भगवान गणेश का रहस्य और वर्तमान सामूहिक उपासना

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– गिरीश जोशी

सनातन से विपरीत विचार रखने वाले या नास्तिक लोगों द्वारा उठाए गए एक प्रश्न से भगवान गणेश को समझने का प्रयास करते हैं। ये लोग पुछते हैं कि हिंदू अपने सभी मंगल कार्यों कि शुरुआत गणेश पूजन से करते हैं, तो भगवान शिव और पार्वती जो कि उनके माता-पिता हैं उनके विवाह के समय प्रथम पूजन किसका हुआ था। इस प्रकार के प्रश्नों से अनेकों बार सनातन के अनुगामी बुद्धिजीवी खास कर युवा भी भ्रमित हो जाते हैं, उनको ये प्रश्न बड़ा तार्किक लगता है। इसका उत्तर जानने के लिए गणपती अथर्वशीर्ष के प्रथम श्लोक को देखते हैं जिसमें कहा गया है– “त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥ त्वमेव केवलं कर्तासि ॥ त्वमेव केवलं धर्तासि ॥ त्वमेव केवलं हर्तासि ॥ त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रम्हासि ॥ त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥“ इसके श्लोक के द्वारा भगवान गणेश के लिए उसी ब्रह्म तत्व को इंगित किया गया है जो ब्रह्मतत्व अथवा परमेश्वर इस सृष्टि का सृजनकर्ता है जो आदि , अनादी और अनंत है यानि जिसका न तो आरंभ है और न ही अंत ।

हम जानते हैं कि ब्रह्मतत्व निर्गुण और निराकार है। वो सृष्टि का सृजन, पालन और विसर्जन करता है। हमारे शास्त्रों में इसे स्पष्ट किया गया है कि सृजन का कार्य ब्रह्मा,पालन का विष्णु और विसर्जन का कार्य शिव के माध्यम से होता है। लेकिन किसी भी कार्य को करने के लिए किसी स्थान की आवश्यकता होती है या कहें कि आधार की आवश्यकता होती है। सृष्टि संचालन की इन तीनों क्रियाओं के लिए इस अखिल ब्रह्मांड का आधार कौन है इसे समझने के लिए फिर से अथर्वशीर्ष की एक उक्ति को देखते हैं जो कहती है – ” त्वं मूलाधार: स्थितोसि नित्यम ॥” इसका अर्थ ये लगाया जाता है कि मनुष्य के शरीर में जो सात चक्र है उसमें सबसे पहला चक्र मूलाधार होता है वहां श्री गणेश का वास होता है। किंतु हमारे शास्त्रों की एक और उक्ति “यत पिंडे तत ब्रह्मांडे” से यह स्पष्ट होता है कि भगवान गणेश प्रत्येक मानव के मूलाधार में ही नहीं बल्कि इस अखिल ब्रह्मांड के मूलाधार में स्थित है और अनादि काल से विद्यमान है।
जब माता पार्वती ने मिट्टी की मूरत बनाकर उसमें प्राण तत्व की स्थापना करने के लिए शक्ति का आह्वान किया तब वो गणेश तत्व जो पूर्व से ही विद्यमान रहा है उसका अंश उस मिट्टी की मूरत में आकर प्रतिष्ठित हुआ। हम मंदिर बनाते हैं, उसमें पत्थर अथवा धातु की मूर्ति स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा की विधि पूर्ण करते हैं तब उस मूर्ति का चैतन्य दर्शनीय होता है। जब मानव के पास ये क्षमता है तब स्वयं आदिशक्ति आव्हान करें तो निश्चित ही परम तत्व का ही आगमन होता है।

