अंग्रेजों ने 1937 में किया था भारत से अलग

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भोपाल । म्यांमार अर्थात प्राचीन ब्रह्मदेश को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आजाद हिन्द फौज ने जापान की सहायता से अंग्रेजों से मुक्त घोषित कर दिया था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध का पांसा पलट गया और म्यांमार पुनः अंग्रेज आधीन हो गया। इसके बाद नये सिरे से संघर्ष आरंभ हुआ और अंत में 4 जनवरी 1948 को अंग्रेज म्यांमार से विदा हो गये।

म्यांमार की सीमा भारत के अरुणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम और मणिपुर राज्यों से जुड़ी हुयी है। भारत के अतिरिक्त म्यांमार की सीमा रेखा बांग्लादेश, चीन, लाओस और थाईलैण्ड की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा को भी छूती है। इतिहास में जहाँ तक दृष्टि जाती है, यह भारत का अभिन्न अंग रहा है। म्यांमार का प्राचीन नाम ब्रह्मदेश था। जो अपभ्रंश होकर “बर्मा” अंग्रेजी काल में म्यांमार को बर्मा ही कहा जाता था। समय के साथ म्यांमार अर्थात बर्मा की सत्ता के कयी स्वरूप बदले। कभी सीधे भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत रहा तो कभी राजा स्वतंत्र भी रहे, लेकिन हर कालखंड में भारत से जुड़ाव कभी कम न हुआ। बर्मा के रास्ते ही प्राचीन स्याम देश अर्थात वर्तमान थाईलैण्ड, एवं चम्पा अर्थात् वर्तमान विएतनाम तक वृहत्तर भारत का विस्तार था। इन सभी देशों के उत्खनन में प्राचीन भारतीय सभ्यता के अनेक प्रमाण मिले है। पहली सदी तक म्यांमार का पौराणिक नाम इन्द्र्द्वीप रहा है। आक्सफोर्ड विवि के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. होरास हेमन विल्सन ने भी बर्मा व तिब्बत की सभ्यता को भारतीय बताया हैं। श्री हरबिलास शारदा ने अपने ‘हिन्दू सुपीरिअरिटी’ में इसका किया है। बर्मा के कई भागों में 416 ईस्वी पूर्व के नगर होने के साक्ष्य एक संस्कृत एक अभिलेख भी मिला है। चीनी यात्री व्हेनसांग ने भी बर्मा के कुछ नगरों व वैदिक संस्कृति का उल्लेख किया है। चीन के तांगवंश साम्राज्य के दौरान 800 शताब्दी में बर्मा के 35 संगीतज्ञ व नर्तकों का चीन के दरबार में संस्कृत गीतों का प्रस्तुति का उल्लेख भी आया है। इन साक्ष्यों से स्पष्ट है कि बर्मा अर्थात म्यांमार आज भले अलग देश हो। लेकिन अतीत में वह भारत और भारतीय संस्कृति का ही अंग रहा है।

