भारत के पवित्र तीर्थ स्थलों की रूह: कंक्रीट और कारोबारी बाजार को भेंट

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बनारस: तीन दशक पहले मुरैना के 85 वर्षीय सीताराम एक ऐसी यात्रा पर निकले थे, जो आज की पीढ़ी के लिए लगभग कहानी बन चुकी है। नंगे पाँव बद्रीनाथ तक पैदल। न कोई टाइम-टेबल, न ऑनलाइन बुकिंग, न वीआईपी पास। हिमालय की पथरीली पगडंडियाँ, होंठों पर भजन, और तारों से ढकी रातों में साथ चलते अनजान लोग, यही उनकी दौलत थी। रास्ते में सब मिलकर सादी रोटियाँ खाते, एक सुर में “ॐ जय बद्रीनाथ-हरि” गाते। थकान होती थी, पर मन हल्का रहता था। लौटकर उन्होंने गोवर्धन की 21 किलोमीटर की परिक्रमा की। हर कदम भक्ति था। हर ठहराव एक कथा। बुज़ुर्गों से कृष्ण की लीलाएँ सुनते और भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस करते।

आज सीताराम उस दौर को याद कर गहरी साँस लेते हैं। तीर्थयात्रा अब पैरों की नहीं, मशीनों की हो गई है। भजन की जगह हॉर्न हैं। कीर्तन पर मोबाइल की घंटियाँ भारी हैं। ठहरकर मनन करने की जगह जल्दबाज़ी है, सेल्फ़ी, रील, चेकलिस्ट। जो यात्रा कभी आत्मा को छूती थी, वह अब पर्यटन पैकेज बन गई है। सुविधाजनक है, तेज़ है, पर भीतर से ख़ाली। आस्था अब भी है, मगर सामूहिक अनुभूति और वह सुकून कहीं खो गया है। भारत के प्राचीन तीर्थ, जिन्हें सदियों तक साधना का केंद्र माना गया, आज सुनियोजित ढंग से बाज़ारू पर्यटन स्थलों में बदले जा रहे हैं। नतीजा, पर्यावरण की तबाही, संस्कृति का क्षरण और एक गहरा आध्यात्मिक संकट।

मैसूरु की चामुंडी पहाड़ियाँ इस बदलाव की साफ़ तस्वीर हैं। 1,058 मीटर ऊँची यह पहाड़ी देवी चामुंडेश्वरी का धाम है। कभी भक्त पुराने पत्थरों की सीढ़ियाँ चढ़ते थे। अब यहाँ “सौंदर्यीकरण” के नाम पर 45 करोड़ रुपये की योजना उतर आई है। PRASHAD योजना, जो तीर्थ सुविधाएँ बढ़ाने का दावा करती है, यहाँ चौड़ी सड़कें, रोपवे, एम्फ़ीथिएटर और दो हज़ार गाड़ियों की पार्किंग ले आई। यह सब एक नाज़ुक पारिस्थितिकी पर, जहाँ ज़रा-सी छेड़छाड़ भूस्खलन बुला सकती है। स्थानीय लोग, पर्यावरणविद्, मंदिर प्रबंधन, सबने पर्यावरण प्रभाव आकलन की माँग की। पर काम चलता रहा। जनवरी 2026 में विरोध भड़का, तब जाकर रुका। हाईकोर्ट ने भी चेताया, 200 से ज़्यादा वनस्पतियाँ और संकटग्रस्त काला हिरण ख़तरे में हैं। सवाल सीधा है: क्या राजनीति इस पवित्र पहाड़ी को कंक्रीट का जंगल बना देगी?

यह कहानी एक जगह की नहीं। वाराणसी का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर भीड़ तो बढ़ाया है, पर गंगा को साफ़ नहीं कर पाया। हज़ारों करोड़ खर्च हुए, फिर भी नदी में गंदगी बह रही है। जो गंगा शुद्धि की प्रतीक थी, वह कई जगह ज़हरीली जीवनरेखा बन चुकी है। वृंदावन में यमुना और भी बदहाल है, अमोनिया, झाग, मरी हुई मछलियाँ। फिर भी करोड़ों श्रद्धालु आते हैं। ढाँचा चरमरा रहा है, नदी दम तोड़ रही है।

चारधाम परियोजना ने हिमालय को और असुरक्षित बना दिया। रास्ते चौड़े हुए, पहाड़ कटे, विस्फोट हुए। नतीजा, भूस्खलन, धँसते गाँव, जोशीमठ जैसा संकट। पहाड़ों में विकास का मतलब अगर बुलडोज़र है, तो यह विकास नहीं, निमंत्रण है आपदा को।

धीरे-धीरे साधना लेन-देन बन रही है। केदारनाथ में हेलिपैड, आश्रमों की जगह लग्ज़री रिसॉर्ट। दर्शन समयबद्ध। वैष्णो देवी में लोग कहते हैं, आध्यात्मिक माहौल कम हो गया है। दुआ से ज़्यादा ध्यान तस्वीरों पर है। शांति पर शोर हावी है।

आर्थिक दावे भी अधूरे सच हैं। अयोध्या जैसे प्रोजेक्ट्स में कमाई का बड़ा हिस्सा बाहरी ठेकेदारों के पास जाता है। स्थानीय लोगों को मिलती है महँगाई। किराए तीन गुना तक बढ़ते हैं। जंगल कटते हैं, प्लास्टिक जमा होता है। पवित्र इलाक़ों में शराब-मांस की दुकानें घुस आती हैं। पुजारी मैनेजर बन जाते हैं। दर्शन एक जल्दबाज़ी का दृश्य बन जाता है। भीतर की यात्रा बस टिक-मार्क।

यह संकट सिर्फ़ भारत का नहीं। मक्का, वेटिकन, बोधगया, हर जगह भीड़, कचरा, प्रदूषण और आध्यात्मिकता का पतलापन। ओवर-टूरिज़्म भक्ति की आत्मा को घिस देता है।

हल हैं, आगंतुक सीमा, इको-ज़ोन, पैदल क्षेत्र, ज़ीरो-प्लास्टिक नियम, और समुदाय के हाथ में प्रबंधन। पर राजनीतिक इच्छाशक्ति कमज़ोर है। तात्कालिक फ़ायदे भारी हैं।

कभी पहाड़ विनम्रता सिखाते थे। नदियाँ नवजीवन का गीत गाती थीं। आज वे चेतावनी दे रही हैं। अगर बुलडोज़र यूँ ही चलते रहे, तो हम सिर्फ़ प्रकृति और विरासत नहीं खोएँगे, हम आस्था की रूह को कंक्रीट और नीयॉन के नीचे दफ़्न कर देंगे। चुनाव हमारे हाथ में है, इन स्थलों को आत्मिक परिवर्तन का केंद्र बनाएँ, या उन्हें कारोबार के हवाले कर दें। यही तय करेगा कि भारत की पवित्र विरासत ज़िंदा रहेगी, या सिर्फ़ उनसे जुड़े कहानी किस्से, यादों में।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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