बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और गांधी से डरता समाज

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निलेश देसाई

झाबुआ (मप्र) : आज की दुनिया एक अजीब और डरावनी विडंबना से गुजर रही है। एक तरफ हमारे पास कृत्रिम मेधा (AI) और अंतरिक्ष फतह करने वाली तकनीक है, तो दूसरी तरफ हमारे विचार पाषाण युग की हिंसक प्रवृत्तियों की ओर लौट रहे हैं। रूस की सीमाओं से लेकर मध्य-पूर्व के मलबों तक, और दक्षिण चीन सागर की लहरों से लेकर हमारे अपने भीतर पनपती नफरत तक—पूरी मानवता आज बारूद के ढेर पर बैठी है। ऐसे समय में जब मिसाइलों की गर्जना और ड्रोनों की भिनभिनाहट को ‘राष्ट्रीय गौरव’ का संगीत मान लिया गया हो, महात्मा गांधी की याद आना कई लोगों को एक पुरानी पड़ चुकी रस्म लग सकता है।

लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक गहरी और कड़वी है। गांधी आज अप्रासंगिक नहीं हुए हैं, बल्कि वे आज के समाज और सत्ता के लिए पहले से कहीं अधिक ‘असुविधाजनक’ और ‘असहज’ हो गए हैं। सच तो यह है कि आज का वैश्विक समाज गांधी से डरता है, क्योंकि गांधी केवल शांति की बात नहीं करते, वे उस ‘नैतिक साहस’ की मांग करते हैं जो आज की दुनिया में लगभग विलुप्त हो चुका है।

युद्ध का उत्सव और शांति का डर
आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे; वे हमारे ड्राइंग रूम और मोबाइल स्क्रीन तक पहुँच चुके हैं। टेलीविज़न स्क्रीन युद्ध को एक ‘लाइव तमाशा’ बना रही हैं और सोशल मीडिया हिंसा को एक सामान्य, यहाँ तक कि गौरवशाली घटना की तरह परोस रहा है। युद्ध की इस मानसिकता में सबसे पहली बलि ‘संवाद’ की चढ़ती है। गांधी का डर यहीं से शुरू होता है।

गांधी हमें एक ऐसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं जहाँ ‘दुश्मन’ की कोई सरल और इकहरी परिभाषा नहीं है। आज की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श को ‘स्पष्ट दुश्मन’ चाहिए ताकि वे अपनी हिंसा को जायज ठहरा सकें। लेकिन गांधी याद दिलाते हैं कि अन्याय कहीं भी हो, आत्मचिंतन की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। वे याद दिलाते हैं कि “आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।” आज की सत्ताएँ और युद्धोन्मादी समाज इस वाक्य से इसलिए डरते हैं क्योंकि यह उनके प्रतिशोध (Revenge) के तर्क को कमजोर कर देता है।

बाइनरी का जाल और गांधी की जटिलता
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो ‘बाइनरी’ (या तो आप हमारे साथ हैं या दुश्मन के साथ) पर टिका है। सोशल मीडिया ने हमारी सुनने की क्षमता घटा दी है और चीखने की ताकत बढ़ा दी है। इस शोर के बीच गांधी की आवाज़ धीमी, संयमित और सबसे बढ़कर ‘प्रश्नवाचक’ है।

आज जब युद्धों को ‘न्यायपूर्ण’ और ‘अपरिहार्य’ बताकर प्रचारित किया जाता है, तब गांधी का यह प्रश्न कि “क्या आपका साधन आपके साध्य को ही नष्ट तो नहीं कर रहा?” सत्ता और समाज दोनों को असहज कर देता है। गांधी सत्ता के लिए असहज थे और आज भी हैं, क्योंकि वे केवल विरोध में नहीं, बल्कि समर्थन में भी नैतिक सवाल खड़े करते थे। वे अपने अनुयायियों से भी पूछते थे कि क्या उनका क्रोध उचित है? क्या उनकी शांति केवल कायरता का आवरण तो नहीं? आज की ‘कैंसिल कल्चर’ वाली दुनिया में, जहाँ असहमति का उत्तर केवल नफरत और बहिष्कार है, गांधी का संवाद का आग्रह एक ‘बौद्धिक खतरे’ की तरह देखा जाता है।

