अजीत भारती के नाम खुला पत्र

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अजीत भारती जी,

आपका पोस्ट पढ़कर लगा कि आपकी पीड़ा गहरी है—न सिर्फ UGC के मुद्दे पर, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी। माँ के निधन के समय मिले आक्षेप किसी भी इंसान को तोड़ सकते हैं। यह दुखद है कि सोशल मीडिया पर बहस अक्सर तर्क से हटकर व्यक्तिगत हमलों में बदल जाती है। आपने जो लिखा, वह स्पष्ट है: आप UGC नियमों को एकतरफा और खतरनाक मानते हैं, जो सामान्य वर्ग के युवाओं के साथ अन्याय कर सकता है। जहां तक मैं समझ पाया हूं, आपका स्टैंड स्पष्ट है—जहाँ हिंदू समाज की एकता, मेरिट का सम्मान और समरसता सर्वोपरि हैं।

UGC के ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ पर आपकी चिंता जायज है। नियमों का उद्देश्य SC/ST/OBC छात्रों की सुरक्षा था—सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों (जैसे Abeda Salim Tadvi केस) से प्रेरित। लेकिन परिभाषाएँ एकतरफा थीं: जातिगत भेदभाव सिर्फ SC/ST/OBC के खिलाफ माना गया, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ पूर्वाग्रह या फर्जी शिकायतों पर कोई संतुलित प्रावधान नहीं। ‘Equity Committees/Squads’ जैसी व्यवस्था, फर्जी आरोपों पर कोई सजा न होना—यह सब कैंपस में डर और अविश्वास पैदा कर सकता था। ‘सवर्ण नरसंहार’ जैसे शब्द भले भावुक लगें, लेकिन लाखों युवा इसे मेरिट की हत्या और सामाजिक विभाजन के रूप में देख रहे थे। विरोध ऑर्गेनिक था—गाँव-गाँव तक फैला, बिना किसी फंडिंग के।

हिंदुत्व का मूल ‘समरसता’ है—जाति से ऊपर उठकर सबको साथ ले जाना। आरएसएस ने भी हमेशा यही संदेश दिया है। लेकिन जब कोई नीति अनजाने में विभाजन बढ़ाती दिखे, तो उस पर सवाल उठाना राष्ट्रहित में है। इतिहास बताता है कि आलोचना से ही सुधार आए हैं—चाहे मंडल आयोग के समय की बहस हो, या हाल के CAA-NRC पर संवाद। UGC पर सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को स्टे दे दिया—नियमों को ‘vague’, ‘capable of misuse’ और समाज को विभाजित करने वाला बताया। 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे, जब तक नए नहीं बनते। यह विरोध और तर्कपूर्ण चर्चा का ही नतीजा है।

आप कहते हैं कि कुछ लोग नीचता पर उतर आए—माँ को लेकर हमले, फंडिंग के झूठे आरोप, पार्टी-एजेंट बताना। यह गलत है। ऐसे तत्व विचारधारा के नहीं, नफरत के हैं। इनकी निंदा होनी चाहिए। आपने विषय को पार्टी या व्यक्ति से ऊपर रखा—अच्छा करेंगे तो अच्छा लिखेंगे, बुरा करेंगे तो बुरा। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है।

अब UGC स्टे पर है, मार्च में सुनवाई है। समय है कि चर्चा तथ्यों पर केंद्रित हो—कानूनी प्रावधानों पर, संतुलित समाधान पर। गाली-गलौज से विषय दब जाता है, जबकि संयमित आवाज़ सुधार लाती है।

संवाद जारी रहना चाहिए। आलोचकों से ही सुधार का रास्ता मिलता है। आपको क्या चाहिए? एक मजबूत, एकजुट हिंदू समाज, मेरिट-आधारित भारत। आपकी आवाज़ महत्वपूर्ण है। व्यक्तिगत हमले बंद हों, तर्क बोलें। सरकार के पाले में गेंद है—लेकिन हमारी जिम्मेदारी भी है कि विरोध सकारात्मक रहे।

सादर

आशीष कुमार अंशु
दिल्ली।

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