अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

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दिल्ली । सुबह का अलार्म बजता है। प्राइवेट स्कूल के चपरासी बाबू लाल के मोबाइल की स्क्रीन पर “गुड मॉर्निंग” चमकती है, लेकिन उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं। घर के आंगन में पड़े अख़बार के पहले पन्ने पर भारत की तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी की सुर्ख़ियाँ हैं, GDP, ग्रोथ, स्टार्टअप, ग्लोबल रैंक। घर के अंदर पत्नी ऊषा, रसोई में उबलता दूध भरोसे के साथ नहीं, शक के साथ देखती है। यह वही भारत है, जहाँ सपनों की उड़ान और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई हर दिन चौड़ी हो रही है।

सवाल यह नहीं कि देश आगे बढ़ रहा है या नहीं; सवाल यह है कि क्या इस दौड़ में “बाबू लाल” साथ चल पा रहा है, या वह बस आँकड़ों की परछाईं बनकर रह गया है?

डिजिटल इंडिया के इस दौर में आप एक इंसान नहीं, बल्कि नंबरों का जोड़ हैं, आधार, पैन, मोबाइल OTP, क्रेडिट स्कोर और वोटर ID, यानी आपकी ज़िंदगी से ज़्यादा क़ीमती आपका डेटा है। सिस्टम आपको पहचानता नहीं, स्कैन करता है। सुविधा मिली है, लेकिन साथ में यह एहसास भी कि आप हर पल देखे जा रहे हैं, नापे जा रहे हैं।

हर मंच से ‘विकसित भारत’ का नारा गूंज रहा है। मैक्रो आँकड़े वाक़ई दमदार हैं, 2024 में औसत GDP वृद्धि 6.3%, 2025–26 की दूसरी तिमाही में 8.2% की छलांग। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, स्टार्टअप इकोसिस्टम में तीसरे स्थान पर। 2047 तक “हाई-इनकम कंट्री” बनने के लिए 7.8% की औसत वृद्धि चाहिए, यह सब प्रेज़ेंटेशन की स्लाइड्स में आकर्षक लगता है ।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तरक़्क़ी आम आदमी की थाली, उसकी सेहत, उसकी सड़क और उसकी सांस तक पहुँची है ?

बाबू लाल टाइप आम आदमी की सुबह मोटिवेशनल कोट से नहीं, मिलावट के डर से होती है। दूध का पैकेट खोलते वक़्त भरोसा नहीं कि उसमें दूध है या केमिकल। मसाले रंगीन हैं, मगर स्वाद से ज़्यादा बीमारी परोसते हैं। मछली ताज़ा दिखती है, लेकिन ज़हर साबित होती है। 2025 में हर चार में से एक खाद्य पदार्थ सेफ्टी टेस्ट में फेल पाया गया। पिछले दस साल में 25% सैंपल नॉन-कन्फ़ॉर्मिंग निकले, 50% घटिया और 15% सीधे असुरक्षित। 2022 में 4,300 से ज़्यादा मिलावट के मामले दर्ज हुए, असल संख्या इससे कहीं ज़्यादा है। इंदौर जैसे “स्वच्छता मॉडल” शहर भी इस विडंबना से अछूते नहीं। यह कैसा विकास है, जहाँ हर कौर के साथ डर भी निगलना पड़े?

