904 में लन्दन में अपनी पढ़ाई के दौरान ही अभिनव भारत जैसे क्रांतिकारी संगठन को खड़ा करने वाले सावरकर। लाला हरदयाल, सेनापति बापट, भाई परमानंद और भगत सिंह के गुरु – मार्गदर्शक करतार सिंह सराभा के
सन् 1857 का स्वातन्त्र्य समर :
‘सन् 1857 का स्वातन्त्र्य समर’ — यह कोई सामान्य पुस्तक भर नहीं थी। बल्कि इस पुस्तक ने अनेकानेक क्रान्तिकारियोंको क्रान्ति की नई राह दिखलाई।गदर पार्टी के जन्म के पीछे यही पुस्तक है। अँग्रेजी सरकार इससे इतना भयभीत हुई कि प्रकाशन के पूर्व ही पुस्तक को जब्त करने की योजना बना ली थी। किन्तु सावरकर अँग्रेजों की मानसिकता और योजना को पूर्व में ही भाँप गए। इसकी तीन प्रतियाँ तैयार करवाई। जो कि उन्होंने मूल रूप से मराठी भाषा में लिखी थी।और इसे उन्होंने भारत में अपने बड़े भाई — गणेश सावरकर, फ्रांस में भीकाजी
इस पुस्तक की विचार दृष्टि – क्रान्तिकारी भावना की उपयोगिता इतनी अधिक थी कि – इसके विविध भाषाओं में अनेकानेक संस्करण प्रकाशित हुए। नेताजी सुभाषचंद्र बोसने इसके तमिल संस्करण को प्रकाशित करवाया, तो भगत सिंह ने इसके अन्य संस्करणों को राजाराम शास्त्री की सहायता से प्रकाशित करवाने व अधिकाधिक प्रसार में जुटे रहे। रासबिहारी बोस से लेकर राजर्षि पुरुषोत्तम दास दण्डनसहित अनेकानेक क्रान्
वे सावरकर ही थे जिन्होंने सन् उन्नीस सौ पाँच में सर्वप्रथम बंगाल विभाजन का विरोध करते हुए विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर प्रखर प्रतिशोध दर्ज करवाया था। इस विचार को आगे चलकर महात्मा गाँधी ने बाईस अगस्त सन् उन्नीस सौ इक्कीस 22 अगस्त 1919 को ‘स्वदेशी’ अभियान में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अपनाया।
सन् उन्नीस सौ सात (1907) में —अँग्रेजों द्वारा जब भारत के अठारह सौ सन्तावन के स्वतन्त्रता संग्
वीर सावरकर के प्रति आदर और श्रद्धा :
क्रान्तिकारी कवि,उपन्यासकार , इतिहासकार, विद्वान, दार्शनिक, कानूनविद् ,समाजसुधा
सावरकर पर किताब लिखने वाले विक्रम सम्पत बतलाते हैं कि — “सावरकर ने अपनी याचिकाओं के सम्बन्ध में स्वयं ‘ मेरा आजन्म कारावास’ में लिखा है। उनकी सभी याचिकाएँ उसी फॉर्मेट में हैं जिस फॉर्मेट में उस समय राजनीतिक बन्दीयाचिकाएँ प्रस्तुत करते थे। छठवीं याचिका के लिए महात्मा गाँधी ने उन्हें स्वयं सलाह दी थी। महात्मा गाँधी स्वयं सावरकर बन्धुओं की मुक्ति के लिए अपने स्तर पर प्रयासरत थे। इस बावत्। महात्मा गाँधी ने स्वयं छब्बीस मई सन् उन्नीस सौ बीस व सन् उन्नीस सौ इक्कीस में अपने पत्र ‘ यंग इण्डिया’ में लेख लिखा था। जिसमें सावरकर बन्धुओंके विषय में विस्तृत विवेचन के साथ अँग्रेज सरकार से उन्हें छोड़ने के लिए कहते हैं।”
यह सबकुछ ऐतिहासिक तौर पर दर्ज है। कोई भी इसका अवलोकन कर सकता है। तथ्यों के आलोक में जहाँ सावरकर के प्रति दुस्प्रचार करने वाले बेदम पिटते हैं । तो वहीं गाँधी हत्या के आरोप में भले ही उन्हें जेल जानी पड़ी हो। लेकिन अन्ततोगत्वा भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की अग्निपरीक्षा से भी सावरकर तपकर कुन्दन की भाँति निष्कलंक निकल कर आते हैं।
