भारत की कार्य संस्कृति में घातक अत्यधिक अवकाश

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विजय मनोहर तिवारी
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भोपाल। शोध के केंद्र में भारत हो, इस ध्येय का अर्थ क्या है? क्या केवल भारत का इतिहास, संस्कृति, परंपरा और धर्म। यह एक सैद्धांतिक बात है। हम भारत के किस केंद्र की ओर संकेत कर रहे हैं। हम भारत के केंद्र के रूप में क्या अर्थ ले रहे हैं, यह देखना भी जरूरी है।

हमें भारत की मौलिकता के केंद्र पर लौटना जरूरी है। भारत ने अपने दस हजार साल से अधिक की लंबी यात्रा में बहुत कुछ मौलिक रचा है। धर्म की अवधारणा, कर्म के सिद्धांत, विविध कलाओं के विकास, स्थापत्य के आश्चर्य, योग और ध्यान की एकाग्रताएँ, आंतरिक उपलब्धि का मनोविज्ञान, प्रकृति के साथ साहचर्य, जीवन-मरण और पुनर्जन्म के विचार और समयानुकूल इनमें सुधार-संशोधन।

मगर आज का भारत विचित्र किस्म के विरोधाभासों से भरा हुआ है। कर्म और कर्मफलों पर इतिहास प्रसिद्ध व्याख्यान देने वाले योगेश्वर श्रीकृष्ण को भारत ने अपनी सर्वोच्च स्मृतियों में सहेजा हुआ है। निरंतर कर्म करते हुए फल की आकांक्षाएँ न करने वाला विचार। मगर एक हजार साल लंबे संघर्ष के बाद स्वाधीन हुआ भारत आज संसार में सर्वाधिक अवकाशों का आनंद लेने वाला एक देश भी है।

मैं एक साल पहले देश के सबसे बड़े मीडिया विश्वविद्यालय में कुलगुरु बनकर आया और यह देखकर कुछ हैरान और कुछ दुखी हुआ कि हर महीने औसत दस अवकाश हैं। अनेक अवकाश ऐसे हैं जो बिन माँगे मिले हैं। चार वर्ष के 48 महीनों में 480 दिन अवकाश के हैं। ये लगभग सोलह महीने होते हैं। अनेक महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथियाँ हम पूरे दिन के अवकाशों में निष्क्रिय रहकर मनाते हैं। इनमें श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी भी शामिल है और हम कर्म के सिद्धांत में विश्वास करने वाले अद्भुत समाज हैं।

उच्च शिक्षा जगत की मौजूदा स्थितियों को देखते हुए मैं कहूंगा कि अवकाशों को कम करने के विषय में एक विमर्श होना चाहिए। मैं महात्मा गाँधी की जयंती के दिन घर पर ही उनके चित्र पर दो फूल चढ़ाकर रास्ते में वैष्णव जन गाते हुए ऑफिस में दस घंटे काम करना चाहता हूँ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर हम रात आठ बजे तक काम करें, एक ऐसे अवतार की स्मृति में जिसने कर्म करने की बात कही थी और जिसे हम पाँच हजार साल बाद भी नहीं भूले हैं। हम कर्म करना भूल रहे हैं। अवकाशों ने हमें अकर्मण्यता की सीमा तक लाकर छोड़ दिया है। अवकाश कब अधिकार बन गए हमें पता ही नहीं चला शनिवार-रविवार के आसपास कोई जयंती या पुण्यतिथि हमारी खुशी को दो गुना कर देती है।

हम एक ऐसे देश को अपने आसपास विकसित होता हुआ देख रहे हैं, जिसके प्रधानमंत्री बिना अवकाश लिए काम करते हैं। मगर हमें सारे अवकाश चाहिए। प्रधानमंत्री ने 2047 में एक आत्मनिर्भर और शक्तिसंपन्न भारत का लक्ष्य रखा है, जो विश्वगुरु होगा। इसके लिए हमें दो गुनी गति से काम करने की जरूरत है। हमें अपने विभागों और संस्थानों में काम के दिन बढ़ाने की जरूरत है। बीते दो दशक में बढ़ी महंगाई के अनुपात में विभिन्न वेतनमानों की बढ़ोतरी ने सेलरियों में आसमानी उछाल पैदा किया है। इस दृष्टि से काम के घंटे घटे ही होंगे और किसी के चेहरे पर शिकन नहीं है।

विश्वविद्यालयों को इस बारे में सोचना चाहिए। शोध संस्थानों को प्रयास करना चाहिए। सामाजिक संगठनों को पहल करना चाहिए। यह चर्चा होना चाहिए कि लगातार बढ़ते अवकाश विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा हैं। स्वाधीन भारत में 80 साल बाद एक मौलिक दिशा में हमारी सोच आगे बढ़नी चाहिए। कर्म के सिद्धांत हजारों साल पुराने हैं मगर इस समय यह एक मौलिक विचार होगा कि हम अधिक से अधिक काम पर लौटें और अवकाशों की अकर्मण्यता आकांक्षाओं से बाहर निकलें। सरकारी तंत्र की नाकामियों के लिए जिम्मेदार कारणों में एक बड़ा कारण अवकाश और अवकाशों की राजनीति है।

इस शोधार्थी समागम में आए प्रतिनिधि अपने संस्थानों में लौटकर इस विषय पर विचार करें। विमर्श छेड़ें। अन्यथा किसी भी विषय पर शोध करें, तय मानें कि भारत का केंद्र हिला हुआ ही रहेगा।

( दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के तीन दिवसीय शोधार्थी समागम के दूसरे संस्करण के समापन सत्र में)

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