प्रशांत पोळ
अहमदाबाद : कुछ सौं वर्ष पहले तक, भारत विश्व के सबसे संपन्न देशों में शामिल था। लगभग दसवीं शताब्दी तक तो हम विश्व के सबसे धनी, सबसे समृद्ध देश थे। मेरी दोनों पुस्तकों में, ‘भारतीय ज्ञान का खजाना’ और ‘खजाने की शोधयात्रा’ में, इसका विस्तृत वर्णन है। ग्यारहवीं- बारहवीं शताब्दी मे आए हुए इस्लामी आक्रांताओं ने हमें जी भर के लूटा। हमारे धर्म पर आक्रमण किया। रही सही कसर, यूरोपीय आक्रांताओं ने, विशेष कर अंग्रेजों ने, निकाल ली। इस्लामी आक्रांता आने तक विश्व की जीडीपी का एक तिहाई हिस्सा (33%) हमारे पास था। किंतु जब अंग्रेज गए, तब वह मात्र 2.4% रह गया था।
1947 में हमें स्वतंत्रता मिली। भले ही तीन टुकड़ों में बटकर, खंडित रूप से यह स्वातंत्र्य मिला हो, पर जितना भी मिला था, वह तो हमारा था। हम हमारी मर्जी से, हमारे सिद्धांतों से, हमारी ज्ञान परंपरा से नया भारत खड़ा कर सकते थे। इतिहास में हमने कर दिखाया था। हम वही रास्ता, युगानुकूल बनाकर, फिर से चुन सकते थे। वातावरण हमारे अनुकूल था। सैकड़ो वर्षों के बाद स्वतंत्रता मिली थी। जनसामान्य हमारे नेतृत्व की हर बात मानने के लिए तैयार था। हिंदू – मुस्लिम प्रश्न भी नहीं था। कारण, यहां के मुसलमानों को मालूम था, कि भले ही अलग पाकिस्तान की मांग उन्होंने की हो, भले ही वह पाकिस्तान उन्हें मिला भी हो, तो भी अगर वह पाकिस्तान में नहीं जा सके हैं, तो उन्हें भारत की हर एक बात मानना होगी।
संक्षेप में, सब कुछ अपने देश के पक्ष में था।
किंतु नया भारत बनाने के प्रयास ही नहीं हुए। हम हमारे संविधान के प्राक्कथन (Preamble) में लिखा है, वैसे ‘इंडिया’ ही रहे..!
डेढ़ सौ वर्ष इस देश पर राज करने वाले अंग्रेजी राजसत्ता के ‘एक्सटेंशन’ के रूप में..!
उन दिनों जो भी भारत की बात करता था, वह दकियानूसी, प्रतिगामी, ऑर्थोडॉक्स कहलाता था। दुर्भाग्य से ‘इंडिया’ का यह प्रवास काफी लंबा चल गया। लगभग साठ – पैंसठ वर्ष..! इस दरमियान हमारे साथ स्वतंत्र हुए, या नए निर्मित हुए, राष्ट्र हम से आगे निकल गए। राख से उठकर खड़े हुए जापान, जर्मनी कहां से कहां पहुंच गए। दक्षिण कोरिया, इसराइल जैसे देशों ने भी उंची छलांग लगाई। हम कदमताल ही करते रहें।
ऐसा क्यों हुआ..?
कारण, हम अपने आप को भूल गए थे। हम अपने ‘स्व’ के बोध को भूल गए थे। हम में सागर लांघने की शक्ति हैं, इसका हमें विस्मरण हो गया था।
हम अपने ‘स्व’ को भूले, कारण हमें हमारा सत्य इतिहास बताया ही नहीं गया। हमारे आक्रांताओं का महिमामंडन किया गया। अयोध्या में सेना भेजकर, हम सबके आराध्य श्रीराम का मंदिर ध्वस्त करने वाले, आक्रांता बाबर के बारे में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लिख रखा हैं –
Babur comes down as a Soldier of Fortune and Adventure, full of energy and restless spirit with a love for nature and beauty. There was a gentleness and tenderness about him and an appreciation of beauty and culture which mark him out as a man of wide interests.
_(बाबर, इतिहास में एक भाग्य, रोमांच और साहस से भरपूर योद्धा के रूप में सामने आता हैं, जिसे प्रकृति से और सुंदरता से प्रेम हैं। उसके (बाबर) के भीतर कोमलता और संवेदनशीलता भी हैं, तथा सौंदर्य और संस्कृति के प्रति गहरा प्रशंसात्मक लगाव भी। यह सब उसे व्यापक रुचियों वाला मनुष्य सिद्ध करते हैं।)_
(The Discovery of India / The Coming of the Mughals / Page 299 – 300)
मजेदार बात यह, की नेहरू जिस बाबर की तारीफों के पुल बांध रहे हैं, उसने हिंदुस्तान और हिंदुओं के बारे में क्या लिख रखा है..
Hindustan is a country of few charms. Its people have no good looks, no manners, no good horses, no good food or drink.
