कोटा (राजस्थान): सुबह की पहली किरणें अभी आंखें मल रही होती हैं, लेकिन सुभाष की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी होती है। एक हाथ में कोचिंग की मोटी-मोटी किताबें लटक रही हैं, दूसरे में स्कूल का पुराना बैग लटका है, और कंधों पर तो पूरे खानदान की आशाओं का पहाड़ सवार है। बारहवीं कक्षा का यह दुबला-पतला लड़का मेडिकल और इंजीनियरिंग की इस बेरहम रेस में फँस चुका है, मानो दो पाटों वाली चक्की में पिसता हुआ अनाज। सुबह की मजबूरी में स्कूल, दोपहर कोचिंग की कैद, रात भर टेस्ट सीरीज की जद्दोजहद, और बीच-बीच में बस कुछ घूँट चाय और साँसें जो तनाव के बोझ तले सिकुड़ती जा रही हैं। अम्मी-पापा की गाढ़ी पसीने की कमाई दाँव पर लगी है, और सुभाष हर लम्हा खुद को साबित करने की अदृश्य जंग लड़ता रहता है, थका-हारा, दबा-कुचला, लेकिन अभी टूटा नहीं। लेकिन यह कहानी सिर्फ सुभाष की नहीं, बल्कि लाखों किशोरों की है, जो भारत की तालीम के इस काले साये तले जूझ रहे हैं।
उधर, शिक्षा मंत्रालय के बंद दरवाजों के पीछे चल रही एक नौ सदस्यीय हाई-लेवल कमिटी की बैठक ने देश की तालीम व्यवस्था का वह नंगा पक्ष सामने ला दिया है, जिसे सालों से नजरअंदाज किया जाता रहा। जून 2025 में गठित यह कमिटी, जो नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं के कोचिंग संस्कृति पर फोकस कर रही है, ने साफ-साफ कहा कि आज भारत में कोई बड़ी प्रतियोगी इम्तिहान स्कूल की पढ़ाई से नहीं, बल्कि कोचिंग सेंटर्स की मेहनत से सफल होता है। जेईई मेन 2025 के सेशन-1 में 14 टॉपर्स ने 100 परसेंटाइल हासिल किया, जिनमें से ज्यादातर एलन या मोशन जैसे कोचिंग संस्थानों के शागिर्द थे। नीट 2025 में टॉप-10 में चार नाम एलन के थे, और कुल टॉप-100 में 39.
एनसीईआरटी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 90 फीसदी से ज्यादा टॉपर्स कोचिंग की चौखट से निकलते हैं। इसका मतलब साफ है: सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की 12 साल की तालीम अब प्रतियोगी इम्तिहानों के लिए बेकार साबित हो रही है।
पिछले एक दशक में लाखों नौजवानों का रोजमर्रा दो हिस्सों में बंट चुका है, सुबह की मजबूरी में स्कूल, शाम कोचिंग की बेड़ियाँ। विद्यालय अब सिर्फ हाजिरी दर्ज करने की रस्म बनकर रह गए हैं, जबकि असली इल्म कोचिंग में बिकता है। नतीजा? कोटा, दिल्ली, पटना, हैदराबाद जैसे शहरों में कोचिंग इंडस्ट्री एक अरबों डॉलर की कारोबारी मशीन बन चुकी है। आईएमएआरसी ग्रुप की 2025 रिपोर्ट बताती है कि भारत की कोचिंग मार्केट साइज वर्तमान में 58,000 करोड़ रुपये है, जो 2028 तक 1.34 लाख करोड़ और 2033 तक 1.45 लाख करोड़ छू लेगी, 10.4 फीसदी की सालाना ग्रोथ रेट के साथ। लेकिन यह व्यवसाय बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, छात्र आत्महत्याओं में 2012 से 2022 तक 65 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, और 2023 में यह आंकड़ा 13,892 तक पहुंच गया , कुल सुसाइड्स के 8.1 फीसदी। कोटा में ही 2024-25 में 20 से ज्यादा केस दर्ज हुए, जहां लंबे कोचिंग सेशन, नींद की कमी, खान-पान की बेपरवाही और लगातार तनाव ने नौजवानों का दिमागी तौर पर तबाह कर दिया। आईसी3 इंस्टीट्यूट की स्टडी कहती है कि सालाना 13,000 से ज्यादा छात्र इस दबाव में जान दे देते हैं।
