भारत की धीमी रफ्तार में छिपा सुकून का राज़

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जयपुर । पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आँखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपने sunset years में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापिस खींच लिया।

“बच्चे अपने-अपने शहरों में सेटल हैं। पत्नी का इंतक़ाल हो चुका है। अमेरिका के उस बड़े, सलीकेदार, महलनुमा घर में न कोई बात करने वाला था, न हाल पूछने वाला। सुविधाएँ थीं, लेकिन अपनापन नहीं। हेल्थ इंश्योरेंस था, पर हेल्थ नहीं। अकेलापन हर कमरे में पसरा रहता था। आख़िरकार मैने तय किया, ज़िंदगी लंबी नहीं, जीने लायक होनी चाहिए। और भारत लौट आया,” भाटिया जी ने बताया।

भाटिया जी कोई अपवाद नहीं हैं। पश्चिमी दुनिया में बसे हज़ारों भारतवंशी, तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद भीतर से खाली हैं। जानकर लोग बताते हैं कि वहाँ सिस्टम है, अनुशासन है, सुरक्षा है, पर रिश्तों की गर्माहट नहीं। और जब उम्र बढ़ती है, तो एहसास होता है कि बैंक बैलेंस से ज़्यादा ज़रूरी है, कोई हाल पूछने वाला।

हम तरक़्क़ी को अक्सर पश्चिमी पैकेज में देखते हैं, स्टील और ग्लास के टावर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, और हर वक़्त की थकान। मगर भारत में अब भी रफ्तार मध्यम है। हौले-हौले चलती ज़िंदगी। यही असल में पर्यावरण-फ्रेंडली, किफ़ायती और टिकाऊ जीवनशैली है। यहाँ सुकून कोई शो-पीस नहीं, रोज़मर्रा की आदत है। और कई बार यही ख़ामोश ऐश, सबसे बड़ी अमीरी बन जाती है।

दिल्ली की धुँधली सुबह में सड़क किनारे चाय की चुस्कियाँ, बेंगलुरु में ऑफिस से पहले खिचड़ी और हँसी, मुंबई की लोकल में साझा जगह, आगरा की नुक्कड़ पर हलवाई का खोमचा, भटियारे की तवा-गपशप, इन सबमें एक आराम का रिदम छिपा है। कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस बहाव है। ज़िंदगी दौड़ नहीं, साथ चलना है।

विदेश में ज़िंदगी अक्सर काम और बिलों के बीच पिसती है। यहाँ एक समोसे पर भी UPI से मुस्कुराता हुआ “पेमेंट साउंड” आता है। टेक्नोलॉजी यहाँ दबाव नहीं बनाती, बस मदद करती है। ऑटो वाला डिजिटल है, लेकिन अब भी इंसान है, रास्ता भी बताएगा और हाल भी पूछ लेगा।

आज की सबसे बड़ी लग्ज़री वक़्त है, और भारत में वह अब भी बचा है। मदद यहाँ अमीरों की ऐय्याशी नहीं, हर घर की हक़ीक़त है। सुबह दरवाज़े की घंटी से ज़िंदगी जागती है, कुक, वॉशर, दूधवाला, डिलीवरी बॉय, सब आपकी आदतों से वाक़िफ़ हैं, बिना कोई डेटा प्राइवेसी पॉलिसी पढ़े। वर्क-लाइफ़ बैलेंस यहाँ किसी पॉडकास्ट से नहीं, इन्हीं लोगों से आता है।

इलाज की बात करें तो हाँ, अस्पतालों में भीड़ है, अव्यवस्था है, लेकिन काम होता है। आज डॉक्टर ने देखा, तो शाम तक रिपोर्ट। बुख़ार बढ़े, इससे पहले दवा घर पहुँच जाती है। कई देशों में अपॉइंटमेंट के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता है; यहाँ ज़्यादा से ज़्यादा लिफ़्ट का।

भारत की “राम भरोसे” व्यवस्था चिल्लाती नहीं, मगर चलती रहती है। “यह एक अजीब-सी दक्षता है, अराजक दिखने वाला अनुशासन, जो किसी तरह काम कर ही जाता है,” कहते हैं बुजुर्ग डॉ प्रधान।

और समाज, यहाँ अब भी रिश्ते हैं। रेस्तराँ में पानी मुफ़्त आता है, और कभी-कभी मुस्कान भी। मोहल्लों में दरवाज़े अब भी चेहरे पहचानते हैं। यहाँ इंसान, अब भी इंसान से जुड़ा है, किसी ऐप से नहीं।

रिटायर्ड बैंकर प्रेम भाई कहते हैं, “यह कम्फ़र्ट सिर्फ़ रईसों के लिए नहीं। भारत में मिडिल क्लास भी आराम से रह सकता है, अगर उसे दिखावा न चाहिए। विदेशी तनख़्वाह के साथ तो यह जगह सचमुच स्वर्ग ही समझो।”

पश्चिमी दुनिया के विशेषज्ञ प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, “वेस्ट में मिडिल क्लास हमेशा बीमा, टैक्स, किराए और पढ़ाई के बोझ तले दबी रहती है। भारत में वही पैसा घर, मदद, आराम और इज़्ज़त खरीद लेता है। ड्राइवर, कुक, डिलीवरी, जो वहाँ लग्ज़री हैं, यहाँ ज़िंदगी का हिस्सा हैं। यही असली बराबरी है।”

फिर संस्कृति, भारत में त्योहार रुकते नहीं, साल भर चलते हैं। दीवाली हो या क्रिसमस, घर बोलते हैं, लोग नाचते हैं। कोई अपॉइंटमेंट नहीं चाहिए, बस दरवाज़ा चाहिए। पश्चिम अपने अकेलेपन से थेरेपी में लड़ता है, भारत उसे चाय में घोल देता है, या नाचते गाते कीर्तन में उड़ा देता है।

रूहानियत यहाँ हॉबी नहीं, हवा में घुली है। वाराणसी के घाट, ऋषिकेश की सुबह, हिमालय की ख़ामोशी, इनके लिए पासवर्ड नहीं चाहिए, बस दिल चाहिए। जहाँ पश्चिम माइंडफुलनेस बेचता है, भारत उसे जीता है, अनजाने में ही। कश्मीर की हसीन वादियों में एक सप्ताह बिताकर लौटे जगन मुक्ता दंपत्ति कहते हैं, “मजा आ गया, वाकई जन्नत है, कितनी वैरायटी और आकर्षण हैं अपने देश में!”

यह सच है कि भारत में असमानताएँ हैं। सड़कें टूटी हैं, सिस्टम अधूरा है। लेकिन रिश्ते अब भी जुड़े हुए हैं। और शायद यही सबसे बड़ी बात है। जब ज़िंदगी इतनी मानवीय ढंग से, इतनी आसानी से चल सकती है, तो उसे किसी चमकदार छत और ऊँची तनख़्वाह के नीचे क्यों ख़रीदा जाए?
भारत अब भी वह जगह है, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी अपने आप में लग्ज़री बन जाती है। और अगर आपके पास थोड़ा-सा विदेशी पैसा है, तो माफ़ कीजिए, आप राजा हैं। क्योंकि यहाँ सच्ची ऐश वो नहीं जो दिखती है, बल्कि वो है जिसकी फिक्र आपको करनी ही नहीं पड़ती।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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