धर्म और आइडियालॉजी, रिलिजन तथा मजहब

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प्रो.रामेश्वर मिश्र पंकज

दिल्ली : मानव धर्म शास्त्र में प्रतिपादित जो मानव धर्म है, वह केवल हिन्दुओं के लिए नहीं है। वह मनुष्य मात्र के लिए है और इस अर्थ में सार्वभौम है। इन्हें आधुनिक पदावली में सार्वभौम मानव मूल्य कह सकते है। यह भी स्मरण योग्य् है कि मानव धर्म का प्रतिपादन ईसाइयत, इस्लाम और कम्युनिज्म में नहीं है। क्योंकि वहां मानव जाति का विभाजन ‘फेथफुल’ और ‘हीदन’ के रूप में ईसाइयत में और मोमिन तथा काफिर के रूप में इस्लाम में एवं शोषित और शोषक के रूप में कम्युनिज्म में परस्पर विरोधी युग्मों में बांट कर किया जाता है। जिसके कारण वे पंथ इनमें परस्पर आधारभूत टकराहट मानते है और पहला दूसरे को विनष्ट कर डालने को संकल्पित रहता है।

अतः मानव जाति की एकता की वहां कही कोई कल्पना ही नहीं है। विज्ञान के उत्कर्ष से यूरोप के केवल वैज्ञानिक बोध से सम्पन्न व्यक्तियों और समूहों ने यूरोप में विगत 60 वर्षों में पहली बार मानव जाति की एकता की बात शुरू की है। परन्तु वे लोग ईसाई समाज में एक प्रतिशत से भी कम हैं। शेष सम्पूर्ण ईसाई लोग मनुष्य को फेथफुल क्रिष्चियन और हीदन में बांट कर ही देखते है। इसी प्रकार स्वयं को मुसलमान कहने वाले लोग, जिन्हें यूरोप के लोग मुहम्मडन ही कहते है, स्वयं कुरान का निष्ठा से पालन करें या न करें, पर मनुष्यों को मोमिन और काफिर में बांट कर ही देखते है और स्वयं को कभी भी काफिर नहीं कहते तथा जो मुसलमान नहीं है, वह कितना भी सदाचारी हो, तो भी उसे नेक बंदा नहीं कहते।

इस प्रकार मानव जाति की एकता की कोई भी बात ईसाइयत या इस्लाम में नहीं है। इन्हीं दोनों की नकल करके कम्युनिस्टों ने मानव जाति को शोषित और शोषक में बांटा है। जो व्यक्ति कम्युनिस्ट पार्टी का पदाधिकारी है, वह कितने भी बडे पद पर हो और कितने ही अधिक ऐष्वर्य के साथ जी रहा हो, वह स्वयं को शोषितों का प्रतिनिधि बताता है और दूसरा कोई सीमांत किसान या छोटा व्यापारी या मंदिर का मामूली पुजारी हो या किसी तरह कथा बाँचकर परिवार का गुजर बसर करने वाला पुरोहित हो, वे सब उसकी दृष्टि में शोषक वर्ग के लोग है। इस प्रकार मानव जाति की एकता में कम्युनिस्टों का भी कोई विश्वाृस नहीं है और मान्यता भी नहीं है।

समस्त मनुष्यों के लिए एक समान मानव धर्म का प्रतिपादन केवल सनातन धर्म शास्त्रों में है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सब को एक ही काम करना है या सबसे एक सा ही व्यवहार करना है, क्योंकि यह तो तामसिक अभेदवाद हो जायेगा।

मानव धर्म मनुष्य मात्र द्वारा पालनीय हैं। पर उतना ही पर्याप्त नहीं। मनुष्य जीवन की अनेक विलक्षणतायें है। वह पशुओं की तरह कतिपय सामान्य और विशिष्ट प्रवृत्तियों से पहचाना नहीं जा सकता और परिभाषित भी नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मनुष्य अर्थात प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है, उसकी अपनी ही महिमा है, गौरव है और स्वधर्म है। यद्यपि मानव धर्म का पालन मनुष्य मात्र द्वारा करणीय है। तथापि उतने से ही मानव जीवन का ऐश्वयर्य व्यक्त नहीं होता। मनुष्य को ऐश्वुर्य प्रकट करना है। पुरूषार्थ करना है। इसके लिए ही उसे मानव जीवन मिला है। पुरूषार्थ के द्वारा ऐश्वयर्य की सिद्धि में ही मानव जीवन की सार्थकता है।

