अमेरिका की विरासत: इंसानियत को पैगाम, सामर्थ्यवान को कोई दोष नहीं

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दिल्ली । लास्ट ईयर जब एक उम्रदराज़ महान नेता ने शांति के लिए नोबेल प्राइज की इच्छा जाहिर की थी, तब ही समझ लेना चाहिए था कि शांति का मतलब युद्ध तनाव होता है। यह वही दोहरी ज़ुबान है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने डबलस्पीक कहा था, जो अब उस लोकतंत्र की पहचान बन चुकी है, जिसने ताक़त और डर को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। इसलिए जब वेनेज़ुएला पर एक और “महान अभियान” की ख़बर आई, तो दुनिया ने बस थकी निगाहों से पूछा “इतनी देर क्यों कर दी हुजूर आते आते?” लगता है, अमेरिकी सपना ज़िंदा रहने के लिए , समय समय पर बूस्टर डोज, तनाव और संकट की खुराक मांगता है।

हक़ीक़त यह है कि वेनेजुएला अपहरण कांड कोई ताज़ा ग़लती नहीं है, बल्कि दो सौ साल पुराने एक प्रोजेक्ट का शायद आख़िरी, निर्वस्त्र पड़ाव है। हिरोशिमा की राख से लेकर वियतनाम के जलते जंगल तक, एटम से लेकर नेपाम बम तक, यह सब एक ही श्रृंखला के मोती हैं। अमेरिका के इनीशिएटिव्स और एक्सपेरिमेंटस, बेलगाम पूंजीवाद और तकनीकी साम्राज्यवाद का गठजोड़, अपने चरम पर है। नक़ाब उतर चुका है, चेहरा खुल गया है।
अब सवाल यह है, अंकल सैम ने इंसानियत को असल में क्या विरासत दी है ? जवाब है, एक ज़हरीली खौफनाक संस्कृति, जो आज़ादी के फटे झंडे में लिपटी हुई है।

सबसे पहले आती है झूठ की राजनीति, एक ऐसी उपभोक्तावादी बाढ़, जो स्थानीय परंपराओं को स्क्रीन और ब्रांड की हवस में डुबो देती है। यह संस्कृति बग़ावत को भी सजावटी माल बना देती है, ताक़त बेचती है, और रिश्तों को एल्गोरिदम की प्रदर्शनी में बदल देती है। इसी से जन्म लेती है एक प्रकृति-विरोधी जीवनशैली, जो धरती को इस्तेमाल कर फेंकने वाली चीज़ मानती है। अमेरिका का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दुनिया के औसत से कई गुना ज़्यादा है, मगर इसकी सज़ा सबसे ग़रीब देश भुगत रहे हैं। आसमान को नाली गटर बना दिया गया है।

बाहरी लूट भीतर की सड़ांध का आईना है। यह यक़ीन कि पैसा सब खरीद सकता है, इंसाफ़, ज़िंदगी और रूह तक, पूरी दुनिया में फैलाया जा चुका है। नतीजा यह कि इलाज एक जुआ बन गया, पढ़ाई क़र्ज़ की कै़द, और राजनीति कॉरपोरेट की नीलामी। इसी नैतिक खोखलेपन से पैदा हुई बंदूक-संस्कृति, जिसने समाज की जगह ख़ौफ़ बसा दिया है। अमेरिका में हर साल हज़ारों लोग गोली का निशाना बनते हैं, यह “लोकतंत्र” नहीं, दिन-प्रतिदिन की लॉटरी है जिसमें ज़िंदगी दाँव पर लगी रहती है।

सदियों तक इस साम्राज्य को एक कहानी चाहिए थी, “लोकतंत्र फैलाने” की। पर उसी नाम पर लैटिन अमेरिका में मौत के दस्ते खड़े किए गए, पश्चिम एशिया में ज़ालिम हुक़ूमतें बैठाई गईं, और दक्षिण-पूर्व एशिया को नेपाम से जला डाला गया। पाखंड इसका कवच था; अब वह भी टूट चुका है।
आज आर्थिक गला-घोंटना और तख़्तापलट का समर्थन खुलेआम किया जाता है। “राजनयिक” अब वसूली के एजेंट बन चुके हैं। साम्राज्य अब सभ्यता सिखाने का नाटक नहीं करता, बस फ़रमान जारी करता है: हमारी बात मान लो, क्योंकि तुम्हारे पास वे संसाधन हैं जो हमें चाहिए । इतिहास गवाह है, ग्वाटेमाला से चिली तक, यह लोकतंत्र कभी जनता की मर्ज़ी का नहीं, बल्कि पूंजी की मर्ज़ी का नाम था।

इसकी सबसे स्थायी “एक्सपोर्ट” है, अराजकता और स्थायी तनाव की व्यवस्था। आज का अमेरिका शांति में नहीं जी सकता, क्योंकि शांति हथियारों, सुरक्षा और पुनर्निर्माण के बाज़ार को नुकसान पहुँचाती है। इसे हमेशा एक दुश्मन चाहिए, हमेशा नया मोर्चा। इंसानी हक़, अख़लाक़, गरिमा, ये सब विलासिता की चीज़ें हैं, केवल अमीर लोगों के लिए।

इसलिए दुनिया का चौंकना अब महज़ दिखावा है। शैतान नहीं बदला, बस उसका नक़ाब उतर गया है। पूंजी, लोभ और युद्ध से चलने वाली यह मशीन अब दिन-दहाड़े काम कर रही है, उन उसूलों को तोड़ती हुई जिनका वह कभी दम भरती थी। पीछे छूटते हैं घायल समाज, शारीरिक भी, रूहानी भी।
फिर भी, इस अंधेरे के पार एक उम्मीद है। हम इस सच को पहचानें और एक नया रास्ता चुनें। सचमुच आज़ाद समाज वह है जो इंसानियत को बाज़ार से ऊपर रखे, धरती से जुड़ा हो और शक की जगह एकजुटता पर खड़ा हो और जिसे किसी ऑरवेलियन अनुवाद की ज़रूरत न पड़े।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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