सावरकर के विषय में यदि हम आधुनिक सन्दर्भ में बात करें — तो न्यायपालिका हर बार उन्हें निर्दोष सिद्ध करती है। किन्तु सावरकर के विरुद्ध ऐतिहासिक रुप से पर्याप्त कानूनी प्रमाण है ; ऐसा उनको अपमानित करने वाली कुंठित बिरादरी हमेशा कहती रहती है।
यदि सावरकर के विरुद्ध गाँधी हत्या में संलिप्त होने के कोई भी प्रमाण होते तो – क्या न्यायपालिका संज्ञान में लेकर उन्हें अपराधी सिद्ध नहीं करती? यदि सावरकर गाँधीजी की हत्या में संलिप्त होते तो क्या सन् पैंसठ में गठित कपूर आयोग उन्हें दोषी सिद्ध नहीं करता ?
ऊपर से कपूर आयोग की रिपोर्ट पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा के शासनका
यदि सावरकर दोषी होते तो क्या सर्वोच्च न्यायालय उन्हें अपराधी सिद्ध नहीं करता ? यदि वीर सावरकर क्रान्तिकारीनहीं होते तो क्या लालबहादुर शास्त्री के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार उन्हें शासकीय कोष से पेंशन देती ? जैसा कि वर्तमान में कांग्रेस के दिग्भ्रमित, विचारशून्य कथित नेता और वामपंथियों द्वारा वीर सावरकर के विरुद्ध विषवमन किया जा रहा है। पंडित नेहरू की बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी वीर सावरकर के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव रखती थीं। इसीलिए वीर सावरकर के अप्रतिम योगदान को ध्यान में रखते हुए इंदिरा गांधी— 1970 में महान क्रान्तिकारी, राष्ट्रवादी
“Dear Shri Bakhle,
I have received your letter of the8th May 1980.
Veer Savarkar’s daring defiance of the British Government has its own important place in the annals of our freedom movement. I wish success to the plans to celebrate the birth centenary of this remarkable son of India”
Your sincerely
Indira Gandhi
( NO.838 -PMO/80, 20 MAY 1980)
इसके अतिरिक्त इंदिरा गांधी ने सन् 1983 में भारतीय फिल्म डिवीजन को वीर सावरकर पर एक वृत्तचित्र बनाने का आदेश देते हुए कहा था कि -“आने वाली पीढ़ियों को ‘इस महान क्रांतिकारी’ के बारे में न सिर्फ पता चल सके बल्कि पीढ़ियाँ जान सकें कि वीर सावरकर ने देश की आजादी में क्या और किस तरह से योगदान दिया।”
स्पष्ट है कि इंदिरा गांधी वीर सावरकर के प्रति अगाध श्रद्धा रखती थीं। इसीलिए उन्होंने उनके सम्मान में कोई कमी नहीं की। ऐसे में क्या पूरी कांग्रेस और अराजक वामपंथी गिरोह इन्दिरा गाँ
जब सोनिया गांधी ने प्रणब मुखर्जी और शिवराज पा
बात सन् दो हजार तीन की है – जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में— प्रणब मुखर्जी शिवराज पाटि
यदि सावरकर गाँधी हत्या के दोषी होते तो क्या प्रणबमुखर्जी व शिवराज पा
चाहे एपीजे कलाम हों या प्रणब मुखर्जी हों – जो भारतीय स्वतन्त्रता में सावरकर
इसके पीछे उस फौज में चाहे कांग्रेसी हों – चाहे वामपंथी हों या अन्य मुखौटाधारी। ये सब अपने कुकर्मों से बचने के लिए बेबुनियाद तर्कों की ओट में उन्हें लाँछित करने के लिए उतर पड़ते हैं।