अहिंसा: कायरता नहीं, सर्वोच्च साहस
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आज के तानाशाह और विस्तारवादी ताकतें गांधी की भाषा नहीं समझतीं। यह दलील देकर हम गांधी को एक तरफ हटा देते हैं ताकि हम अपनी हिंसा को ‘व्यावहारिकता’ (Practicality) का नाम दे सकें। लेकिन क्या वास्तव में युद्ध व्यावहारिक हैं? इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्धों ने तात्कालिक विजय तो दी, लेकिन स्थायी शांति कभी नहीं। उन्होंने केवल अगले युद्ध के बीज बोए।

गांधी की अहिंसा कायरों का अस्त्र नहीं थी। वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के सामने निहत्थे खड़े होने का साहस थी। आज समाज इसलिए डरता है क्योंकि अहिंसा में जवाबदेही अपने ऊपर लेनी पड़ती है। हिंसा में दोष हथियारों, हालातों और इतिहास पर मढ़ा जा सकता है, लेकिन अहिंसा में दोष अपने भीतर खोजना पड़ता है। यह एक ‘नैतिक ऑडिट’ है, जिससे गुजरने की हिम्मत आज के ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग में कम ही दिखती है। हम गांधी को नोटों पर छाप सकते हैं, उनकी मूर्तियों पर माला चढ़ा सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने जीवन में उतारने का मतलब होगा—अपनी सुख-सुविधाओं और अहंकार का त्याग करना। और यही वह बिंदु है जहाँ समाज गांधी से किनारा कर लेता है।

युवाओं की दूरी और औपचारिक गांधी
युवाओं में गांधी के प्रति बढ़ती दूरी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आज का युवा त्वरित परिणाम और ‘इंस्टेंट’ जीत का आकांक्षी है। गांधी धैर्य, आत्मसंयम और दीर्घकालिक नैतिक संघर्ष की बात करते हैं। हमने गांधी को शिक्षा और राजनीति के माध्यम से एक ‘नीरस पाठ’ बना दिया है। हमने उन्हें केवल स्वच्छता और चरखे तक सीमित कर दिया, जबकि वे सत्ता की निरंकुशता और समाज की जड़ता के खिलाफ सबसे बड़े बागी थे।

आज जब दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संकट में है, तब गांधी की वह ‘सत्याग्रही’ छवि डराती है जो कहती थी कि “अन्यायी कानून को न मानना हमारा कर्तव्य है।” व्यवस्था को गांधी के ‘भजन’ पसंद हैं, उनका ‘सत्याग्रह’ नहीं। समाज को गांधी की ‘पूजा’ पसंद है, उनका ‘प्रश्न’ नहीं।

आज की वैश्विक विभीषिका के दौर में गांधी कोई ‘क्विक फिक्स’ या तुरंत मिलने वाला समाधान नहीं हैं। वे एक दिशा हैं, एक नैतिक कंपास हैं। जब चारों ओर युद्ध का शोर हो, तब एक शांत आवाज़ ही हमें भटकाव से बचा सकती है। गांधी इसलिए प्रासंगिक नहीं हैं कि वे सब कुछ ठीक कर देंगे, बल्कि इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वे हमें आईना दिखाते हैं।

वे याद दिलाते हैं कि हर युद्ध अंततः एक मानवीय विफलता है। वे याद दिलाते हैं कि जब तक हम दूसरे को ‘मनुष्य’ मानना बंद नहीं करेंगे, तब तक शांति केवल दो युद्धों के बीच का अंतराल बनी रहेगी।

सच तो यह है कि हम गांधी से इसलिए दूर नहीं हो रहे कि वे हमें कुछ देना बंद कर चुके हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमसे बहुत कुछ मांगते हैं—कठोर ईमानदारी, गहरी करुणा और खुद की गलतियों को स्वीकार करने का साहस। ये तीनों गुण आज की दुनिया में सबसे बड़ी कमी बन गए हैं। अब समय आ गया है कि हम गांधी को याद करने की औपचारिकता छोड़कर उनसे संवाद शुरू करें। सवाल यह नहीं है कि “क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं?”, सवाल यह है कि “क्या हम आज इतने साहसी बचे हैं कि गांधी के उस असहज करने वाले सच को सुन सकें?”

(श्री देसाई एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हैं और झाबुआ (मप्र) में ‘सम्पर्क’ संस्था के माध्यम से दशकों से गांधीवादी मूल्यों पर आधारित ग्रामीण विकास और प्राकृतिक खेती के कार्यों में संलग्न हैं। उन्हें 2022 में रचनात्मक कार्यों के लिए ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है)

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