डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी
दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र का ‘समवेत’ सभागार कल कुछ यूँ लगा, मानो हिंदी पत्रकारिता की पूरी एक शताब्दी एक साथ कुर्सियों पर नहीं, स्मृतियों पर विराजमान हो गई हो। वहाँ पहुँचने का बहाना पुस्तक लोकार्पण था, पर भीतर-भीतर जाना मानो अपने ही पेशे की जड़ों तक लौटना था।
मंच पर सजी तीन खंडों की एक ही किताब ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ को देखकर भरोसा हुआ कि काग़ज़ अब भी इतिहास से हारा नहीं है, उसे सिर्फ़ सही हाथों की तलाश रहती है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ये तीनों खंड, पत्रकारिता की पहली सदी, तिलक युग और गांधी युग, एक-एक युग के धूप-छाँह को ऐसे समेटे खड़े थे, जैसे बुज़ुर्ग दादा अपने पोतों के सामने अपनी लंबी यात्रा का मौन ब्यौरा हों। पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर जी का नाम लेते ही भारतीय पत्रकारिता का एक अनुशासित, शोध-प्रिय चेहरा आँखों के सामने आ जाता है; इस ग्रंथि को देखकर लगा कि अपने समय में कोई व्यक्ति अगर सचमुच ‘इतिहास’ लिखता है तो वह केवल तारीख़ें नहीं जोड़ता, वह समय की अंतरात्मा दर्ज करता है।
मुख्य अतिथि की भूमिका में उपस्थित न होकर भी हरिवंश जी की आवाज़ उस दिन काग़ज़ के ज़रिए सभागार में उपस्थित थी। संदेश पढ़ा जा रहा था, पर लग रहा था मानो राज्यसभा के उपसभापति खुद अपनी अनुभव-संपन्न दृष्टि से पत्रकारिता के इस भगीरथ प्रयत्न को आशीर्वाद दे रहे हों। उन्होंने इसे पत्रकारिता-जगत का अमूल्य कार्य कहा और मीडिया संसार की कृतज्ञता की बात की तो लगा कि पहली बार ‘इतिहास’ शब्द पर पत्रकारिता ने मुस्कराकर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय जी ने जब कहा कि पत्रकारिता अपने समय की सबसे बड़ी चुनौती की पहचान कर समाधान का मार्ग खोजती है, तो वाक्य सिर्फ़ विचार नहीं रहा, किसी पहाड़ी झरने की तरह कानों में देर तक बजता रहा। उन्होंने 1946 से 2026 तक के आठ दशकों को संविधान और संविधान-पालन की चेतना का कालखंड बताया, तो लगा जैसे देश का राजनीतिक इतिहास अचानक हमारे समाचार कक्षों में रखी पुरानी फ़ाइलों से निकलकर सामने खड़ा हो गया हो।
वहीं पुस्तक लेखक श्री विजय दत्त श्रीधर जी ने अपने वक्तव्य में संपादकों की ऐतिहासिक भूमिका को जिस ठहराव और आत्मीयता से याद किया, वह आज के ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ के कोलाहल में लगभग असंभव-सा लगता है। व्यापार, पुरातत्व और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में पत्रकारिता के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने समाचार पत्रों को समाज के सिर्फ़ दर्पण नहीं, बल्कि संयमी व्याख्याकार के रूप में रेखांकित किया। उनके शब्दों में एक पुराना समाचार कक्ष कहीं दूर से झाँकता दिखता था—टेलीप्रिंटर की खट-खट, संपादक की लाल पेंसिल, और बीच में सच की खोज में झुकी हुई आँखें।
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल जी ने मार्के की बात कही। इतिहास इतिवृत्त-संग्रह से बनता है और यह कि हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके इस कथन ने क्षणभर को कार्यक्रम को वर्तमान से उठाकर उन छापाख़ानों की ओर पहुँचा दिया, जहाँ देवनागरी के अक्षर पहली बार ख़बर बनकर जगे होंगे। लगा, जैसे भाषा और पत्रकारिता दो अलग नदियाँ नहीं, एक ही धारा के दो मोड़ हों—एकमें शब्द का संस्कार, दूसरे में समय का साक्ष्य।
वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र जी ने जब कहा कि राम बहादुर राय जी का पचपन पृष्ठों का पुरोवाक्य ही इस ग्रंथ की गहनता का अहसास करा देता है, तो इस कथन में साहित्यिक रस भी था और विद्वत्तापूर्ण भरोसा भी। वहीं अनंत विजय जी ने इसे स्वाधीनता-पूर्व शब्दों की शक्ति और राष्ट्रवाद के उभार को समझने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक बताते हुए विश्वविद्यालयों तक पहुँचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, तो एक अनकहा प्रश्न हवा में तैरने लगा, क्या हमारे पत्रकारिता-विभागों की अलमारियाँ इस तरह के गंभीर अध्यवसाय के लिए पर्याप्त जगह निकाल पाएँगी?