ऐश्वमर्य के भी अनन्त भेद है। भौतिक ऐश्वथर्य, बौद्धिक ऐश्वमर्य, धार्मिक ऐश्वरर्य, आध्यात्मिक ऐश्वमर्य, आर्थिक या वित्तीय ऐश्वषर्य, वस्तुओं के संग्रह का ऐश्वयर्य, समस्त भौतिक ऐश्वंर्य के त्याग का आध्यात्मिक ऐश्व र्य, संयम का ऐश्वथर्य, शौर्य का ऐश्वमर्य, उद्योग और वाणिज्य में, कृषि और शिल्प में, कला और साहित्य में, जीवन के विविध रूपों में उत्कर्ष का ऐश्व र्य, इस प्रकार क्षेत्रभेद, वृत्तिभेद, कर्मभेद, बोधभेद, लक्ष्यभेद तथा भावभेद से ऐश्व र्य के अनंत रूप है और अनेक स्तर है। पूर्व जन्म के संस्कारों के साथ व्यक्ति कतिपय स्मृतियों और आकांक्षाओं का बीज रूप लेकर जन्म लेता है और फिर उसकी उससे आगे की यात्रा प्रारंभ होती है। अतः पुरूषार्थ की आकांक्षा को लेकर और ऐश्वतर्य की मान्यता को लेकर व्यक्ति-व्यक्ति में बहुत भेद है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग ऐश्व र्य की सिद्धि करनी है और उसके लिए अलग-अलग पुरूषार्थ करने है। सभी ऐश्वोर्य वस्तुतः ईश्वनर के विराट और अनंत ऐश्वसर्य-सागर की बहुत छोटी तरंगें मात्र है। सब को जो अलग-अलग पुरूषार्थ करने है, वे ही हर व्यक्ति के अलग-अलग स्वधर्म है। धर्म तो मनुष्य मात्र का एक ही है – मानव धर्म।

स्वधर्मों की अनंत विविधता है। क्योंकि ऐश्वषर्य के अनंत रूप है। स्वधर्म भेद से ऐश्वसर्य भेद की साधना होती है, पुरूषार्थ भेद प्रकट होता है। माँ का स्वधर्म माँ के रूप में शिशु का पालन है। शिशु पालन ही माँ द्वारा की जा रही चिदंश की सेवा है, चिन्मय सत्ता की सेवा है। शिशु का स्वधर्म माँ के प्रति आज्ञाकारिता और उनकी अपेक्षा की पूर्ति के लिए पुरूषार्थ करना है। यही माँ की सच्ची सेवा है, जो वस्तुतः चिदंश की, चिन्मय सत्ता की ही सेवा है। राजा का स्वधर्म अलग है, प्रजा का अलग। सचिव का अलग, भृत्य का अलग। गुरू का अलग, शिष्य का अलग। पत्नी का अलग, पति का अलग। इस प्रकार स्वधर्म भेद की विराटता है। उन पर निरंतर विचार करते रहना आवश्यनक है। सजगता, विवेक, संकल्प और पुरूषार्थ पूर्वक स्वधर्म की सिद्धि की जाती है।

वर्तमान में हमारे सामने जो परिस्थितियों हैं, वे क्या परिस्थितियां हैं, यह विचार करते रहना चाहिए। हम स्वयं को कहाँ पर स्थित मानते हैं और जो परिस्थितियां हैं, वे तत्वतः क्या हैं, यह सब सदा मनन करते रहना और उनके प्रकाश में ही विवेकपूर्वक स्वधर्म का निर्णय करना कर्तव्य है। अगर हम राष्ट्र के विषय में सोचते हैं तो राष्ट्र में क्या परिस्थितियां हैं, अगर घर के विषय में सोचते हैं तो घर की क्या परिस्थितियाँ है, आसपास के क्षेत्र के विषय में सोचते हैं तो आसपास की क्या परिस्थितियाँ हैं और उसमें हमारा क्या कर्तव्य है, शास्त्र हमें क्या निर्देश देते हैं, इस दृष्टि से सोचना चाहिए, तभी हम धर्म के प्रकाश में स्वधर्म का निर्णय कर सकेंगे। किसी आइडियालॉजी के आधार पर सोचना अधर्म है क्योंकि आइडियालॉजी अपने से भिन्न लोगों के राजनैतिक नियंत्रण के लिए किसी भी समूह के द्वारा गढ़ी गई पदावलियों का संग्रह मात्र है।

