बिहार में पंचायत स्तर पर पारदर्शिता की क्रांति: क्या कोई राजनीतिक दल उठाएगा यह जोखिम?

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पटना। बिहार, एक ऐसा राज्य जहां की मिट्टी में मेहनत और संघर्ष की कहानियां बसी हैं, लेकिन भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों ने इसकी प्रगति को बार-बार बाधित किया है। क्या होगा अगर बिहार में कोई राजनीतिक दल पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल कायम कर दे, ठीक वैसे ही जैसे एक दौर में सूचना के अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ताओं ने देश भर में गड़बड़ियों को उजागर किया था? यह एक ऐसा सवाल है जो बिहार की राजनीति और समाज को नई दिशा दे सकता है।

कल्पना करें कि किसी राजनीतिक दल के प्रखंड स्तर के कार्यकर्ता अपने निर्वाचित मुखिया, वार्ड सदस्यों और पंचायत प्रतिनिधियों से हिसाब-किताब मांगना शुरू कर दें। वे पंचायत की बैठकों में खर्चों का ब्यौरा मांगें, ठीक उसी तरह जैसे आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार के पर्दे उठाए गए थे। अगर ये कार्यकर्ता अंचल कार्यालयों में हेल्प डेस्क बनाकर ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान करें, जमीन विवाद से लेकर सरकारी योजनाओं के लाभ तक पहुंचाने में मदद करें, तो यह एक क्रांतिकारी कदम होगा। इससे न केवल जनता का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।

सबसे जोखिम भरा लेकिन प्रभावशाली कदम होगा पंचायत में हुए खर्चों का हिसाब सार्वजनिक करना। अगर हर वार्ड में एक बोर्ड लगे, जहां विकास कार्यों का पूरा ब्यौरा—कितना पैसा आया, कहां खर्च हुआ—लिखा हो, तो यह पारदर्शिता की मिसाल बनेगा। इसके साथ ही, अगर कार्यकर्ता पंचायत के कार्यों का वीडियो बनाकर अच्छे-बुरे पहलुओं को जनता के सामने लाएं, तो यह न केवल गड़बड़ियों को रोकेगा, बल्कि जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी करेगा। यह काम जोखिम भरा है, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को अक्सर धमकियां और विरोध का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर अगले दो महीनों, यानी सितंबर 2025 तक, कोई दल बिना डर के यह कर दिखाए, तो बिहार में सैकड़ों ‘नायक’ सामने आ सकते हैं।

सवाल यह है कि क्या बिहार में कोई राजनीतिक दल इस जोखिम को उठाने को तैयार है? अगर कोई दल अगले पांच साल तक ईमानदारी से काम करे, रिश्वतखोरी को पूरी तरह त्याग दे, और केवल सही सवाल उठाकर जवाबदेही सुनिश्चित करे, तो बिहार की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकती हैं। पांच साल तक रिश्वत न लेने से कोई धनकुबेर मर नहीं जाएगा, लेकिन इससे बिहार की जनता को वह विकास और सम्मान मिलेगा, जिसकी वह हकदार है।

यह आसान नहीं होगा। भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, और स्थानीय स्तर पर सत्ता का दुरुपयोग आम है। फिर भी, अगर कोई दल यह संकल्प ले कि वह पंचायत स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी ताकत बनाएगा, तो वह न केवल जनता का विश्वास जीतेगा, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिखेगा। क्या बिहार का कोई दल इस चुनौती को स्वीकार करेगा, या यह केवल एक सपना बनकर रह जाएगा? समय और साहस ही इसका जवाब देंगे।

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