अक्षय के बूब्स

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मनोज श्रीवास्तव

दिल्ली। आधुनिकता सहसा दिल्ली के प्रोटेस्ट मंच पर प्रकट हुई पर उसमें नक्सलियों का आर्थिक तर्क भी न था, जेंडर तरलता थी। स्वच्छता का एक मुखौटा तो था पर हिडमा भी स्वयं एक मुखौटा ही था।

असल था वह wokeism जो पेरिस ओलम्पिक के मंच पर भी प्रकट हुआ था और अब यहाँ।

पुलिसिंग की उस बाइनरी को चुनौती देना था न , जो पुरुष प्रदर्शनकारियों के लिए पुरुष और स्त्री प्रदर्शनकारियों के लिए स्त्री रखती है।
कि हमने इतने बड़े विश्वविद्यालय से पुलिस को संभ्रम में डालने की विद्या हासिल की है कि अब कैसे गिरफ़्तार करेगी पुलिस। उन्होंने उन पवित्र शिक्षा के हॉलों में सीखा था कि भ्रम कैसे पैदा किया जाए—बाइ प्रोडक्ट के रूप में नहीं बल्कि एक जानबूझकर की गई रणनीति के रूप में। यह विद्या थी जो आत्मज्ञान के लिए नहीं बल्कि व्यवधान के लिए तैनात की गयी।

अब इस नाजुकी का क्या करे वर्दी – वह जो अपने को छूने का विरोध करती है पर दूसरों को थोक में मार देने का समर्थन।
यह आधुनिकता न तो नक्सलियों की आर्थिक द्वंद्वात्मकता लेकर आई, न ही उस क्रांतिकारी उत्साह के साथ जो कभी भारत के क्रांतिकारी आंदोलनों को जीवंत करता था। यह विस्थापित किसानों या शोषित मजदूरों का प्रदर्शन नहीं था, न ही यह खाली पेट और चुराई गई ज़मीनों से जन्मा विद्रोह था। इसके बजाय, जो कुछ प्रकट हुआ वह पूरी तरह से मायावी था ।

जेंडर तरलता और प्रदर्शनात्मक राजनीति की भाषा बोलती मूर्खता। क्रांति कभी इतनी सस्ती न थी। यह समकालीन शिक्षित प्रदर्शनकारी का विरोधाभास है: अपनी भौतिक उपस्थिति में गहराई से स्थानीय, फिर भी अपने वैचारिक गठन में पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय। वे दिल्ली की सड़कों पर इकट्ठा होते हैं, लेकिन उनका बौद्धिक भूगोल विस्थापित है, वह न्यूयार्क में है या ब्रुकलिन में, हावर्ड में है या लास एंजेल्स में या कहीं भी नहीं है।

यह समकालीन एक्टिविस्ट आंदोलनों की विशिष्ट नैतिक वास्तुकला है: स्वयं पर डायरेक्टेड नुकसान के प्रति एक अद्भुत संवेदनशीलता, दूसरे के खिलाफ की गई हिंसा के प्रति एक लापरवाही। इनका सेल्फ पवित्र है, अपरिहार्य है, अनंत सुरक्षा का पात्र है; सत्ता और जनता इनके लिए नैतिक विचार के दायरे से बाहर है, वह किसी भी प्रकार के हमले के लिए गेम है। आप पेपर स्प्रे करें या हत्यारों की वकालत – आप मुक्त हैं।

उन लोगों के खिलाफ कानून कैसे लागू किया जाए जो उन श्रेणियों का ही विरोध करते हैं जिन पर प्रवर्तन निर्भर करता है? किसी ऐसे व्यक्ति को कैसे गिरफ्तार किया जाए जो सुपाठ्य होने से इनकार करता है, जो अपनी अपठनीयता को प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत करता है?

उन्होंने खुद को अवर्गीकृत बना लिया बल्कि उन्होंने एक ऐसी अवर्गीकरणीयता का दावा किया जो रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करती थी। यह मानव अस्तित्व की जैविक जटिलता नहीं थी बल्कि एक प्रदर्शित जटिलता थी, राज्य मशीनरी के कामों को बंद करने के लिए डिज़ाइन की गई अस्पष्टता की जानबूझकर की गई खेती।

उनकी गणना में पुलिस को निर्णायक रूप से कार्य करने से क्रूरता के आरोपों का जोखिम है; और हिचकिचाने से कमजोरी के दावों को आमंत्रण मिलता है। प्रदर्शनकारियों ने वह किया जिसे गेम थियरिस्ट zugzwang कह सकते हैं—एक ऐसी स्थिति जिसमें प्रतिपक्षी शक्ति का कोई भी कदम नुकसान में परिणत होता है।

इस संदर्भ में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों का रवैया करीबी परीक्षा की माँग करता है। ये संस्थाएँ—विशेष रूप से वे अभिजात स्थान जहाँ मानविकी और सामाजिक विज्ञान फलते-फूलते हैं—शैक्षिक प्रतिष्ठानों से कुछ अधिक बन गए हैं। ये वे कारखाने हैं जहाँ व्यक्तियों को विशेष वैचारिक स्थितियों में निवास करने, विशिष्ट लेंस के माध्यम से दुनिया को देखने, कुछ प्रश्नों को वैध और अन्य को विचार से परे मानने के लिए आकार देना सिखाया जा रहा है।
पर क्या वे वास्तव में स्थानीय आवश्यकताओं और स्थितियों के प्रति उत्तरदायी हैं या वे समाधान आयात कर रहे हैं जो कहीं और विकसित किए गए हैं उन समस्याओं के लिए जो यहाँ उसी रूप में मौजूद नहीं हो सकती हैं?

जब दिल्ली के प्रदर्शनकारी अमेरिकी परिसरों की सक्रियता की भाषा और रणनीति अपनाते हैं, तो उस अनुवाद में क्या खो जाता है? कौन सा स्थानीय ज्ञान, प्रतिरोध के कौन से स्वदेशी रूप, न्याय और समुदाय की कौन सी विशेष समझ विस्थापित हो जाती है?

और क्या पता कि अक्षय नाम के उस लड़के से उसके सहपाठियों ने बदला ही चुकाया हो।
बेचारे के बूब्स, जो थे भी नहीं, राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गए हैं। (सोशल मीडिया से साभार)

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