भीतर के रण का विजेता ही ‘महावीर’

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प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । कभी खुद से पूछिए कि वीर कौन होता है? वह, जो तलवार की धार पर इतिहास लिख दे या वह, जो अपने ही भीतर के तूफानों को थाम ले?

एक क्षत्रिय… राजमहलों में जन्मा, जिसके हिस्से में राज्य भी था, शक्ति भी थी, शौर्य भी था, पर उसने न सिंहासन चुना, न शस्त्र उठाया, न विजय का शोर किया, किसी चींटी तक को आहत नहीं किया और फिर भी वह ‘महावीर’ कहलाया।

यह इतिहास का विरोधाभास नहीं, यह आत्मा का उत्कर्ष है क्योंकि असली युद्ध बाहर नहीं भीतर होता है। और जो भीतर जीत ले, वही विराट होता है।

जैन परंपरा का यह अद्भुत सत्य है कि सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में जन्मे अर्थात जिनके संस्कारों में साहस, संयम और संघर्ष स्वाभाविक थे। लेकिन उन्होंने क्षत्रियत्व को शस्त्रों से नहीं, शील से सिद्ध किया… बाहुबल से नहीं, आत्मबल से प्रतिष्ठित किया।

भगवान महावीर में वही क्षत्रिय चेतना एक नए शिखर पर दिखती है। जहां युद्ध था, पर भीतर के विकारों से। जहां विजय थी, पर वासनाओं पर, जहां पराक्रम था, पर करुणा के साथ।

यह क्षत्रियत्व का सर्वोच्च स्वरूप था, जहां तलवार छूट गई, पर तेज नहीं। जहां राजसत्ता त्यागी गई, पर आत्मसत्ता जाग उठी।

और यही उनका त्याग है, तप है। एक ऐसा मौन विद्रोह, जिसने सत्ता को नहीं, स्वयं को पराजित किया। यह पलायन नहीं था, यह अपने ही भीतर के साम्राज्य को जीत लेने का साहस था।

हम सब अपने-अपने जीवन के सैनिक हैं, पर हमारी तलवारें बाहर की ओर तनी रहती हैं और भीतर बैठा शत्रु काम, क्रोध, लोभ, लिप्सा, अहंकार हमें चुपचाप पराजित करता रहता है।

महावीर ने इन्हें जीता इसलिए वे ‘अरिहंत’ हुए, अपने ही भीतर के ‘अरि’ का अंत करने वाले। उत्तराध्ययन की गाथा जैसे हमें झकझोरती है कि हजारों को जीतना बड़ी बात नहीं, एक बार खुद को जीत कर तो देखो…

आज हम क्रांति की बातें करते हैं। समाज बदलने, व्यवस्था बदलने और दुनिया बदलने का ऐलान करते हैं। पर क्या हमने खुद को बदलने की हिम्मत जुटाई?

क्योंकि सच यह है कि भीतर की क्रांति के बिना बाहर का परिवर्तन सिर्फ दिखावा है… सिर्फ पाखंड है।

महावीर का मार्ग मंदिरों में बंद नहीं है, वह जीवन की धड़कनों में बहता है, अहिंसा में, सत्य में, अपरिग्रह में प्रवाहित होता है। हर उस क्षण में, जब आप प्रतिक्रिया नहीं, संयम चुनते हैं। और ‘अनेकान्तवाद’… यह केवल दर्शन नहीं, संवाद की सभ्यता है।

यह सिखाता है कि सत्य किसी एक का नहीं होता…तुम भी सही हो सकते हो, मैं भी… और शायद दोनों मिलकर ही सत्य बनते हैं।

‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यानी जीवन का मूल संदेश यही है कि हम एक-दूसरे से जुड़े हैं… हम अलग नहीं, परस्पर हैं।

आज जब दुनिया विचारों की तलवारों से कट रही है, जब धर्म संवाद नहीं, दंभ बनता जा रहा है, जब शक्ति संयम नहीं, वर्चस्व में बदल रही है तब महावीर का संदेश केवल प्रासंगिक नहीं…अनिवार्य हो जाता है।

और शायद यहीं आकर महावीर इतिहास नहीं रहते… धड़कन बन जाते हैं। वह तप, जो कभी वन की निर्जन नीरवता में जपा गया था, वही आज भी परंपराओं की पलकों पर जलता दिखाई देता है। गोरक्षपीठ की साधना में वह मौन मंथन आज भी सुनाई देता है, यहां शब्द नहीं, साधना बोलती है, यहां वेग नहीं, विवेक मार्गदर्शक बनता है; और यहां विजय किसी और पर नहीं, स्वयं के विकारों पर अर्जित होती है।

गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जी का व्यक्तित्व भी उसी साधना का समकालीन स्वरूप प्रतीत होता है, मानो तप ने तंत्र का स्वरूप धारण कर लिया हो… जैसे साधना ने शासन को स्पर्श कर लिया हो। जहां निर्णय कठोर हो सकते हैं, पर उनका मूल करुणा में भीगा होता है। जहां अनुशासन दृढ़ होता है, पर भीतर एक संत की साधना भी साथ चलती है। मानो महावीर कहीं गए ही नहीं… समय के साथ बस स्वर बदलते गए… कभी वीतराग बनकर, कभी योगी बनकर, और कभी जनसेवा के संकल्प में ढलकर।

महावीर का त्रिरत्न सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र, जीवन का पूर्ण सूत्र है। सही देखो… सही समझो… और सही जियो। क्योंकि जो जिया नहीं गया, वह सत्य नहीं सिर्फ शब्द है।

और अंत में…बस इतना याद रखिए कि क्षत्रिय होना केवल युद्ध करना नहीं, धर्म के लिए खड़ा होना है।

और महावीर हमें सिखाते हैं कि सबसे बड़ा धर्म बाहर से पहले अपने भीतर को जीतना है। विरोध से पहले विवेक को जगाना है और जीवन को केवल जीना नहीं समझना है। क्योंकि सच यही है… महावीर होना कोई उपाधि नहीं, यह अपने भीतर के अंधेरे से रोज-रोज जीतने की प्रक्रिया है… और जिसने मन के महाभारत को जीत लिया, वह काल की सीमाओं से परे, कालजयी ‘महावीर’ बन जाता है।

धर्मावतार भगवान महावीर की जय!

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