एंकर ख़ुद भी कन्फ़्यूज़ थीं और पैनलिस्ट को भी कर रहीं थी। पैनलिस्ट समझ ही नहीं पाईं कि गरिमा कहना क्या चाहती हैं?
न्यूज़ 24 में आने से पहले, 2020 में किसान आंदोलन के दौरान गरिमाजी का राकेश टिकैत के साथ लिया गया इंटरव्यू मील का पत्थर था। वहां गरिमा जी ने बिना किसी हिचकिचाहट के सवालों की बौछार की थी – किसानों की मांगों पर सीधी बात, सरकार की नीतियों पर कटाक्ष। टिकैत ने भी उनकी तीक्ष्णता की तारीफ की थी। वह इंटरव्यू इतना प्रभावशाली था कि आज भी सोशल मीडिया पर वायरल होता रहता है। लेकिन न्यूज़ 24 जैसे बड़े चैनल में आने के बाद लगता है गरिमा जी अपनी इमेज के बोझ तले दब सी गई हैं। कॉर्पोरेट प्रेशर, रेटिंग्स की दौड़ और एडिटोरियल लाइन ने उनके अंदर के उस जुनूनी पत्रकार को दबा दिया है, जो स्क्रीन पर अब फीका नजर आता है। शायद वे सुरक्षित खेल खेल रही हों – विवाद से बचते हुए, लेकिन असल पत्रकारिता से दूर होकर।
यह घटना एक सबक है : एंकर का कन्फ्यूजन पूरे शो को कमजोर कर देता है। गरिमा जी से सवाल पूछा जाना चाहिए था कि अल्पसंख्यक और आरक्षण का वह ‘संबंध’ आखिर क्या है? स्पष्टता के बिना बहस सिर्फ शोर बन जाती है। उम्मीद है, गरिमा जी अपनी पुरानी चमक वापस लाएंगी।

अल्पसंख्यक की अवधारणा और आरक्षण में संबंध: एक स्पष्ट व्याख्याभारतीय संदर्भ में अल्पसंख्यक की अवधारणा मुख्य रूप से धार्मिक या भाषाई आधार पर परिभाषित होती है। संविधान के अनुच्छेद 29-30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति, भाषा और शिक्षा संस्थानों को संरक्षण का अधिकार है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 के अनुसार, भारत सरकार ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया है। यह दर्जा राष्ट्रीय स्तर पर लागू होता है, लेकिन राज्य स्तर पर यह भिन्न हो सकता है (जैसे, कुछ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक माने जाते हैं)। इसका उद्देश्य बहुसंख्यक आबादी के दबाव से अल्पसंख्यकों की पहचान और अधिकारों की रक्षा करना है।
आरक्षण के साथ संबंध : आरक्षण प्रणाली (अनुच्छेद 15, 16, 46) सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए है, लेकिन यह मुख्य रूप से जातिगत/जनजातिगत आधार पर है, न कि धार्मिक। संविधान सभा ने 1949 में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को अनुच्छेद 335 से हटा दिया, क्योंकि विभाजन के बाद धार्मिक आधार पर आरक्षण अलगाववाद को बढ़ावा दे सकता था। हालांकि, कुछ राज्यों में अल्पसंख्यकों (जैसे मुसलमानों) को OBC के अंतर्गत आरक्षण मिलता है, यदि वे सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े साबित होते हैं (उदाहरण: आंध्र प्रदेश में 4%, केरल में 12%)। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों पर अपनी आरक्षण नीति थोप नहीं सकता। सच्चर समिति जैसी रिपोर्टें अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन को उजागर करती हैं, लेकिन आरक्षण मुख्यतः सामाजिक न्याय पर केंद्रित है, न कि धार्मिक कोटा पर।
SC, ST, OBC का संबंध : SC (अनुसूचित जाति, 15% आरक्षण), ST (अनुसूचित जनजाति, 7.5%) और OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग, 27%) का आरक्षण ऐतिहासिक भेदभाव (जैसे छुआछूत, अलगाव) को दूर करने के लिए है। ये वर्ग मुख्य रूप से हिंदू समाज (और कुछ अन्य धर्मों) से जुड़े हैं, जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन इन समुदायों को सदियों की जातिगत असमानता के कारण ‘पिछड़ा’ माना जाता है। आरक्षण यहां जाति/जनजाति के सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित है, न कि धार्मिक अल्पसंख्यकता पर। उदाहरणस्वरूप, SC/ST में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन उनका आरक्षण धार्मिक नहीं, बल्कि संवैधानिक (अनुसूची) है। OBC में कुछ अल्पसंख्यक (जैसे मुस्लिम उप-समूह) शामिल हो सकते हैं, यदि वे पिछड़े साबित हों। हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसले (2024) ने SC/ST में सब-कैटेगरी आरक्षण की अनुमति दी, ताकि अधिक पिछड़े उप-समूहों को लाभ मिले। इस प्रकार, जबकि हिंदू समाज बहुसंख्यक है, SC/ST/OBC आरक्षण जातिगत अन्याय को संबोधित करता है, जो धार्मिक अल्पसंख्यक अवधारणा से अलग लेकिन सामाजिक न्याय से जुड़ा है।



