दिल्ली । दूसरे विश्व युद्ध की राख से एक बड़ा सपना पैदा हुआ था।
1945 में दुनिया थक चुकी थी। शहर खंडहर बन चुके थे। लाखों लोग मारे जा चुके थे।
इंसानियत ने ठान लिया, अब ऐसा फिर कभी नहीं होगा। इसी सोच से संयुक्त राष्ट्र (UN) बना। इरादा बहुत साफ था। ताक़तवर देश मिलकर काम करेंगे। झगड़े बातचीत से सुलझेंगे। नए आज़ाद हुए देशों को भी एक मंच मिलेगा। जहाँ ताक़त नहीं, इंसाफ की बात होगी।
सपना खूबसूरत था।
लेकिन अस्सी साल बाद यह सपना बुरी तरह टूटता हुआ दिखता है। आज कई बार संयुक्त राष्ट्र किसी मूक दर्शक जैसा लगता है।
दुनिया में युद्ध चल रहे हैं। आतंकवाद फैल रहा है। महाशक्तियों की होड़ बढ़ती जा रही है।
और जो संस्था शांति बनाए रखने के लिए बनी थी, वही कई बार लाचार दिखाई देती है। बैठकें होती हैं। भाषण होते हैं। प्रस्ताव आते हैं। लेकिन अमन चैन नहीं आता है। गरीब मुल्क आर्थिक मार झेल रहे हैं, इन शक्तिशाली डॉन दादागिरी से।
सबसे बड़ी विडंबना यही है। जिन देशों को दुनिया की स्थिरता बचाने की ज़िम्मेदारी दी गई, अक्सर वही देश इस व्यवस्था को पंगु बना रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं। अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस। इनके पास है सबसे ताक़तवर हथियार, वीटो। एक वीटो। और कोई भी प्रस्ताव खत्म।
1946 से अब तक लगभग 300 बार वीटो इस्तेमाल हो चुका है। रूस और सोवियत संघ ने मिलकर 130 से ज़्यादा बार वीटो लगाया। अमेरिका ने करीब 90 बार, जिनमें से ज़्यादातर इज़राइल के बचाव में।
नतीजा साफ है। जहाँ किसी बड़ी ताक़त का हित जुड़ जाए, वहाँ संयुक्त राष्ट्र बस बहस का अखाड़ा बन जाता है। बातें होती हैं। लेकिन फैसले गायब हो जाते हैं।
इसकी सबसे साफ तस्वीर मध्य पूर्व में दिखती है। दशकों से यह इलाका जंग का मैदान बना हुआ है। इराक। सीरिया। ईरान की परछाई वाली लड़ाइयाँ। और अब गाज़ा की तबाही।
हर संकट में एक ही कहानी दोहराई जाती है। न्यूयॉर्क में आपात बैठक।
कड़े बयान। ड्राफ्ट प्रस्ताव। फिर शुरू होता है सियासी सौदा-सुलूक।
और अंत में, सब कुछ ठंडा पड़ जाता है।
हाल ही में पारित सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2817 इसका ताज़ा उदाहरण है। 11 मार्च 2026 को पारित इस प्रस्ताव में ईरान के हमलों की निंदा की गई। बहरीन ने इसे पेश किया। 134 देशों ने समर्थन किया। 13 वोट इसके पक्ष में पड़े।
चीन और रूस ने दूरी बना ली। लेकिन आलोचकों ने तुरंत सवाल उठाया।प्रस्ताव में उस घटना का जिक्र ही नहीं था, जिसे कई विश्लेषक इस टकराव की असली वजह मानते हैं यानी 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के ईरानी ठिकानों पर हमले।
फिर वही पुरानी कहानी। चुनिंदा गुस्सा। आधी सच्चाई। कूटनीतिक ड्रामा। और संयुक्त राष्ट्र की साख पर एक और दाग।
असल समस्या सिर्फ प्रक्रिया की नहीं है। यह उस विचारधारा से धोखा है जिसके साथ UN बना था। संयुक्त राष्ट्र को ताक़त की राजनीति से ऊपर उठना था। लेकिन वह आज भी उसी जाल में फंसा हुआ है।
इस धारणा को मजबूत करने में अमेरिका की भूमिका बड़ी रही है।वाशिंगटन ने कई बार साफ किया है, जहाँ उसके रणनीतिक हित दांव पर हों, वहाँ अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी नहीं।
2003 में इराक पर हमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना युद्ध शुरू हुआ।
संयुक्त राष्ट्र बस देखता रह गया।
गाज़ा संकट के दौरान भी यही हुआ।