भारत पर हुये आक्रमणों, विध्वंस और सल्तनत सत्ता आरंभ होने का प्रभाव म्यांमार पर भी पड़ा। सल्तनतकाल में म्यांमार के राजा को तो यथावत रखा लेकिन बार्षिक राजस्व सुनिश्चित करके अपने आधीन कर लिया था। सल्तनतकाल के पतन और अंग्रेजों ने भी अपने आरंभिक काल में भी यही व्यवस्था रही। अंग्रेजों ने म्यांमार के राजा को अपने आधीन करके पोलिटिकल एजेन्ट नियुक्ति किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेजों ने भारत में अपना कयी रियासतों में राजा परंपरा को समाप्त कर अधिक से अधिक क्षेत्र पर अपना सीधे अधिकार करने का अभियान चलाया। इसका प्रभाव म्यांमार पर भी पड़ा। 1824 में अंग्रेजी सेना ने म्यांमार पर धावा बोला और म्यांमार के अराकान (रखाइन) और तेनासेरिम (तनिंथारी) के तटीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। 1852 में अंग्रेजों अपना शिकंजा और आगे बढ़ाया। इस बार अंग्रेजी सेना ने रंगून और इरावदी डेल्टा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। 1862 में अंग्रेजों ने पिछले दोनों युद्ध में जीते हुये क्षेत्रों को एक प्रांत बनाकर “‘ब्रिटिश बर्मा” नाम दिया। अंग्रेजों ने तीसरी बार वर्ष 1886 में सेना को आगे बढ़ाया और पूरे म्यांमार पर अधिकार करके तत्कालीन शासक राजा थिबॉऊ को भारत निर्वासित कर दिया। अंग्रेजी सत्ता ने पहले पूरे म्यांमार को एक प्रांत बनाकर बॉम्बे प्रेसीडेंसी के आधीन किया था। लेकिन यह व्यवस्था अधिक न रह सकी। वर्ष 1937 में म्यांमार को भारत से पृथक कर दिया गया। और एक नया देश बनाया सीधे ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश घोषित किया। वस्तुतः अंग्रेजी सत्ता का पहला सूत्र ही “डिवाइड एण्ड रूल” था। उनकी यह नीति समाज संस्कृति और शिक्षा तक ही सीमित न थी। भारत को खंड खंड में विभाजित भी किया था। इसी नीति के अंतर्गत म्यांमार को भारत से तोड़ा और वहाँ अंतरिम सरकार बनाकर सीधे ब्रिटिश साम्राज्य के आधीन किया। इस अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री बान माव बने। बान माव ने प्रधानमंत्री का पद दायित्व तो स्वीकार कर लिया लेकिन वे स्वशासन के समर्थक थे। उन्होंने इसकी तैयारी भी आरंभ कर दी। द्वितीय विश्व आरंभ हुआ। प्रधानमंत्री बान माव ने ब्रिटेन की ओर से युद्ध में भाग लेने का विरोध किया। वे किसी के पक्ष या विपक्ष में युद्ध करने की बजाय तटस्थ रहना चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों ने उनकी बात नहीं मानी और म्यांमार की सेना को युद्ध में भेज दिया। बान माव ने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया। उनपर राजद्रोह के आरोप लगा और गिरफ्तार कर लिये गये। इसका गहरा प्रभाव जन सामान्य पर पड़ा। म्यांमार के स्वयंसेवी संगठन खुलकर सामने आये। और नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज को खुलकर समर्थन मिला। म्यांमार की सेना से भी बड़ी संख्या में सैनिक आजाद हिन्द फौज से जुड़ गये। यह योजना पूर्वक संघर्ष का परिणाम था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1943 में आजाद हिन्द फौज ने जापान की सहायता से म्यांमार पर अधिकार कर लिया था। और स्वतंत्रता का झंडा फहरा दिया था। आजाद हिन्द फौज ने भारत की मुक्ति केलिये भी रंगून को अपना केन्द्र बनाया। इसके आगे इम्फाल, त्रिपुरा आदि क्षेत्र भी अंग्रेजों से मुक्त करा लिये गये थे। अंग्रेजों ने अपना क्षेत्र वापस पाने के लिये तीखे आक्रमण किये, लंबी लड़ाई चली। सैकड़ो सैनिकों का बलिदान हुआ और अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा।

लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप और जापान पर “एटम बम” के उपयोग से युद्ध का पांसा पलट गया। म्यांमार पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार हो गया। बर्मा में सत्ता की बागडोर जनरल आंग सान ने संभाली। उन्होंने स्थानीय नेताओं के साथ कुछ समझौते किये और एकीकृत राज्य व्यवस्था आरंभ की। इस व्यवस्था में केन्द्रीय सत्ता तो अंग्रेजों के ही हाथ में थी लेकिन आंतरिक रूप से अपेक्षाकृत अधिकार अधिक थे। फिर भी स्थानीय नागरिक अंग्रेजों से पूर्ण मुक्ति चाहते थे। अंग्रैजों से यह आतंरिक असंतोष छुपा नहीं था। भारत में सत्ता हस्तांतरण के लिये जिस प्रकार सितंबर 1946 में अंग्रेजों ने अपने आधीन अंतरिम सरकार का गठन किया था। उसी प्रकार बर्मा में भी अंतरिम सरकार के रूप में एक “कार्यकारी परिषद” का गठित की।आंग सान को इस कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष बनाया। लेकिन म्यांमार का एक बड़ा समूह इस व्यवस्था से संतुष्ट न हुआ और अंग्रेजों से मुक्ति का नया संघर्ष आरंभ हुआ। अंग्रेजों ने म्यांमार को एक अलग देश बना दिया था। इसलिए 15 अगस्त 1947 को भारत में सत्ता हस्तांतरण वहाँ पर लागू न हो सका। म्यांमार के स्वतंत्रता समर्थकों ने पुनः संघर्ष आरंभ किया। अंत में 4 जनवरी, 1948 को प्रातः 4:20 बजे म्यांमार एक स्वतंत्र गणराज्य बना। आरंभ में उसका नाम “बर्मा संघ” रखा गया। साओ श्वे थाइक “बर्मा संघ” के पहले राष्ट्रपति और यू नू पहले प्रधानमंत्री बने। अपनी स्वतंत्रता के साथ बर्मा ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। वह “राष्ट्र मंडल” का सदस्य नहीं बना। “राष्ट्र मंडल” के उन देशों का संगठन था, जो कभी अंग्रेजों के आधीन रहे थे। आगे चलकर 1989 में बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया गया।

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रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

श्री शर्मा का पत्रकारिता अनुभव लगभग 52 वर्षों का है। प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों माध्यमों में उन्होंने काम किया है। दैनिक जागरण भोपाल, राष्ट्रीय सहारा दिल्ली सहारा न्यूज चैनल एवं वाँच न्यूज मध्यप्रदेश छत्तीसगढ प्रभारी रहे। वर्तमान में समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहे हैं।

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