सावरकर पर अपने-अपने मिथ्यारोपों को गढ़ने के लिए — ये कभी गाँधी का सहारा ले लेते हैं तो कभी भगत सिंह के बरक्स सावरकर को खड़ा कर अपनी कुत्सित राजनीति को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन जो सावरकर – भगत सिंह के गुरू – प्रेरक रहे करतारसिंह सराभा के प्रेरणा
ऐसा कुकृत्य करने वाले महापुरुषों के सहारे अपने प्रोपेगैण्डाको चलाने के लिए जी – जान लगाए रहते हैं। किन्तु सावरकर के त्याग,बलिदान,
भले ही उन पर बौद्धिक जुगाली के कीचड़ उछालने के कितने भी प्रयास किए जाएँ। लेकिन वे सावरकर के अवदान को कभी भी कम नहीं कर सकते। उल्टे यह जरूर संभव है कि ऐसा करने वालों का चाल-चरित्र और चेहरा हमेशा बेनकाबहोता जाएगा।उनके इन कुकृत्यों से यह सुस्पष्ट होता है कि – ऐसा करने वाले उन्हीं अँग्रेजों की नाजायज़ सन्तानें हैं जिन्होंने वीर सावरकर की क्रान्ति से डरकर उन्हें कठोर सजा सुनाई। सावरकर को लाँछित करने के लिए विमर्श चलाने वाले इन पाखण्डियों से यह भी सिध्द होता है कि – ये न तो राष्ट्रभक्त हो सकते, न गाँधीभक्त और न ही स्वतन्त्रता संग्राम के हुतात्माओं का आदर करने वाले। ये केवल विकृत मानसिकता के गिरहकट हैं जिन्हें सावरकर के विचार और दर्शन में भारत की उन्नति व भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठाहोने का भय सता रहा है।
अतएव,ऐसा करने वाले सावरकर को अपमानित करने के सहारे अपनी राजनीतिक प्राण प्रतिष्ठा की उम्मीद लगाकर बैठे हुए हैं। इसके लिए वे किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। अपने आपको इतिहासकार, प्रोफेसर,पत्रकार, कलाकार, नेता – कहने और कहलाने का प्रपञ्च रचने वाले ये सब वही लोग हैं — जिन्होंने कभी भी भारतीय संस्कृति ,इतिहास, महापुरुषों का आदर नहीं किया। बल्कि उन्हें अपमानित करने के अपने -अपने स्तर पर कोई भी अवसर नहीं चूके।
मनसा -वाचा -कर्मणा माँ भारती के लिए अपनी आहुति देने वाले सावरकर जिन्होंने क्रान्ति की ऐसी ज्वाला सुलगाई कि क्रूर अँग्रेजी सरकार झुलसने लगी।
जब लंदन में सावरकर को अंग्रेजों ने किया गिरफ्तार :
मदनलाल ढींगरा के द्वारा जब सन् उन्नीस सौ नौ में कर्नलवायली की हत्या कर दी गई । तब सावरकर ने मदनलाल ढींगरा के समर्थन में लन्दन टाईम्स में लेख लिखा। इतना ही नहीं इसके पूर्व और बाद में भी सावरकर ने उन्हें कानूनी और क्रान्ति के लिए सहयोग प्रदान किया। इस आधार पर वे सन्देह के घेरे में आ गए। सावरकर को मदनलाल ढींगरा को सहयोग देने, वायली की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में लन्दन में उन्हें तेरह मई सन् उन्नीस सौ दस को गिरफ्तार कर लिया गया। तत्पश्चात अँग्रेजों द्वारा भारत ले आते समय — वे जहाज से समुद्र में कूदकर आठ जुलाई उन्नीस सौ दस को फ्रांस के सीमाक्षेत्र में चले गए। किन्तु बाद में फ्रांस सरकार ने उन्हें ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया।
