निलेश कटारा
भोपाल ।गांव से शहर की ओर बढ़ते हुए भी यदि कोई समाज अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी पूजा पद्धति को नहीं छोड़ता, तो वही समाज सच्चे अर्थों में समृद्ध कहलाता है। आज झाबुआ जिले के वरिष्ठ वकील एवं संघ के माननीय जिला संघचालक श्री मानसिंह जी भूरिया के सुपुत्र के विवाह समारोह में पारंपरिक भराड़ी परंपरा को जीवंत रूप में देखकर हृदय गर्व से भर गया। यह दृश्य केवल एक रस्म नहीं था, बल्कि हमारी हजारों वर्षों पुरानी आदिवासी संस्कृति, आस्था और प्रकृति-पूजा की जीवंत झलक था। भराड़ी केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हमारे पुरखों की अमूल्य धरोहर है। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। जब आधुनिकता की दौड़ में लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में भराड़ी जैसी परंपराओं का पालन करना वास्तव में प्रेरणादायक है।
भराड़ी का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
भराड़ी में पारंपरिक गीतों के साथ दीवारों पर और स्थान विशेष पर प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से चित्रांकन किया जाता है। इसमें सूर्य, चंद्रमा, तारे, दूल्हा-दुल्हन, पेड़-पौधे, पत्तियाँ और अन्य प्राकृतिक तत्वों से सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं। यह केवल सजावट नहीं होती, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दर्शन छिपा होता है। आदिवासी समाज सदैव प्रकृति पूजक रहा है। हमारे लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता के समान है। भराड़ी के माध्यम से हम सूर्य से ऊर्जा, चंद्रमा से शांति, वृक्षों से जीवन और पृथ्वी से धैर्य का संदेश लेते हैं। यही कारण है कि भराड़ी में बनाया गया हर चित्र एक दर्शन, एक संदेश और एक आशीर्वाद होता है।
परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम
आज जब गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ रहा है, तब यह चुनौती भी है कि कहीं हम अपनी परंपराओं से दूर न हो जाएं। ऐसे समय में श्री मानसिंह जी भूरिया जैसे व्यक्तित्व, जो एक शासकीय सेवक होने के साथ-साथ निष्ठावान स्वयंसेवक भी हैं, उनके परिवार द्वारा भराड़ी जैसी परंपरा का पालन करना पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है। यह संदेश देता है कि आधुनिक जीवन जीते हुए भी अपनी संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है। मैं आधुनिक भारत के युवाओं से विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि वे अपनी संस्कृति, पूजा पद्धति और परंपराओं को केवल अतीत की चीज न समझें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
भराड़ी जैसी परंपराएं हमें हमारी पहचान देती हैं, हमें हमारी जड़ों से जोड़ती हैं और हमें यह सिखाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर कैसे जीवन जिया जाए। यदि हम आज इन परंपराओं की रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। हमारी संस्कृति ही हमारी असली पूंजी है, यही हमारी शान है, यही हमारा गौरव है। भराड़ी केवल विवाह की एक रस्म नहीं, बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति और प्रकृति-पूजा की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह हमें गर्व से सिर ऊंचा करके यह कहने का अधिकार देती है कि
“मेरी संस्कृति, मेरी पूजा पद्धति, मेरी परंपरा मेरा अभिमान है।” हम सभी मिलकर अपनी इस अनोखी, विशिष्ट और गौरवशाली परंपरा को सहेजें, संजोएं और आने वाली पीढ़ियों तक पूरे गर्व के साथ पहुंचाएं।
✍️(श्री कटारा(माध्यमिक शिक्षक)
ग्राम मदरानी, तहसील मेघनगर, जिला झाबुआ, मप्र)



