अपने पैरों तले विपक्ष को रौंदते राहुल और राष्ट्रीय स्तर पर उभरती भाजपा

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दिल्ली । आज से एक महीने बाद देश के पाँच राज्यों में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरलम में होने वाले चुनावों के नतीजे चार मई की शाम तक सामने आ जाएँगे और जिस भी दल का बहुमत होगा वो सरकार बनाने का दावा करेगा।

इन विधानसभा चुनावों में दो बातें ऐसी हो रही हैं जो भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल कर रख देंगी। *पहली यदि भाजपा पश्चिम बंगाल जीत जाती है तो ना केवल वह भारत के पूर्वी राज्यों में अपनी स्थाई पहचान बना लेगी अपितु वहाँ विपक्ष विहीन राजनीतिक परिदृश्य बन जाएगा।* इसका कारण है कि उड़ीसा और असम में विपक्ष पूरी तरह साफ़ हो गया है। असम में तो कांग्रेस के नेता पार्टी छोड़ छोड़ कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं और माहौल यह है कि भाजपा एक तरफा जीत हासिल कर रही है , जबकि उड़ीसा में कांग्रेस का कोई नाम लेवा नहीं बचा और बीजू जनता दल भी अपने आपको बचाए रखने की कोशिश में लगा हुआ है। *भारत के मजबूत राजनीतिक क्षत्रपो में से एक ममता बनर्जी पिछले 15 सालों से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज हैं लेकिन इस बार उनके सारे पासे उल्टे पड़ रहे हैं। उनकी बैचेनी यह बता रही है कि उनके हाथ से बंगाल की डोर छूट रही है।*

उधर *तमिलनाडु में यदि भाजपा और उसके सहयोगी दल डीएमके की सरकार को हरा देते हैं तो दक्षिण भारत के दिल में भाजपा का प्रवेश हो जाएगा। हालांकि कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनती रही है और आंध्र प्रदेश में वो तेलगुदेशम के साथ सत्ता में भागीदार है लेकिन बिना तमिलनाडू के भाजपा आधार अधूरा ही रहेगा।* तो भाजपा की दृष्टि से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू के विधानसभा चुनाव परिणाम युगांतरकारी साबित होंगे। तमिलनाडू जीतने के बाद केरलम और पुडुचेरी में भाजपा की पहुंच बहुत आसान हो जाएगी। *इस जीत के साथ भाजपा पर लगा उत्तर भारतीय राजनीतिक दल का ठप्पा भी हट जाएगा और वो वास्तविक रूप से पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करने वाला राजनीतिक दल बन जाएगा।*

अब इन चुनावों का दूसरा पहलू और भी ज़्यादा रोचक है। *भारत का मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कहीं पर भी अपने आपको स्थापित करने की कोशिश करते हुए भी नहीं दिखती।* केरल में वो छोटे छोटे दलों के अलावा मुस्लिम लीग को लेकर यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट के नाम से लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट से टक्कर ले रही है। मतलब केरलम जैसे छोटे राज्य में भी कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है जबकि तमिलनाडू और पुडुचेरी में वो डीएमके की कृपा पर निर्भर है। यहाँ पर डीएमके सत्ता में होने के साथ कांग्रेस का मार्गदर्शक भी है। बिना डीएमके के कांग्रेस वहाँ एक कदम भी नहीं चल सकती। यह एक स्थापित सत्य बन गया है। *पश्चिम बंगाल में तो कांग्रेस ने कमाल की हिम्मत दिखाई है। उसने सभी विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि एक दल के रूप में कांग्रेस का यह फ़ैसला आकर्षक हो सकता है लेकिन राजनीतिक रूप से कांग्रेस का यह फ़ैसला बड़ी राजनीतिक मूर्खता को ही दर्शाता है।* कांग्रेस को पता है कि 1977 के बाद से वो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक पटल से बाहर होती गई और इस चुनाव में उसकी वापसी की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं है। इसके बावजूद सभी सीटों पर अपना उम्मीदवार उतार कर उसने ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में वापसी की संभावनाओं पर गहरी चोट कर दी है। *जहाँ कांग्रेस असद्दुद्दीन ओवैसी को भाजपा की बी टीम बताते हुए नहीं थकती थी, आज मुस्लिम वोटों के लालच में वो भी वही काम कर रही है।*

छह माह पूर्व कांग्रेस के लिए थोड़ी बहुत संभावना असम में बनती लग रही थी, पर कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की उपेक्षा और तरुण गोगोई को आगे रखने की जिद में कांग्रेस ने ख़ुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। *कांग्रेस के नेता राहुल गांधी द्वारा रोकने के बाद भी कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ जा रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि असम में कांग्रेस ने आत्मसमर्पण कर दिया है।*

हालाँकि चुनाव परिणामों की आधिकारिक घोषणा चार मई को होगी लेकिन *इतना तय है कि इन चुनावों के बाद कांग्रेस में राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा जिसने कांग्रेस के साथ साथ इंडी अलायंस को भी समाप्त कर दिया। यही चुनाव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के किसी भी दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर भी ताला लगा देंगे।*

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट से संबद्ध हैं)

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