“बिग बॉस – भारत का राष्ट्रीय तमाशा, जहाँ झगड़ा देखने की भूख मिटती है और दिमाग की भूख मर जाती है”

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भारत में बिग बॉस कौन देखता है?बिग बॉस मुख्य रूप से भारत के निम्न-मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग का मनोरंजन है। 18-45 आयु वर्ग की महिलाएँ (खासकर गृहिणियाँ), छोटे शहरों-कस्बों के युवा, कॉलेज स्टूडेंट्स, और वो लोग जो दिन भर की थकान के बाद “कुछ मसालेदार” देखना चाहते हैं – यही इसका कोर ऑडियंस है। TRP डेटा बताता है कि B और C टियर शहरों में इसकी रीच सबसे ज्यादा है। अमीर तबका शायद ही देखता हो, और उच्च शिक्षित अर्बन एलीट तो इसे “कचरा” कहकर नाक सिकोड़ता है। यानी ये वही वर्ग है जो रोज़ सुबह सास-बहू सीरियल देखता है और रात में बिग बॉस देखकर सोता है – मनोरंजन का “जंक फूड”।बिग बॉस का 18 साल का सफर (2006-2025 तक)2006 में कलर्स चैनल ने नीदरलैंड्स के बिग ब्रदर फॉर्मेट को कॉपी करके बिग बॉस लॉन्च किया। पहला सीजन शिल्पा शेट्टी ने होस्ट किया था – वो सीजन अभी तक सबसे सभ्य और देखने लायक माना जाता है। फिर अर्शी खान, संगीता घोष, शिल्पा शिंदे जैसे कई होस्ट आए-गए, लेकिन 2010 से सलमान खान ने कुर्सी पर कब्ज़ा जमा लिया। सलमान के आते ही शो का DNA बदल गया – अब ये कम रियलिटी शो था, ज्यादा “सलमान खान का वीकेंड तमाशा” बन गया।
पिछले 18 सीजनों में हमने सब देख लिया:
  • राहुल रॉय से लेकर मुन्नवर फारूकी तक के विनर
  • राखी सावंत का “ईश्वर की दुआ” वाला ड्रामा
  • सिद्धार्थ शुक्ला का गुस्सा, आसिम रियाज़ का स्वैग
  • पूजा मिश्रा का “पलट-पलट” वाला पैन
  • अली क़ुली मिर्ज़ा का “बाहर जाकर मारूंगा” वाला डायलॉग
  • एल्विश यादव का “सिस्टम” वाला ज्ञान

हर सीजन में एक फॉर्मूला दोहराया जाता है: 4-5 कंटेस्टेंट को पहले से “कैरेक्टर” दे दो – एक गुस्सैल, एक रोने वाला, एक फ्लर्ट, एक “सच्चा इंसान”, एक विलेन। फिर उन्हें एक घर में बंद कर दो, कैमरे लगा दो, टास्क दो, झगड़ा करवाओ, वोटिंग करवाओ। जनता वोट करती है, विज्ञापनदाता पैसा कमाते हैं, चैनल TRP बटोरता है। बस।सलमान खान का जादू और कीमतअब बिग बॉस का मतलब सलमान खान ही है, ठीक वैसे ही जैसे KBC का मतलब अमिताभ बच्चन। सलमान आते ही रेटिंग 30-40% बढ़ जाती है। उनका “ये क्या कर रहे हो यार”, “भाई लोग”, “ओ तेरी” जैसे डायलॉग मीम बन जाते हैं। लेकिन यही सलमान शो की सबसे बड़ी कमज़ोरी भी हैं – वो अपने फेवरेट कंटेस्टेंट को बचाते हैं, दूसरों को डांटते हैं, नैरेटिव कंट्रोल करते हैं। शो “रियलिटी” से “स्क्रिप्टेड ड्रामा” बन चुका है।आलोचना – जो सबको पता है पर कोई बोलता नहीं

  1. मानसिक स्वास्थ्य की धज्जियाँ – कंटेस्टेंट को 3 महीने तक नींद से, प्राइवेसी से, बाहर की दुनिया से काट दो, फिर अपमान करो, भड़काओ, ट्रिगर करो। डिप्रेशन, एंग्जायटी, सुसाइडल विचार – ये सब हो चुके हैं।
  2. जहरीली भाषा और हिंसा को ग्लैमराइज़ करना – गाली-गलौच, बॉडी शेमिंग, कैरेक्टर असैसिनेशन को मनोरंजन” बेचा जाता है।
  3. फेक रिलेशनशिप और ब्रेकअप – शो के अंदर बने “रोमांस” बाहर आते ही टूट जाते हैं, लेकिन उससे पहले जनता को बेवकूफ बनाया जाता है।
  4. जाति-धर्म-क्षेत्रवाद को भड़काना – वोट बैंक के लिए कंटेस्टेंट को उनके बैकग्राउंड से जज किया जाता है।

फिर भी लोग क्यों देखते हैं?क्योंकि भारत में “दूसरों का झगड़ा” देखना सबसे सस्ता और मीठा नशा है। यही कारण है कि 18 साल बाद भी ये चल रहा है।इसे बेहतर बनाने के सुझाव

  1. साइकोलॉजिस्ट की टीम 24×7 रखो, न कि सिर्फ नाम के लिए।
  2. गाली-गलौच और हिंसा पर सख्त सजा – सीधे बाहर निकालो।
  3. स्क्रिप्टेड टास्क कम करो, असली रियलिटी दिखाओ।
  4. सलमान को वीकेंड पर सिर्फ होस्ट बनाओ, जज बनने से रोक दो।
  5. कंटेस्टेंट की मेंटल हेल्थ हिस्ट्री चेक करो, ट्रिगर करने वाले लोगों को मत डालो।
  6. कॉमन मैन को सचमुच मौका दो, हर बार सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर क्यों?

अंत में एक कड़वा सच: बिग बॉस को बेहतर बनाने की ज़रूरत नहीं है। ये जितना घटिया, जितना जहरीला, जितना फेक है – उतना ही चलता है। ये शो नहीं, समाज का आईना है। हम जैसा समाज हैं, वैसा ही हमारा “राष्ट्रीय तमाशा” है।
तो फिर मिलते हैं – वही झगड़ा, वही ड्रामा, वही “भाईजान की डांट”। क्योंकि भारत में यही चाहिए।
बाकी अच्छे कन्टेंट के लिए ओटीटी के खजाने में कोई कमी नहीं है। पर जिसे सस्ते नशे का शौक हो, उसे अच्छा कन्टेंट चाहिए नहीं। मतलब बिग बॉस में ‘भाई जान का जलवा’ है। जो सालों से कायम है। उनके एटीट्यूड के भी यहां लाखों दीवाने हैं।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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