अँग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक ब्रिटिश अधिकारी जैकसन की हत्या में उन्हें दोषी ठहराते हुए चौबीस दिसम्बर सन् उन्नीस सौ दस को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। तत्पश्चात पुनः इकतीस जनवरी उन्नीस सौ ग्यारह को उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।सात अप्रैल सन् उन्नीस सौ ग्यारह को कालापानी की सजा में पोर्टब्लेयर की सेलुलरजेल में दस वर्षों तक उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। वे यातनाएँ इतनी क्रूर व वीभत्स थीं कि — जिसे आज सोच भर लेने से अन्तरात्मा काँप उठती है।
मगर, वह कठोर -क्रूर यातनाएँ भी सावरकर को न तो तोड़ पाईं और न ही उनके स्वतन्त्रता और क्रान्ति के व्रत को डिगा पाईं।इक्कीस मई सन् उन्नीस सौ इक्कीस तक अँग्रेजों ने उन्हें दस वर्ष अण्डमान के पोर्ट ब्लेयर
अन्ततोगत्वा अठ्ठाईस वर्षों की लम्बी यातना के बाद भारत शासन अधिनियम सन् उन्नीस सौ पैंतीस के बाद — जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी में कांग्रेस की सरकार बनी तब उन्हें सन् उन्नीस सौ सैंतीस में एक प्रकार से अँग्रेज़ी सरकार की क्रूर परतन्त्रता से मुक्ति मिली। तत्कालीन कांग्रेस ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का आमन्त्रण दिया था किन्तु सावरकर ने कांग्रेस का आमन्त्रण अस्वीकार करते हुए कहा था –
“कांग्रेसी नेताओं को ये विश्वास था कि हिन्दू मुस्लिम एकता के बिना भारत को स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती, मुस्लिम नेता इसी का फायदा उठाते हुए हिन्दुओं के अधिकारों की कीमत पर अपने समुदाय के लिए रियायतें हासिल कर रहे हैं। राष्ट्रवाद के नाम पर -हिन्दुओं की कीमत पर ;मुसलमानों को तुष्ट करना राष्ट्र के साथ धोखा है।मैं ऐसी स्थिति में कांग्रेस में शामिल नहीं हो सकता। राष्ट्रभक्तों की अन्तिम कतार में खड़े होना भी ,मैं राष्ट्रद्रोह करने वालों की पहली कतार में खड़े होने से बेहतर समझता हूँ। ”
विकृत मानसिकता वाले मानसिक गिरोहों के अनुसार यदि सावरकर ने क्रान्तिकारी का
सन् उन्नीस सौ सैंतीस में अपनी स्वतन्त्रता के उपरान्त वीर सावरकर पुनः सामाजिक -राजनैतिक – सांस्कृतिक स्तर पर दूरगामी व्यापक कूटनीति एवं रणनीति के अन्तर्गतक्रान्तिकारी कार्य में तत्परता के साथ जुट गए। अपनी कैद के दौरान उन्होंने विपुल साहित्य रचा था। और स्वतन्त्रता के पुजारी सावरकर ने अनेकानेक कठोर यातनाओं की त्रासदी को अपने ऊपर वज्रपात की भाँति सह लिया। लेकिन उन्होंने अपने सिद्धान्तों , अखण्ड भारत के सपनों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया। उन्होंने अँग्रेजी शत्रुओं को धोखा देने के लिए विविध रणनीतियाँ बनाई और अपने जीवन को सार्थकता प्रदान की। सावरकर पर चाहे गाँधी हत्या में संलिप्तता के मनगढ़न्त आरोप हों याकि उनकी याचिकाओं को लेकर कुत्सित दुराग्रहों की तुष्टि के यत्न हों – सभी केवल राजनीतिक हित साधने व स्वातन्त्र्य समर के महान क्रान्तिकारी वीर सावरकर



