दिल्ली। बीबीसी की काश्मीरी मूल की पत्रकार ग़ाफ़िरा क़ादरी ने दिल्ली में लैंडलॉर्ड और काश्मीरी किरायेदार को लेकर जो स्टोरी की है वह प्रथम दृष्ट्या ही फ़र्ज़ी या प्रोपेगंडा मालूम पड़ रहा था।
मैंने जब कल उस स्टोरी पर पोस्ट एक लिखा तो एक सीनियर महिला पत्रकार की बहन की तरफ़ से संपर्क किया गया। वह बता रही थी की वह ख़ुद सुखदेव विहार में अपनी बहन का वेल फर्निश्ड, जिसमें ज़रूरियात की सारी सामान मौजूद है, घर दिखाने गयी थी। उसे घर पसंद भी था और किराये को लेकर भी किसी तरह का कोई एग्रीमेंट नहीं थी। बल्कि उन्होंने तो आधार कार्ड तक भी नहीं माँगी थी। फिर भी भी ग़ाफ़िरा घर नहीं ली।
सुखदेव विहार तो ओखला का एक पॉश इलाक़ा है जहाँ हिंदू और मुसलमानों की मिक्स आबादी रहती है। बड़े-बड़े एलीट लोग उधर ही रहते है। फिर ऐसी क्या मजबूरी थी की ग़ाफ़िरा ने वहाँ रहना मुनासिब नहीं समझी और पूरी एक स्टोरी बना डाली?
क्या जल्दी मशहूर होने की बेचैनी या बीबीसी द्वारा किसी प्रोपेगंडा के तहत इस तरह की स्टोरी करायी जा रही है या फिर कुछ दूसरा मामला है?



