भाजपा को सावधान करने वाले ‘लक्षण’ दिखने लगे बंगाल में

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल में भाजपा समर्थकों के सामने 2026 विधानसभा चुनाव की चुनौतियाँ बहुआयामी और गहन हैं। 2021 के चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल किया था, लेकिन उसके बाद से स्थिति में सुधार के बजाय कई मोर्चों पर पीछे धकेल दिया गया है। कार्यकर्ताओं का कैमरे पर बोलने से इनकार, पीआर एजेंसियों को ग्राउंड रिपोर्टर्स न मिलना। इस अविश्वास और भय के माहौल को रेखांकित करती हैं, जो अब भाजपा की सबसे बड़ी बाधा बन चुका है।

प्रमुख चुनौतियां

· सबसे प्रमुख चुनौती कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और संगठनात्मक कमजोरी है। लगातार हत्याएँ, हमले, घरों पर आगजनी और पलायन ने बूथ स्तर पर भाजपा की मौजूदगी को कमजोर कर दिया है।
· कई स्वयंसेवक और समर्थक अब खुलकर बोलने या सक्रिय होने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि TMC की मशीनरी (पुलिस, प्रशासन, स्थानीय गुंडे) के दबदबे में विरोध का मतलब प्रतिशोध है।
· इससे ग्राउंड रिपोर्टिंग, कैंपेन और voter mobilization प्रभावित हो रहा है।
· 2021 के बाद 50 से अधिक विधायकों और नेताओं का TMC में जाना (defections) संगठन को और खोखला कर चुका है।

ध्यान देने वाली बात

· TMC की मजबूत ग्राउंड मशीनरी और वेलफेयर पॉलिटिक्स।
· ममता बनर्जी की सरकार ने लाखों-करोड़ों लोगों को लाभकारी योजनाओं (कन्याश्री, लक्ष्मीर भंडार, स्वस्थ साथी आदि) से जोड़ा है, जिसे भाजपा ‘doles’ कहकर आलोचना करती है, लेकिन ये योजनाएँ आम जनमानस में TMC के प्रति निष्ठा पैदा करती हैं।
· एंटी-इनकंबेंसी के बावजूद लोग बदलाव से डरते हैं, क्योंकि TMC से जुड़े लाभ मिलते हैं और विरोध करने पर नुकसान का खतरा रहता है। राज्य की मशीनरी पूरी तरह TMC के नियंत्रण में है, जो चुनावी प्रक्रिया में भी फायदा देती है।

क्षेत्रीय असमानता और वोटर बेस

· भाजपा का मजबूत आधार उत्तर बंगाल (दार्जीलिंग, कूच बिहार, जलपाईगुड़ी) में है, जहाँ वह 2021 में अच्छा प्रदर्शन कर चुकी है।
· लेकिन दक्षिण बंगाल (कोलकाता, हावड़ा, 24 परगना आदि) में TMC का दबदबा
अटूट है।
· अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वोट बैंक TMC के साथ मजबूती से खड़ा है, और भाजपा की हिंदुत्व/घुसपैठ वाली रणनीति वहाँ उल्टी पड़ रही है।
· SIR (Special Intensive Revision) जैसे मुद्दे पर विवाद ने भी polarize किया है, लेकिन TMC इसे ‘disenfranchisement’ (मताधिकार) के रूप में पेश कर अपनी स्थिति मजबूत कर रही है।

नैरेटिव और मीडिया कंट्रोल

· TMC की सरकार मीडिया, इन्फ्लुएंसर्स और सोशल मीडिया पर हावी है। भाजपा के प्रयास (परिवर्तन यात्रा, मोदी रैली आदि) के बावजूद ग्राउंड पर TMC का नैरेटिव (ममता vs केंद्र की साजिश) ज्यादा प्रभावी है।
· बांग्लादेश से जुड़े सुरक्षा मुद्दे भाजपा उठाती है, लेकिन वे वोट में तब्दील नहीं हो
पा रहे।

भाजपा के सामने 2026 में जीत के लिए 7-10% वोट स्विंग की जरूरत है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी, कार्यकर्ता भय और TMC की जमीनी ताकत इसे बेहद कठिन बनाती है।

यदि भाजपा बूथ स्तर पर मजबूत नहीं हुई, तो 2021 का प्रदर्शन दोहराना भी मुश्किल होगा।

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