दुनिया के ज्यादातर तरक्की पसंद मुल्कों में कोचिंग तो होती है, लेकिन सहायक की हैसियत में। जर्मनी, फ्रांस, जापान, फिनलैंड या दक्षिण कोरिया में स्कूली तालीम इतनी मजबूत होती है कि बच्चे बिना एक्स्ट्रा कोचिंग के वर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी में दाखिला पा लेते हैं। फिनलैंड की मॉडल पर 2025 की एक यूनेस्को रिपोर्ट कहती है कि वहां स्ट्रेस-फ्री लर्निंग से छात्रों की क्रिएटिविटी 40 फीसदी ज्यादा है। लेकिन भारत अकेला ऐसा मुल्क है, जहां कोचिंग एक पैरलल, समानांतर तालीम निजाम बनकर स्कूलों को बौना साबित कर रही है। नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत 2025 तक 5+3+3+4 स्ट्रक्चर लागू हो चुका है, जो स्ट्रीम्स की बेड़ियों को तोड़ता है, अब छात्र साइंस के साथ आर्ट्स चुन सकते हैं। एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (एबीसी) से फ्लेक्सिबल लर्निंग मिली है, और 82 फीसदी स्कूलों में हाइब्रिड लर्निंग अपनाई गई है। लेकिन कोचिंग का वर्चस्व अभी भी बरकरार है, क्योंकि एंट्रेंस एग्जाम का सिलेबस स्कूल कोर्स से कटा हुआ है।
शिक्षाविदों का मानना है कि समस्या की जड़ एंट्रेंस इम्तिहानों का स्कूली सिलेबस से ताल्लुक न होना है। जब तक जेईई और नीट ग्यारहवीं के बजाय बारहवीं के सिलेबस पर न आधारित होंगे, कोचिंग का राज खत्म नहीं होगा। जून 2025 में गठित सेंट्रल गवर्नमेंट कमिटी ने सिफारिश की है कि ये इम्तिहान ग्यारहवीं में शिफ्ट हो जाएं, साल में दो बार मौका मिले, और बारहवीं का बोझ आधा हो, ताकि दोहरी जकड़न से बच्चे बाहर निकल सकें। नवंबर 2025 में संसदीय स्टैंडिंग कमिटी ने कोचिंग सेंटर्स की फसल को रिव्यू करने का ऐलान किया, जिसमें स्टूडेंट स्ट्रेस, डमी स्कूल्स और सोशल इश्यूज पर फोकस है। असम में कोचिंग इंस्टीट्यूट्स रेगुलेशन बिल 2025 पेश किया गया, जो ट्रांसपेरेंसी, क्वालिटी और स्टूडेंट वेलफेयर सुनिश्चित करेगा।
कोचिंग के बेलगाम कारोबार पर लगाम के लिए कमिटी ने सख्त कदम सुझाए। कई शहरों में बच्चे दिन में 6-7 घंटे कोचिंग में कैद रहते हैं, कमिटी ने इसे अधिकतम 3 घंटे तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा। बोर्ड एग्जाम को मजबूत बनाकर, एक हल्के एप्टीट्यूड टेस्ट को मिलाकर एंट्रेंस स्कोर तैयार करने की दिशा में काम तेज। लक्ष्य है रटंत रिवाज को उखाड़ फेंकना और समझ-आधारित तालीम को हवा देना। डमी स्कूल्स की कड़वी हकीकत भी सामने आई, देशभर में हजारों ऐसे स्कूल्स जहां सिर्फ रजिस्ट्रेशन होता है, क्लासेस नहीं लगतीं। एनसीईआरटी को निर्देश दिया गया कि ग्यारहवीं-बारहवीं के लिए नेशनल मिनिमम कोर करिकुलम तैयार हो। हर विद्यालय में क्वालिफाइड करियर काउंसलर मुकर्रर करना जरूरी, क्योंकि गलत फहमियां और खौफ ही बच्चों को कोचिंग की ओर धकेलते हैं।
एनईपी 2020 के पांच सालों में प्रोग्रेस हुई है, टीचर ट्रेनिंग में 30 फीसदी इजाफा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में 50 फीसदी कवरेज, लेकिन चैलेंजेस बाकी हैं। 2025 की एक स्टडी (इकोनॉमिक टाइम्स) कहती है कि इंटरनेशनल कोलैबोरेशन्स से करिकुलम डिजाइन बेहतर हो रहा है, लेकिन कोचिंग का असर अभी भी स्कूलों को कमजोर कर रहा। अगर ये सुधार वक्त पर लागू हो गए, इम्तिहान school सिलेबस से जुड़ें, कोचिंग पर अंकुश लगे, और करिकुलम यथार्थ की जरूरतों के मुताबिक ढल जाए, तो शायद कुछ सालों में वो दिन लौट आएं जब बच्चे स्कूल की बेंच से ही आईआईटी, एआईएमएस और बड़े यूनिवर्सिटी का टिकट कटाते नजर आएं। तब तक कोचिंग बादशाह बनी रहेगी, स्कूल प्रजा, और बच्चों का बचपन बाजार की भेंट चढ़ता रहेगा। लेकिन उम्मीद की किरण है, अब सरकार जाग चुकी है।