जैसे कहा है कि प्रथम धर्म हैं- सत्य, ऋत और यज्ञ। देवताओं ने सृष्टि के आरंभ में जो यज्ञीय प्रक्रिया सम्पन्न की, उसमें से यह प्रथम धर्म निकले – ‘‘तानि धर्माणि प्रथमान्यासन’’। तो सत्य क्या है ? यह भी मनन के द्वारा ही स्पष्ट होगा। केवल सामान्य बुद्धि से सहज जो दिखें, वह कई बार भ्रान्ति हो सकता है। अतः मननपूर्वक सत्य को जानना होता है। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संसार में विगत 1400-1500 वर्षों में दो प्रबल महाप्रवाह शक्तिशाली बनें, उनमें सत्य की बिल्कुल अलग परिभाषा है और सनातन धर्म में सत्य की अलग परिभाषा है। जैसे इस्लाम में सत्य का क्या अर्थ है ? यह कि अल्लाह ने अपने आखिरी रसूल के द्वारा जो शब्द कह दिए, वहीं अंतिम सत्य है। शेष सब असत्य है। जो पहले के पैगम्बरों, देवदूतों, रसूलों ने कहा और जो उस समय के लिए सत्य था, वह अब आखिरी रसूल के द्वारा प्राप्त इलहामों के बाद पुराना रद्द हो गया है। अतः अब वह सत्य नहीं है। अब अंतिम सत्य वह है जो आखिरी रसूल ने अल्लाह से प्राप्त किया है। यह बात अलग है कि आखिरी रसूल ने स्वयं ऐसा कुछ नहीं लिखा था कि जिससे सीधे यह ज्ञात हो कि उन्हें वस्तुतः क्या प्राप्त हुआ था। परन्तु जो लोग उनके द्वारा की गई लड़ाइयों में साथ थे और लूट के माल में यानी माले गनीमा में सहभागी थे, हिस्सेदार थे, यानी जो सहाबा थे (जिसका तद्भव रूप साहब है जो मुसलमानों ने अंग्रेजों को प्रसन्न करने के लिए कहा और बाद में उनके असर से अथवा उनकी संगति से भारत के सब हिन्दू भी अपने से शक्तिशाली को या बड़े को आदरवश कहने लगे), उनके वंशजों ने तीसरी और चौथी पीढ़ी में अपनी याददाश्तव के बल पर जो कुछ बताया कि हजरत पैगम्बर आखिरी रसूल ने यह-यह इलहाम प्राप्त किया था, वही कुरान के रूप में संकलित है और मुसलमानों के अनुसार वही अंतिम सत्य है, शेष सब असत्य है।

इसी प्रकार ईसाइयों के यहां भी सत्य यानी ट्रुथ एक कूटपद (कोड वर्ड) है। जिसकी व्याख्या बहुत विस्तार से उन लोगों ने किया है कि सत्य वह है जो बाइबिल में जीसस के द्वारा कहा गया बताया जाता है। फिर आगे कहा कि नहीं सत्य वह है कि जो चर्च बताता है कि यह सत्य है क्योंकि चर्च जो है, वह जीसस की दुल्हन है तो चर्च जो बाइबिल की व्याख्या करें वही सत्य है। बाकी जो है वह झूठ है। इसीलिए अगर चर्च ने कह दिया कि गॉड ने करोड़ों वर्षों में बहुत ही मेहनत से किसी प्रकार इकलौता सगा बेटा पैदा कर धरती के उद्धार के लिए भेजा तो सब को मानना पडेगा। उस इकलौते बेटे के सचमुच कभी पैदा होने का कोई साक्ष्य इतिहास में सुलभ नहीं है, तो भी मानना पडे़गा। उस इकलौते बेटे ने जो कुछ कहा, यदि कहा, तो वह भी उनके समय में कही सुरक्षित नहीं किया गया। कहीं लिखा नहीं गया। उस इकलौते बेटे के जन्म होकर बलिदान देकर चले जाने के 150 वर्ष बाद कुछ मनोरोगी जैसे व्यक्तियों ने, जिनमें पाल आदि है, जो कुछ बताया कि एकमात्र प्रभुपुत्र ने यह-यह कहा था और उनके उस कहे को हम ‘गुड न्यूज’ मानते है तो गुड न्यूज के नाम से संकलित उन चार संकलनों में जो कुछ लिखा है और उसकी अलग-अलग चर्चों के द्वारा जो भी व्याख्याएं की गई है, वही सत्य है। शेष सब असत्य है। इकलौते बेटे और उनके परमपूज्य पिताजी के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवता या आराध्य देव की पूजा झूठे देवताओं की पूजा है और ऐसे झूठे देवताओं की पूजा करने वाले समाजों को या तो फेथफुल किश्चियन बनना होगा या हमारे द्वारा समाप्त होना होगा।