घर से बाहर कदम रखते ही दूसरी जंग शुरू होती है, सड़कों की। गड्ढे, खुले मैनहोल, उलटी दिशा में दौड़ते वाहन और ट्रैफिक नियमों का खुलेआम मज़ाक। पैदल चलना अब रोज़ का जोखिम बन चुका है। 2024 में सड़क हादसों में 1.77 लाख लोगों की मौत हुई, यानी रोज़ औसतन 485 जानें। साल-दर-साल 2.3% की बढ़ोतरी। उत्तर प्रदेश में 2025 के पहले 11 महीनों में ही 24,776 मौतें, 14% का उछाल। एक्सप्रेसवे की तस्वीरें होर्डिंग्स पर चमकती हैं, लेकिन मोहल्ले की सड़क आज भी टूटी है। यही है मैक्रो-डेवलपमेंट और माइक्रो-पेन का सबसे बेरहम टकराव, हर नागरिक अनजाने में ‘खतरों के खिलाड़ी’ बन चुका है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत और भी अफ़सोसनाक है। सरकारी अस्पतालों में लंबी लाइनें, कम बेड और उससे भी कम संवेदनशीलता। भारत में प्रति 10,000 आबादी पर सिर्फ़ 20.6 हेल्थकेयर वर्कर हैं, जबकि WHO का मानक 44.5 का है। सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च GDP का महज़ 1.3%। दवा मिल जाए तो किस्मत, इलाज मिल जाए तो करिश्मा। निजी अस्पताल हैं, लेकिन आम आदमी के लिए वे इलाज नहीं, आर्थिक सज़ा हैं। बीमारी सिर्फ़ शरीर नहीं तोड़ती, जेब और आत्मसम्मान भी छीन लेती है।

कामकाजी ज़िंदगी में भी राहत नहीं। औसतन 46.7 घंटे का वर्क-वीक, लेकिन 51% कर्मचारी 49 घंटे से ज़्यादा खटते हैं। 58% वर्कफ़ोर्स बर्नआउट का शिकार है। थकान को देशभक्ति का तमगा दे दिया गया है, 70 घंटे काम करो, सवाल मत पूछो। मेहनत से ज़्यादा चमचागिरी का मोल है। सम्मान योग्यता से नहीं, ओहदे और बैंक बैलेंस से तय होता है। असमानता की दीवार हर दिन ऊँची हो रही है।

डिजिटल इंडिया ने सुविधा दी, लेकिन नया डर भी। 60% भारतीयों को रोज़ कम से कम तीन स्पैम कॉल आते हैं। 2025 में डिजिटल ठगी से ₹26 अरब का नुकसान हुआ। बुज़ुर्गों के लिए यह दुनिया भूलभुलैया है, एक ग़लत क्लिक और जीवनभर की कमाई ग़ायब। तकनीक किसके लिए है, आम आदमी के लिए या उसे ठगने वालों के लिए?

और पर्यावरण, जिसे हमने विकास की वेदी पर कुर्बान कर दिया। 2025 में कई शहरों में AQI 500 के पार चला गया, दिल्ली समेत। देश की 27.77% ज़मीन बंजर होती जा रही है। 4.07 करोड़ लोग चरम मौसम की मार झेल रहे हैं। हवा ज़हर बन चुकी है, नदियाँ नाले, गर्मी जानलेवा और बारिश तबाही। यह प्रकृति का बदला नहीं, हमारी अपनी नीतियों का नतीजा है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि हालात खराब हैं, बल्कि यह कि हमने उन्हें “नॉर्मल” मान लिया है। गड्ढों से बचकर चलना, मिलावट से डरकर खाना, इलाज के लिए क़र्ज़ लेना, स्पैम कॉल्स को गालियाँ देना, सब रूटीन बन चुका है। शिकायत अब ग़ुस्से में नहीं, थकी हुई बेबसी में होती है।
‘विकसित भारत’ का सपना तब तक अधूरा रहेगा, जब तक आम आदमी सिर्फ़ “सहन” करता रहेगा, “जीएगा” नहीं। असली विकास वही है जो सड़क पर दिखे, अस्पताल में महसूस हो, थाली में भरोसे के साथ परोसा जाए और हवा में सांस लेने लायक हो। वरना यह चमकता नारा एक दिन धुंध में खो जाएगा, और पीछे रह जाएगा एक थका, ख़ामोश समाज, जो बस यही पूछता रहेगा: अगर इलाज नहीं करना था, तो बीमारी क्यों थमा दी?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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