कलयुग के पूर्व द्वापर में जब उस परमतत्व का श्री कृष्ण के रूप में अवतरण हुआ तब कितनी विलक्षण घटनाएं घटी थी ये हम पौराणिक – ऐतिहासिक ग्रंथों में पढ़ते ही हैं। भगवान गणेश का जन्म तो उसके भी पूर्व की घटना है। उस दिव्य शक्ति के आवतरण के बाद जो भी घटनाएं घटी खासकर भगवान शिव से उनका द्वंद, सर का काटा जाना, हाथी के बच्चे का सर उनके धड़ पर लगाना इन सारी घटनाओं का विश्लेषण अनेक ग्रंथों में किया गया है ।

गणेश चतुर्थी से भगवान गणेश की आराधना- उपासना दस दिनों के लिए की जाती है क्योंकि उस समय धरती पर गणेश तत्व की पृथ्वी से अधिक निकटता रहती है। उस अवधि में गणपति की उपासना करने पर हमारा चित्त गणपति चैतन्य के साथ सहजता से जुड़ जाता है। भगवान गणेश सृष्टि का आधार है, सकारात्मक ऊर्जा का स्त्रोत है। सृष्टि में जहां से सृजन होता है, रचनात्मकता प्रस्फुटित होती है उसका भी मूल केंद्र है।इसीलिए भगवान गणेश रचनात्मकता और सृजनशीलता के अधिष्ठाता है ।
आज हमें साहित्य, फ़िल्म, नाट्य, मूर्ति, चित्रकला, नृत्य,निर्माण आदि क्षेत्र में रचनात्मकता, सृजनशीलता,नवीनता में कमी दिखाई दे रही है। उसका मूल कारण ये है कि इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले रचनात्मकता के इस नित्य चिरंतन स्त्रोत से दूर होते दिखाई पड़ते हैं। यदि कला साधक सतत गणपति की उपासना करें, आराधना करें, उनका ध्यान करें तो उनके भीतर ईश्वर प्रदत्त रचनात्मकता, सृजनशीलता की धारा कभी कुंद नहीं हो सकती। कलाकारों, साहित्यकारों, लेखकों, अभिनेताओं आदि को इस रहस्य को समझना पड़ेगा। जिस तरह मोबाइल का उपयोग करने के लिए बैटरी को चार्ज करना पड़ता है उसी तरह हमारे भीतर की रचनात्मकता को चिरंतन बनाए रखने के लिए उसे ब्रह्मांड की रचनात्मकता के मूल स्त्रोत के साथ जुड़कर रिचार्ज करना ही पड़ेगा ।

गणपति की उपासना को व्यक्तिगत स्तर से उठाकर सामाजिक स्तर पर लाने का विलक्षण विचार लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को सुझा था। उन्होंने गणपति उपासना को सामाजिक स्वरूप प्रदान कर इस प्रकार के कार्यक्रमों की रचना दस दिन के लिए की ताकि आने वाली पीढ़ी हमारी परंपराओं और संस्कृति से जुड़ सकें, साथ ही समाज को जागृत कर उसे अंग्रेजों के विरुद्ध खड़ा कर देश को स्वतंत्र किया जा सके क्योंकि तत्कालीन परिस्थिति में समाज व देश के लिए वो सर्वोच्च प्राथमिकता थी।

आज की स्थिति में देखें तो ध्यान में आता है की समय काल परिस्थिति के कारण कार्यक्रमों के स्वरूपों में बदलाव हुआ है। लेकिन ये बदलाव कितना समाजहित में है,देशहित में हैं इसे समझने की आवश्यकता है। आज गणपति उत्सव के कार्यक्रम की योजना बनाते समय आयोजकों को इस बात का विचार करना होगा की वर्तमान में हमारे देश की जो समस्याएं हैं उनका निराकरण करने के लिए समाज को किन बातों के प्रति जागरूक करना है,समाज को देश विरोधी ताकतों के खिलाफ संगठित करने के लिए किस प्रकार के प्रबोधन की आवश्यकता है और भविष्य में जो चुनौतियां हमारे समाज और राष्ट्र के सामने आने वाली है उन चुनौतियों का सामना करने के लिए समर्थ -सक्षम समाज और राष्ट्र का निर्माण करने हेतु नवीन पीढ़ी को गढ़ने के लिए हमें किस प्रकार के कार्यक्रमों की रचनाएं करना है ।

