डॉ. दिवाकर राय
बेतिया: यह छायाचित्र उस ऐतिहासिक बड़ा रमना के पूर्वी -उत्तरी हिस्से का है, जो कल तक हरा-भरा था। यहां सायंकाल पंछियों की चहचहाहट से वातावरण गुंजायमान रहता था। बसंत का मौसम हो या शीत का, सालों भर हरे रहने वाले वृक्ष पर्यावरण तो शुद्ध करते ही थे, खेलने वाले बच्चों तथा टहलने वाले आम लोगों के मन को भी शांति प्रदान करते थे। स्टेडियम के विस्तार की योजना बनी और बड़े-बड़े सैकड़ों पेड़ काट दिए गए। अब यह उजड़ा चमन जैसा दिखाई दे रहा है। हजारी में बिहार सरकार की हजारों एकड़ खाली जमीन पड़ी है। नये स्टेडियम का निर्माण वहाँ भी हो सकता था।
कभी बेतिया राज का ऐतिहासिक रमना मैदान बेतिया राज के घोड़ों को प्रशिक्षित करने के काम आता था। बाद में अँगरेज यहाँ पोलो खेलने लगे। दशहरा मेला में यह बड़ा रमना सर्कस से गुलजार रहता था। बड़े-बड़े राजनेताओं की सभायें यहीं होती थीं। धीरे-धीरे यह अतिक्रमण का शिकार होता गया। निजी लोगों ने भी अतिक्रमण किया, सरकार द्वारा भी अतिक्रमण किया गया। तत्कालीन जिलाधिकारी जी.कृष्णैया ने इसकी चहारदीवारी करायी। तबतक यहां केवल एक स्टेडियम बना था। फिर उत्तर-पश्चिम के दूसरे हिस्से पर ऑडिटोरियम बन गया। दक्षिणी हिस्से में पता नहीं कौन सा प्रोजेक्ट शुरू हुआ, जो जगह तो घेर लिया; पर वह पूरा ही नहीं हो सका। पश्चिमी हिस्सा सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गया। अब तो बच्चों के झुंडों को खेलने के लिए भी पर्याप्त जगह नहीं है। बेतिया शहर में अब बड़े आयोजनों के लिए कोई जगह ही नहीं बची है। यह विकास हो रहा है या कुछ और, पता नहीं?
इसका एक और पक्ष है। हमलोगों के सामने ही इसमें पौधरोपण किया गया। एक बार नहीं, कई-कई बार। हर बार लाखों खर्च कर फोटो खिंचवाए गये। अधिकांश तो खैर सूख गये, मवेशियों द्वारा चर लिए गए; पर फिर भी वन विभाग के प्रयास से सैकड़ों पेड़ लगे भी। ये पेड़ जब फूल देने लगे, छाया देने लगे तो इन्हें काटने का फरमान आ गया। अब एक हिस्सा बिल्कुल विरान हो गया है। खैर, मैं भी क्या कर सकता हूं? सरकारी फरमान है, सरकारी पैसा है, जैसा सरकार उचित समझे!



