पुणे: आख़िर हमें इतनी तेज़ रफ्तार किसलिए चाहिए? अगर पहुंचना यमराज के दरबार में ही है, तो एक्सप्रेसवे बनाने पर हज़ारों करोड़ रुपये क्यों बहाए जा रहे हैं?
आज भारत की सड़कें किसी जंग के मैदान से कम नहीं हैं; बस फर्क़ इतना है कि यहाँ गोलियों की जगह गाड़ियों की रफ़्तार जान लेती है। इंजन की गड़गड़ाहट, टायरों की सरसराहट और चमकती हेडलाइट्स के पीछे एक स्याह हक़ीक़त छुपी है: हर साल 1.7 लाख से ज़्यादा लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं। यह संख्या इतनी भयावह और लगातार है कि लगता है जैसे इसे हमने क़िस्मत मान लिया हो।
विडंबना देखिए: एक ओर हम जनसंख्या के बोझ की बात करते हैं, दूसरी ओर सड़कें ख़ामोशी से इंसानों को निगल रही हैं। न कोई बड़ा हंगामा, न लंबी बहस। अस्पतालों में ट्रॉमा वार्ड भरे रहते हैं, एम्बुलेंस हर वक्त दौड़ती रहती हैं, और श्मशान-क़ब्रिस्तान कभी खाली नहीं होते। लगता है जैसे यमराज ने अपना काम आउटसोर्स कर दिया हो, और उनके एजेंट हर मोड़, हर सीधे रास्ते पर तैनात हों।
सबसे ज़्यादा ख़तरनाक हैं वे सड़कें जिन्हें हम “तरक़्क़ी की निशानी” कहते नहीं थकते; एक्सप्रेसवे। यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा से आगरा तक फैला 165 किलोमीटर का चमचमाता रास्ता, इसका जीता-जागता सबूत है। पिछले बारह सालों में यहाँ 7,600 से ज़्यादा हादसे, 1,300 से अधिक मौतें और हज़ारों घायल दर्ज हुए। सबसे बड़ी वजह? ड्राइवर का झपकी लेना। लंबा, सीधा और उबाऊ रास्ता इंसान को सुस्त कर देता है और एक पल की ऊँघ जानलेवा बन जाती है। औसतन हर चार दिन में एक मौत; इसे हादसा नहीं, सिस्टम की नाकामी कहना चाहिए।
आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे की कहानी भी अलग नहीं। कुछ ही सालों में 7,000 से अधिक दुर्घटनाएँ और 800 से ज़्यादा जानें गईं। यहाँ भी थकान, ओवरस्पीडिंग और टायर फटना आम वजहें हैं। गाड़ियों की संख्या दोगुनी हो चुकी है, मगर सुरक्षा इंतज़ाम उसी रफ़्तार से आगे नहीं बढ़े। ये सड़कें ग़लती माफ़ नहीं करतीं; बस एक चूक और सफ़र हमेशा के लिए ख़त्म।
हम अक्सर सारा इल्ज़ाम ड्राइवर पर डाल देते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या गलती सिर्फ़ उसी की है? जब सड़कें तेज़ चलाने को उकसाती हों, स्पीड लिमिट नाम की चीज़ मज़ाक बन जाए, साइनबोर्ड अधूरे हों, रोशनी कम हो और इमरजेंसी इंतज़ाम नदारद हों, तो हादसे होना तय है। ओवरस्पीडिंग आज सबसे बड़ा क़ातिल है, और गलत लेन में ड्राइविंग उसे खुला न्योता देती है।
सबसे ज़्यादा क़ुर्बानी वे देते हैं जिनकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है, पैदल चलने वाले, साइकिल सवार, और दोपहिया वाहन चालक। राष्ट्रीय राजमार्ग देश की कुल सड़कों का महज़ 2 प्रतिशत हैं, लेकिन एक-तिहाई से ज़्यादा मौतें यहीं होती हैं। गाँवों में, कस्बों में, जिला सड़कों पर—जहाँ देखभाल सबसे कम है—वहाँ जान जाना सबसे आसान है।
अब जाकर हुकूमत ने मानना शुरू किया है कि यह सब “क़िस्मत” नहीं, बल्कि व्यवस्था की नाकामी है। हादसों वाले इलाक़ों की पहचान, ब्लैक स्पॉट सुधार, बेहतर साइनज, तेज़ ट्रॉमा केयर, डेटा और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल: ये क़दम सही दिशा में हैं। सोच में बदलाव आया है, यह राहत की बात है।
लेकिन असली रोड़ा है लागू करना। क़ानून तो हैं, मगर पालन? हेलमेट पहनना आज भी “मर्ज़ी” का मामला है, सीट बेल्ट “शहरों की बीमारी” समझी जाती है। लाखों चालान यह नहीं दिखाते कि सख़्ती है, बल्कि यह बताते हैं कि लापरवाही कितनी गहरी है। जब तक सज़ा का डर नहीं होगा, सलाह बेअसर रहेगी।
जहाँ सख़्त निगरानी हुई, स्पीड कैमरे लगे, पुलिस की मौजूदगी दिखी; वहाँ मौतें घटी हैं। सबक़ साफ़ है: डर के बिना सुधार नहीं होता।
सड़क सुरक्षा न नारे से आएगी, न साल में एक “रोड सेफ़्टी मंथ” से। यह रोज़ का इम्तिहान है; स्कूलों में तालीम से लेकर लाइसेंस की सख़्ती तक, और हर सड़क पर बिना भेदभाव क़ानून लागू करने तक।
वरना फिर वही सवाल लौटता है:
अगर रफ़्तार ही सब कुछ है, क़ानून सिर्फ़ काग़ज़ हैं, और जान जाना “चलता है”, तो फिर अरबों रुपये सड़कों पर क्यों?
सीधे कह दीजिए; यह सफ़र तरक़्क़ी का नहीं, यमराज दर्शन का है।