उदाहरण के लिए देखें तो आज पर्यावरण असंतुलन एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने खड़ा है जो भविष्य के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। इसीलिए पर्यावरण से संबंधित सभी आयामों पर समाज को जागृत करने की गतिविधि इन दस दिनों के उत्सव में की जा सकती है। उसी तरह आज हमारे परिवार वर्तमान परिस्थिति के कारण छोटे होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी को जिस प्रकार के संस्कार परंपरागत रूप से मिलते थे उसमें कमी आती दिखाई देती हैं।इसीलिए आयोजन से जुड़े प्रत्येक कुटुंब का प्रबोधन इस विषय में हो सके इस बात का विचार भी कार्यक्रम को करते समय कर सकते हैं ।

देश विरोधी ताकतें समाज में वैमनस्य फैलाकर देश को टुकड़ों- टुकड़ों में बांटने का मंसूबा लिए समाज के बीच खाई खोदने का षड्यंत्र रचती रहती है। इन गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए समाज में समरसता बढ़ाने के उद्देश्य वाले कार्यक्रमों को शामिल किया जा सकता है।

नई पीढ़ी को सनातन धर्म की आधारभूत जानकारी देने के लिए हमारे मूल ग्रंथों जैसे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, उपनिषद, वेदों की शिक्षा देकर धर्म के प्रति समाज का जागरण किया जा सकता है।
भगवान गणपति, गणों के पति यानी सेनापति भी है। भगवान गणेश ने सतयुग में देवांतक व नरांतक नामक असुरों का संहार किया था। उसी तरह त्रेता युग में सिंधु , द्वापर में सिंदूरासुर के साथ मत्सासुर, मदासुर, मोहासुर, कामासुर, लोभासुर, क्रोधासुर, मामासुर, अहंतासुर जैसे असुरों के संहार का वर्णन शास्त्रों में मिलता है ।

भगवान गणपति चतुर्भुज हैं वे अपने एक हाथ में ज्ञान के प्रतीक मोदक को रखते हैं, दूसरे हाथ से हमें आशीर्वाद देते हैं। तीसरे व चौथे हाथ में “पाश और अंकुश” धारण किए हुए हैं। वर्तमान परिस्थिति में गणपति के मोदक और लड्डू पर ध्यान देने के अलावा ‘पाश और अंकुश’ पर ध्यान देना भी आवश्यक हो गया है। आज के समय में देश विरोधी ताकतें जिस प्रकार से समाज में वैमनस्य को बढ़ाने वाले विमर्श स्थापित करने में लगी हैं उन्हें रोकने के लिए विवेक के ‘अंकुश’ का उपयोग समाज को बढ़ाना होगा। उसी तरह हमारे समाज को अपसंस्कृति की जंजीरों से बांधने का प्रयास अलग-अलग माध्यमों से हो रहा है। इन जंजीरों को अपने सनातन मूल्यों के विचार ‘पाश’ से काट कर समाज को देश के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का काम करने की आवश्यकता है। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों को दूषित करने का काम जो तत्व, बातें, विचार करते हैं उन पर ‘अंकुश’ का उपयोग करना है।

लोक कल्याणकारी कामों में सफलता निश्चित मिलेगी इस बात का आश्वासन भगवान गणेश की अभय मुद्रा हमें देती है। परिणाम के रूप में मन में जो मोद यानि आनंद उत्पन्न होगा वो मोदक के रूप में भगवान के प्रसाद स्वरूप प्राप्त होगा। आज के समय में राष्ट्र एवं समाज की दृष्टि से यही सच्ची गणेश उपासना होगी ।

– (श्री जोशी संस्कृति अध्येता एवं अकादमिक प्रशासक हैं)

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