रंगनाथ सिंह
दिल्ली। जिस तरह कुछ आक्रमणकारी युद्ध जीतने के बाद लूटपाट और हत्या के साथ पराजित राज्य की स्त्रियों के बलात्कार को अपनी जीत का इनाम समझते थे, उसी तरह पिछले सौ साल में कुछ विक्टिमवादियों ने ‘ब्राह्मण की बेटी’ के संग जबरन या छल से दैहिक सम्बन्ध बनाने को “सोशल जस्टिस” की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।
ऐसे कुकृत्य के पीछे किसी तरह के जस्टिस की भावना काम नहीं करती बल्कि बलात्कारी प्रवृत्ति काम करती है। यह एक तरह की यौन कुंठा एवं यौन विकृति है। इस कुत्सित विचार प्रक्रिया में स्त्रियों से वास्तविक प्रेम या सम्मानपूर्ण सम्बन्ध का भाव नहीं होता बल्कि उसी जाति के पुरुषों से पराजित या दमित होने की कुंठा का बदला स्त्रियों से लेने की हीनवृत्ति काम करती है।
यह नीचता अब इतनी मेनस्ट्रीम हो चुकी है कि प्रशासनिक अधिकारी, राजनेता और अंग्रेजी पत्रकार भी चाशनी लपेटे हुए शब्दों में इसकी पैरवी करते नजर आते हैं।
अभी कुछ दिन पहले मैं तब सन्न रह गया जब एक मशहूर अंग्रेजी अखबार में काम करने वाले पत्रकार रमेश यादव (बदला हुआ नाम) ने एक सभा में मध्य प्रदेश के एक आईएएस के हवाले से सवाल पूछते हुए कहा कि “बात तो उन्होंने सही कही थी मगर….” खुद एक बेटी का पिता होकर उन्होंने जो मूर्खता दिखायी वह केवल इसलिए सहनीय हो गयी क्योंकि सभा में ज्यादातर वामपंथी ‘सवर्ण’ थे और सेल्फ-लोथिंग उनके लिए सरवाइल टेक्निक बन चुकी है।
वहीं उसी वक्त मेरी इच्छा हुई कि उनसे पूछूँ कि केवल ब्राह्मण द्वारा बेटी दान करने से जातिवाद कैसे टूटेगा? क्या आप या वह आईएएस सार्वजनिक रूप से यह कह सकते हैं कि जब तक यादव या आईएएस साहब की जाति के लोग अपनी बेटी एससी-एसटी को दान नहीं करेंगे तब जातिवाद नहीं टूटेगा! या कोई नेता यह कह सकता है कि जब तक महार अपनी बेटियाँ मातंगों को दान करना शुरू नहीं करेगा तब तक जातिवाद नहीं टूटेगा!
सोशलमीडिया पर दो साल पुराना किसी कुशवाहा का बयान वायरल हो रहा है जिसमें वह ब्राह्मण की बेटी से ब्याह कर के उसके शुद्धिकरण करने की बात कर रहे हैं! अगर वह सच्चे एंटी-कास्ट एक्टिविस्ट होते तो वह सबसे पहले कुशवाहा समाज की बेटियों से आह्वान करते कि वह जात-पात से ऊपर उठकर समाज का ‘शुद्धिकरण’ करें।
जातीय घृणा को वैचारिकता का जामा पहनाने वालों को सौ साल में यह नहीं सूझ रहा है कि अकेले ब्राह्मण की बेटी कब तक जातिवाद तोड़ेगी! जातिवाद तोड़क मण्डल के सदस्यों को अपने समाज के अन्दर बेटी दान आन्दोलन चलाने से कौन रोक रहा है! अगर चर्चित लोगों का इतिहास देखा जाए तो आम्बेडकर से लेकर वर्तमान तक ब्राह्मणों की बेटियों ने तमाम गैर-ब्राह्मण जातियों के चर्चित लोगों से ब्याह किया है।
सरकार को या किसी एजेंसी को अब उन लोगों की भी जाति जनगणना करना चाहिए जिन्होंने अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह किया है। अंतर-जातीय विवाह करने वालों में किसी जाति समुदाय के लोग ज्यादा हैं और किस समुदाय के कम हैं, यह भी दुनिया के सामने आना चाहिए।
रही बात बलात्कारी मानसिकता वाले मर्दों की तो उनके द्वारा परिष्कृत भाषा में “ब्राह्मण की बेटी” को टारगेट करने की प्रवृत्तियों को सार्वजनिक रूप से उजागर करने की जरूरत है।
जो लोग ब्राह्मण की बेटी दान में लेकर या उसका शुद्धिकरण करके जातिवाद तोड़ना चाहते हैं उन्हें सुझाव है कि वह अगले कुछ दशकों के लिए “ब्राह्मण की बेटी” को अकेला छोड़ दें। जब 90 प्रतिशत आबादी आपस में बेटी ब्याहने लगेगी तो उसे ही मुख्य धारा माना जाएगा लेकिन देश में ऐसा होता दिख नहीं रहा है।
तमिलनाडु में छह दशक से सोशल जस्टिस वादियों की सत्ता है। सत्ता के सभी साधनों पर उनका कब्जा है। पक्ष और विपक्ष दोनों ईवी रामास्वामी के अनुयायी हैं मगर तमिलनाडु ने पिछले 50-60 साल में जातिवाद को कमजोर किया हो या अंतर-जातीय शादियाँ दूसरे राज्यों से ज्यादा होती हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता।
हम लोग अपने निजी अनुभव से देखें तो बंगाल में ज्यादा अंतर-जातीय विवाह होते होंगे जिसका श्रेय वहाँ के प्रगतिशील विचारकों को जाता है।



