दिल्ली। यह दावा कि भारत ने अमेरिका से पूछा कि क्या हम रूस से तेल खरीद सकते हैं, और फिर अमेरिका ने ‘छूट’ दे दी-यह पूरी तरह से गलत है। यह कहानी भारत की संप्रभुता और ऊर्जा नीति को कमजोर दिखाने की कोशिश है।
असली कहानी क्या है?
6 मार्च 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने एक अस्थायी 30 दिनों की छूट (waiver) जारी की। यह छूट रूसी मूल के तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के लिए है, जो 5 मार्च 2026 तक जहाजों पर लोड हो चुके थे। यह छूट केवल भारत को उन कार्गो को खरीदने और प्राप्त करने की अनुमति देती है, जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने खुद कहा कि यह कदम “वैश्विक बाजार में तेल का बहाव जारी रखने” के लिए है। इसका मकसद पश्चिम एशिया (ईरान संकट और होरमुज़ जलडमरूमध्य पर तनाव) से सप्लाई में रुकावट को कम करना है, ताकि दुनिया भर में तेल की कीमतें अचानक न बढ़ें।
यह फैसला अमेरिका का अपना एकतरफा कदम है। इसमें भारत की कोई आधिकारिक मांग या अनुरोध शामिल नहीं है। अमेरिका ने यह इसलिए किया क्योंकि ईरान से जुड़े तनाव से वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है। अगर सप्लाई रुकती है, तो कीमतें बढ़ती हैं-जिसका असर अमेरिका की अपनी अर्थव्यवस्था, महंगाई और राजनीति पर पड़ता है। इसलिए उन्होंने एक छोटी, सीमित छूट दी, जो केवल फंसे कार्गो पर लागू है और रूस को ज्यादा फायदा नहीं पहुंचाएगी।
भारत की ऊर्जा नीति कभी ‘परमिशन’ पर नहीं टिकी
भारत तीन साल से ज्यादा समय से रूस से तेल खरीद रहा है। यह खरीद कभी कम हुई, कभी बढ़ी-सब बाजार की स्थिति, कीमत, उपलब्धता और राष्ट्रीय हित के आधार पर। जनवरी 2026 में रूसी तेल का हिस्सा कम हुआ था, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में जोखिम बढ़ने पर रिफाइनरों ने फिर से रूसी कार्गो उठाने शुरू किए। यह सामान्य प्रक्रिया है। कोई भी समझदार देश सस्ता, भरोसेमंद और समय पर मिलने वाला तेल चुनता है। इसमें किसी देश से ‘हाँ’ या ‘नहीं’ की जरूरत नहीं पड़ती।
भारत 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। पेट्रोलियम मंत्रालय या विदेश मंत्रालय किसी बाहरी दबाव से फैसला नहीं लेते। फैसले बाजार की जरूरत, सप्लाई रिस्क, रिफाइनरी की क्षमता और देश के हित पर आधारित होते हैं। अमेरिका की इस छूट का भारत के फैसले से कोई सीधा संबंध नहीं। भारत ने न मांगा, न इंतजार किया।
यह छूट किसके लिए ज्यादा फायदेमंद है?
यह कदम मुख्य रूप से अमेरिका के अपने हित में है। वैश्विक तेल बाजार स्थिर रहे, कीमतें न उछलें—यह अमेरिका की महंगाई और अर्थव्यवस्था को बचाता है। भारत को फायदा मिल सकता है, लेकिन यह कोई ‘उपकार’ नहीं। भारत अपना तेल वही लेगा जहां सस्ता, सुरक्षित और फायदेमंद हो।
जो यह कहानी फैला रहे हैं
जो लोग इसे ‘इजाज़त मांगने’ की कहानी बना रहे हैं, वे या तो जियोपॉलिटिक्स नहीं समझते या जानबूझकर गलत नैरेटिव चला रहे हैं। भारत की संप्रभुता रोज के फैसलों में दिखती है—न कि किसी की मुहर या ट्वीट में। भारत अपने हित में फैसला खुद करता है, बिना किसी से पूछे। यह सच्चाई है, और इसे तोड़-मरोड़कर पेश करना देश की मजबूत नीति को कमजोर दिखाने की नाकाम कोशिश है।



