बांग्लादेश में तारीक़ रहमान सत्ता में, अधर में शेख़ हसीना का भविष्य!

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नव ठाकुरीया

गुवाहाटी : स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की विस्तृत तैयारियों के बाद, उत्सवधर्मी माहौल में बांग्लादेश में 12 फरवरी को आम चुनाव संपन्न हुआ। इस चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने प्रचंड जीत दर्ज करते हुए सत्ता में वापसी की। पार्टी नेता तारीक़ रहमान के नेतृत्व में BNP ने 300 सदस्यीय राष्ट्रीय संसद (जातीय संसद) की 200 से अधिक सीटों पर विजय हासिल की। वहीं जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश को लगभग 70 सीटें मिलीं।

दक्षिण एशिया की सबसे पुरानी और प्रभावशाली राजनीतिक पार्टियों में शामिल आवामी लीग इस चुनावी प्रक्रिया से बाहर रही। ढाका में गठित अंतरिम सरकार ने उसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। पार्टी अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना 5 अगस्त 2024 को भारत चली गई थीं। 17 करोड़ की आबादी वाले मुस्लिम बहुल बांग्लादेश का शासन 8 अगस्त से नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार संभाल रही थी।

13वीं जातीय संसद के चुनाव कड़े सुरक्षा इंतज़ामों और उन्नत तकनीकी निगरानी के बीच कराए गए। कुल 12.7 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 60 प्रतिशत ने मतदान किया। यह बांग्लादेश के हालिया चुनावी इतिहास में एक असामान्य लेकिन सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले के कई चुनाव बेहद कम मतदान और विवादों से घिरे रहे थे। इस बार 51 राजनीतिक दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों समेत करीब 2000 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे।

चुनाव की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि पिछले 35 वर्षों में पहली बार मतदान के दिन चुनावी हिंसा में किसी की मौत नहीं हुई। हालांकि देश के विभिन्न मतदान केंद्रों के आसपास प्राकृतिक कारणों से सात लोगों की मृत्यु दर्ज की गई। ब्राह्मणबरिया में एक मतदान अधिकारी ड्यूटी के दौरान गिर पड़े, जबकि खुलना में एक पूर्व BNP नेता और ढाका, चटगांव, गाइबांधा, किशोरगंज तथा मानिकगंज में पाँच मतदाताओं की बीमारी के कारण मृत्यु हुई।

मतदान समाप्त होने के बाद कई भारतीय मीडिया संस्थानों ने बांग्लादेशी मतदाताओं की सराहना की, जिन्होंने कट्टर इस्लामी रुख रखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में अपेक्षाकृत धर्मनिरपेक्ष BNP को प्राथमिकता दी। उल्लेखनीय है कि जुलाई–अगस्त 2024 के जनउभार के दौरान शेख़ हसीना विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले युवाओं द्वारा गठित नेशनल सिटिजन पार्टी ने इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी के साथ गठबंधन किया था, लेकिन उसका प्रदर्शन एकल अंक तक ही सीमित रहा।
नई दिल्ली की केंद्र सरकार ने भी बांग्लादेश की इस ‘उदार और लोकतांत्रिक’ छवि वाली पार्टी के साथ संतुलित और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखे। जब तारीक़ रहमान की मां और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया गंभीर रूप से बीमार थीं, तब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से चिंता व्यक्त करते हुए हरसंभव सहयोग की पेशकश की, जिस पर BNP ने औपचारिक रूप से आभार जताया।

ख़ालिदा ज़िया के निधन के बाद भारत ने अपने विदेश मंत्री एस. जयशंकर को ढाका भेजा। अपने संक्षिप्त दौरे में उन्होंने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात की और प्रधानमंत्री मोदी का व्यक्तिगत शोक संदेश तारीक़ रहमान को सौंपा। इसके बाद नरेंद्र मोदी तारीक़ रहमान को उनकी निर्णायक चुनावी जीत पर बधाई देने वाले पहले वैश्विक नेता बने और दोनों पड़ोसी देशों के बीच बहुआयामी संबंधों को मज़बूत करने की इच्छा जताई। ज़मीनी स्तर पर तारीक़ रहमान ने भी भारत के प्रति संयमित रुख बनाए रखा और किसी भी तरह के भारत-विरोधी बयान या संदेश से परहेज़ किया।

आलोचकों का तर्क है कि यह चुनाव पूरी तरह समावेशी नहीं था, क्योंकि 1971 से पहले देश की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही आवामी लीग को इसमें भाग लेने से रोका गया। हालांकि 2014, 2018 और 2024 के आम चुनावों में BNP द्वारा बहिष्कार और आवामी लीग कार्यकर्ताओं पर कथित धांधली के आरोप लगे थे, जिनमें मतदान प्रतिशत बेहद कम रहा। कभी BNP की सहयोगी रही जमात-ए-इस्लामी अब संसद में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी है, जिससे इस्लामी राजनीतिक ताकतों के मुख्यधारा में प्रवेश का रास्ता खुल गया है।

बांग्लादेश निर्वाचन आयोग और प्रो. यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने शांतिपूर्ण और उत्सवधर्मी माहौल में चुनाव संपन्न कराने के लिए मतदाताओं और आम जनता का धन्यवाद किया। प्रो. यूनुस ने कहा कि मतदाताओं की स्वस्फूर्त भागीदारी, राजनीतिक दलों का जिम्मेदार आचरण, उम्मीदवारों का संयम और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी संस्थाओं की पेशेवर भूमिका यह दर्शाती है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता अब भी मजबूत है। इसके विपरीत, अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने चुनाव को “प्रहसन” बताते हुए अंतरिम सरकार से इस्तीफ़ा देने और नए, निष्पक्ष व समावेशी चुनाव कराने की मांग की।
हिंदू बहुल भारत मुस्लिम-बहुल बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की तेज़ी से घटती जनसंख्या को लेकर चिंतित है। 1947 में जहाँ सनातनी हिंदू आबादी लगभग 23 प्रतिशत थी, वह अब घटकर 8 प्रतिशत से भी कम रह गई है। लगातार हिंसा, जबरन धर्मांतरण और धार्मिक उत्पीड़न शासकों के बदलने के बावजूद जारी रहे हैं। शेख़ हसीना के 2009 से 2024 तक के दूसरे कार्यकाल में भी हिंदू परिवारों और उनके पूजा स्थलों पर अत्याचार पूरी तरह नहीं रुक सके, जिससे अनेक लोगों को धीरे-धीरे अपना जन्मदेश छोड़ना पड़ा। इसके बावजूद, भारत में उन्होंने स्वयं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वास्तविक पीड़ित बांग्लादेश के हिंदू ही रहे।

प्रधानमंत्री मोदी की बधाई भरी फोन कॉल ने भारत में बांग्लादेश को लेकर धारणा को प्रभावित किया और देश के मीडिया जगत पर भी इसका असर पड़ा। फिलहाल यह समय तारीक़ रहमान के लिए निर्णायक है—उन्हें ऐसे देश का नेतृत्व करना है जहाँ हिंदू-विरोधी भावनाएँ मौजूद हैं। उधर, शेख़ हसीना भारत में अस्थायी शरण लेकर लगातार राजनीतिक बयान दे रही हैं, जबकि उनके देश में उन्हें मृत्युदंड का सामना करना पड़ा है। यह स्थिति पड़ोसी देश की नई सरकार के प्रति भारत की सद्भावना पहल की भावना को चुनौती देती प्रतीत होती है। शेख़ हसीना साहसी नेता हैं या भारत के लिए एक असहज और अवांछित अतिथि—इसका निर्णय समय करेगा।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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