The people of Hindustan are entirely infidel. They worship idols and have no regard for the true faith. By the grace of Almighty God, we conquered Hindustan, so that Islam might be exalted in this land of infidels. I am proud that I have become a Ghazi today. We must spread the true faith and uphold the laws of Islam in Hindustan.
_(हिंदुस्तान एक ऐसा देश हैं, जहां बहुत कम आकर्षण हैं। यहां के लोग सुंदर नहीं हैं। उन्हें शिष्टाचार नहीं आता। यहां अच्छे घोड़े नहीं हैं और न हीं अच्छी खान-पान की वस्तुएं भी। हिंदुस्तान के लोग काफिर हैं। वह मूर्तियों की पूजा करते हैं, तथा उन्हें ‘सच्चे धर्म’ (इस्लाम) पर श्रद्धा नहीं हैं। अल्लाह की कृपा से हमने हिंदुस्तान को फतह किया हैं, ताकि इस ‘काफिरों की भूमि’ में, इस्लाम प्रतिष्ठित हो। हमें ‘सच्चे धर्म’ को फैलाना चाहिए तथा हिंदुस्तान में इस्लाम के कानून को लागू करना चाहिए।)_
(Baburnama – English translation by Annette Beveridge / Volume 1 / Edition 1922 / Page 360 – 363)
हमारा, आपका, हम सब का, इस देश का दुर्भाग्य था, कि नेहरू जी की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’, लगभग सारे देश में, विभिन्न कक्षाओं में पाठ्यपुस्तक के रूप में चलती थी। अस्सी के दशक के अंत में (1988 – 1989), इस पुस्तक पर, ‘भारत – एक खोज’ यह 53 एपिसोड का धारावाहिक, दूरदर्शन पर दिखाया गया, जिसे बाद में अनेकों बार रि-टेलिकास्ट किया गया।
यह सब विस्तार से लिखा हैं, वह इसलिए, कि इस देश में अपने ‘स्व’ के भाव को योजना पूर्वक दबाया गया। हमारी अपनी भाषा, हमारा अपना वेश (परिधान), हमारे अपने पुरखे, हमारे अपने रीति-रिवाज / परंपरा, हमारा अपना धर्म.. इन सब के बारे में हीन भावना बनी रहे, ऐसा ही वातावरण रहा। हमारे इतिहास के बारे में गर्व करना तो बहुत दूर की बात थी.!
भारत ने अपने ‘स्व’ बोध को जानने में अच्छा खासा विलंब कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन इस दिशा में वर्षों से लगे थे। उन्हें सफलता भी मिल रही थी। ‘हिंदुत्व’ यह प्रतिष्ठा का शब्द बन गया था। सामान्य नागरिक, कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों के ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ से तंग आ चुके थे।
इन सब की परिणीति 2014 के बदलाव में हुई।
2014 के लोकसभा चुनाव ने, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से जागृत हुए जनसामान्य को, राजनीतिक शक्ति से लैस किया। और फिर ‘इंडिया’, ‘भारत’ में बदलने लगा…
इसी बदलाव की ये कहानी हैं।
*यह पुस्तक स्वतंत्र भारत का इतिहास नहीं हैं। स्वतंत्रता के बाद, ‘इंडिया’ से ‘भारत’ में बदल रहे इस देश की यह कहानी हैं। अपनी ताकत, अपनी क्षमता, अपने ‘स्व’ की अनुभूति होने की यह यात्रा, इस पुस्तक में समेटने का प्रयास किया हैं।*
इसमें कुछ ऐसी भी कहानियां हैं, जिन्हें ‘इंडिया’ ने इतिहास के पन्नों में दबा दिया था। ऐसी कहानियां, जिनकी जानकारी हमें होना चाहिए थी, किंतु वह आज तक हमारे सामने आ न सकी।
*मैं अत्यंत सौभाग्यशाली हूं, कि इस पुस्तक की प्रस्तावना के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक, डॉक्टर मोहन भागवत जी का आशीर्वचन मिल रहा हैं।* जबलपुर में अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के समय, मैं उनसे मिला था, तब इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखने का उनसे अनुरोध किया। उन्होंने इसे स्वीकार किया। मैं सरसंघचालक जी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूं।
सरसंघचालक जी ने हमेशा ही, आग्रहपूर्वक, ‘स्व’ के बोध के बारे में प्रतिपादन किया हैं। ‘अपनी स्वाक्षरी (हस्ताक्षर) से लेकर, तो स्वभाषा, स्वभूषा इन सब का हमें गर्व होना चाहिए’, यह आपके आग्रह के विषय रहते हैं।
अच्छी बात यह हैं, कि ‘इंडिया’ को ‘भारत’ में बदलने की अनुभूति हम कर रहे हैं। देश निश्चित रूप से ‘भारत’ बनने की ओर अग्रसर हैं। इसके सुखद परिणाम भी मिल रहे हैं। ऐसे वातावरण में यह पुस्तक आपके हृदय में स्थान बनाएगी ऐसी आशा हैं।
_(सोमवार, 16 फरवारी को, अहमदाबाद मे प्रकाशित होने जा रही ‘इंडिया से भारत : एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश)_