अक्टूबर 2023 से सितंबर 2025 के बीच अमेरिका ने कम से कम छह युद्धविराम प्रस्तावों पर वीटो लगाया।
जबकि महासभा में 153 देशों ने मानवीय संघर्षविराम की मांग की थी।
लेकिन जिम्मेदारी सिर्फ अमेरिका की नहीं। रूस ने भी बार-बार वीटो का इस्तेमाल किया। 2011 से अब तक उसने सीरिया पर कई प्रस्ताव रोक दिए। जिनमें रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल और नागरिक इलाकों पर हमलों की जांच शामिल थी।
2022 में रूस ने अपने ही यूक्रेन आक्रमण की निंदा वाले प्रस्ताव को भी वीटो कर दिया। यानी हमलावर भी वही, फैसला करने वाला भी वही।
चीन अक्सर इन मौकों पर रूस या ईरान के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है, कभी वीटो से, कभी खामोश समर्थन से।
इतिहास में कई दर्दनाक मिसालें हैं।
रवांडा, 1994। सिर्फ सौ दिनों में लगभग आठ लाख लोग मारे गए।संयुक्त राष्ट्र शांति सेना पहले से ही कम थी। लेकिन उसे बढ़ाने के बजाय
सुरक्षा परिषद ने उसे और घटा दिया।
नतीजा, क़त्लेआम।
फिर आया स्रेब्रेनित्सा, 1995।
संयुक्त राष्ट्र के घोषित “सुरक्षित क्षेत्र” में आठ हजार से ज्यादा बोस्नियाई मुसलमानों का नरसंहार हुआ। डच शांति सैनिक मौजूद थे, लेकिन बेबस।
सीरिया में भी यही कहानी दोहराई गई। रासायनिक हमले। बमबारी। भूखे शहर। लेकिन हर बार वीटो दीवार बनकर खड़ा हो गया।
छोटे और मध्यम देशों के लिए यह निराशाजनक है। कभी वे संयुक्त राष्ट्र को अपना सुरक्षात्मक मंच मानते थे।
आज कई बार यह सिर्फ एक मंच लगता है, जहाँ बड़ी ताक़तें अपनी सियासी बाज़ीगरी दिखाती हैं।
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सामूहिक सुरक्षा का सपना, धीरे-धीरे चुनिंदा न्याय में बदल गया है।
इस बीच दुनिया और असुरक्षित होती जा रही है। आज के युद्ध पहले से ज्यादा जटिल हैं। छोटी-छोटी लड़ाइयाँ। प्रॉक्सी युद्ध। हाइब्रिड संघर्ष। सब कुछ उलझा हुआ।
और इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र खड़ा है, जैसे कोई थकेला बूढ़ा चौकीदार।उसे “बेज़ुबान शेर” कहना शायद कड़ा लगे। लेकिन सच यही है।
संयुक्त राष्ट्र गरजता तो है: प्रस्तावों में, बयान में, बैठकों में। लेकिन जब असली कार्रवाई की ज़रूरत पड़ती है, खासकर किसी बड़ी ताक़त के खिलाफ, तो उसकी दहाड़ फुसफुसाहट बन जाती है।
फिर भी यह संस्था पूरी तरह बेकार नहीं है। उसकी कई एजेंसियाँ आज भी लाखों लोगों की जान बचाती हैं।शरणार्थियों की मदद करता है ह्यूमन राइट्स कमीशन। भूखों तक खाना पहुँचाता है विश्व खाद्य कार्यक्रम। बच्चों के लिए काम करता है यूनिसेफ।दुनिया के कई संकटों में ये एजेंसियाँ उम्मीद की रोशनी हैं।
लेकिन जिस बड़े मकसद के लिए UN बना था; युद्ध रोकना और शांति कायम करना: उसमें वह बार-बार कमजोर साबित हुआ है।
और यही असली त्रासदी है। सिर्फ एक संस्था की नाकामी नहीं। बल्कि एक सपने का धीरे-धीरे मर जाना। संयुक्त राष्ट्र उस उम्मीद से पैदा हुआ था कि दुनिया फिर कभी विश्व युद्ध जैसी तबाही नहीं देखेगी। आज जब टकराव बढ़ रहे हैं और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, तो यह संस्था कई बार एक पुरानी इमारत जैसी लगती है: जिसके आदर्शों को ताक़तवर देश अब उतनी अहमियत नहीं देते।
अब सवाल साफ है।
क्या संयुक्त राष्ट्र खुद को बदल पाएगा? सुरक्षा परिषद का विस्तार? वीटो की ताक़त पर लगाम?
अगर ऐसे सुधार नहीं हुए, तो संयुक्त राष्ट्र शायद बस एक निशानी बनकर रह जाएगा, एक नेक इरादे का, जो दुनिया ने मिलकर देखा था, लेकिन पूरा कभी नहीं किया।