प्रभात खबर के प्रधान संपादक अंकित शुक्ल जी ने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक भटके हुए लोगों और भटकती पत्रकारिता—दोनों को सही दिशा देगी। उनके इस वाक्य में आज की मीडिया-बहसों की कड़वाहट भी थी और किसी सजग संपादक का ईमानदार सपना भी। लगा, जैसे उन्होंने एक ही वाक्य में चैनलों के शोर, पोर्टलों की जल्दबाज़ी और सोशल मीडिया की चंचल निसंगता को कटघरे में खड़ा कर दिया हो।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रो. कृपाशंकर चौबे जी ने पूरे संयम के साथ, किसी अनुभवी नाविक की तरह, विमर्श की इस नाव को एक विचार से दूसरे विचार की तरफ़ मोड़ा। उन्होंने पुस्तक की बारीकियों से परिचित कराते समय कहीं भी अतिशयोक्ति का सहारा नहीं लिया, बल्कि सूक्ष्मता से यह संकेत दिया कि पत्रकारिता का इतिहास लिखते समय लेखक को जितनी विद्वत्ता चाहिए, उतनी ही विनय भी। कलानिधि विभागाध्यक्ष और डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश चंद गौड़ ने जब कृति की वैचारिक गहराई पर विस्तार से चर्चा की, तो सभागार कुछ देर के लिए किसी शोध-परिसर में बदल गया, जहाँ हर चेहरा पाठक भी था, शोधार्थी भी और कहीं न कहीं स्वयं ‘समय का साक्षी’ भी।
इस पूरे आयोजन के बीच एक अनकहा भाव बार-बार मन में उठता रहा। दरअसल पत्रकारिता पर लिखी यह ‘समग्र’ कृति दरअसल भारतीय सार्वजनिक जीवन के चरित्र-पत्र की तरह है। यहाँ परंपरा का पथ भी है, मूल्यों की धूप भी और राष्ट्र-निर्माण के श्रमसिक्त पड़ाव भी। यह सिर्फ़ तिथियों, शीर्षकों और अख़बारों की सूची नहीं, बल्कि इस देश की उस सतत प्रयासशील चेतना का वृतांत है जिसने सच को कभी केवल ख़बर समझकर नहीं देखा, उसे समाज की आत्मा मानकर जिया।
इंदिरा गांधी कला केंद्र से बाहर निकलते समय शाम की रोशनी लॉन में हल्के पीले धब्बों की तरह फैली हुई थी। लगता था जैसे अब भी मंच पर रखी वे तीनों पुस्तकें चुपचाप नई पीढ़ी के पत्रकारों को बुला रही हों। आओ, पहले अपनी विरासत पढ़ो, फिर अपना समय लिखो। यह कृति भारतीय पत्रकारिता की परंपरा, उसके मूल्यों और राष्ट्र-निर्माण में उसकी भूमिका को समझने की एक सशक्त और प्रेरक पहल ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्ममंथन की दर्पण-पुस्तिका भी है।