इस प्रकार इन एकदेववादी, एकपंथवादी (मोनोथीइस्ट) लोगों के अनुसार सत्य वस्तुतः अपने से भिन्न सम्पूर्ण अस्तित्व को वशवर्ती बनाने, उनको बदल डालने या नष्ट कर डालने का एक माध्यम है या एक अत्यंत शक्तिशाली संहारक शस्त्र है, जो अन्यों को समाप्त करने या अधीन करने के काम आता है। सत्य की यह विचित्र परिभाषा सनातन धर्म में प्रतिपादित सत्य से पूरी तरह भिन्न और विरोधी है।

सनातन धर्म के अनुसार सत्य की परिभाषा है – ‘‘सत्यं यथार्थें वाड्मनसे, यथादृष्टं यथानुमितं यथाश्रुतं तथा वाड्मनष्चेति। परत्र स्वबोधसंक्रान्तये वागुक्ता सा यदि न वंचिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिबन्ध्या वा भवेदिति, एषा, सर्वभूतोपकारार्थं प्रवृत्ता न भूतोपघाताय। यदि चैवमप्यभिधीयमाना भूतोपघातपरैव स्यात्, न सत्यं भवेत् पापमेव भवेत्। तेन पुण्याभासेन पुण्यप्रतिरूपकेण कष्टं तमः प्राप्नुयात्, तस्मात् परीक्ष्य सर्वभूतहितं सत्यं ब्रूयात्।’’

अर्थात वाणी और मन से जैसा देखा, सुना और अनुमान किया, वैसा ही यथार्थ कथन और चिंतन सत्य है। अपने ज्ञान की संक्रांति (सम्प्रेषण) के लिए दूसरे के प्रति जो वाक्य कहा जाये, वह वाक्य सत्य होता है यदि वह वंचना कारक या भ्रांति कारक या श्रोता के लिए दुर्गम और निरर्थक न हो। वह वाक्य समस्त प्राणियों का उपकारक है, इस बौद्धिक सजगता के साथ ही वाक्य कहा जाना चाहिए, ताकि वह किसी का उपघातक न हो। क्योंकि उपघात होने पर वह कथन सत्य होने पर भी पुण्य नहीं होता अपितु पाप ही होता है। इस प्रकार विचारपूर्वक सर्वहितकारक सत्य वाक्य ही कहना चाहिए।
इस तरह सनातन धर्म में सत्य की बहुत स्पष्ट परिभाषा है। कोई भी वाक्य भले ही सत्य के रूप में पुण्य का आभास दे रहा हो तो भी वह यदि किसी या किन्ही प्राणियों के लिए उपघातक हो अर्थात आंतरिक या बाहरी, आंशिक या पूर्ण क्षति पहुँचाने वाला हो तो वह पापी है। इसी अर्थ में अहिंसा ही सत्य की कसौटी है। अहिंसा का अर्थ है किसी भी प्राणी या प्रकृति के किसी भी घटक के प्रति द्रोह भावना का सम्पूर्ण अभाव। अहिंसा का अर्थ ‘हत्या नहीं करना’ नहीं होता। किसी के प्रति द्रोह भाव रखना ही हिंसा है। भले ही आप उसे कोई भी प्रत्यक्ष भौतिक आघात नहीं पहुँचा रहे है। अतः द्रोहभाव का सम्पूर्ण अभाव ही अहिंसा है। स्पष्ट है कि इस प्रकार सनातन धर्म की कसौटी पर इस्लाम और ईसाइयत का आज जो प्रचारित रूप है, वह घोर हिंसक और पूर्ण असत्य है। इस तरह सत्य की सनातन दृष्टि से इस्लाम की दृष्टि और ईसाइयत की दृष्टि पूरी तरह विरोधी है और वह पूर्णतः असत्य कही जायेगी। हिंसक तो वह प्रत्यक्ष रूप से है ही।

अतः सत्य के सनातन स्वरूप को जाने बिना धर्म का पालन हो ही नहीं सकता। सच या हकीकत और ट्रुथ की ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट अवधारणाओं को मानने वाला व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता। किसी आइडियालॉजी से आविष्ट व्यक्ति धर्म का पालन नहीं कर सकता। सत्य का जो अर्थ सनातन धर्म शास्त्रों में स्पष्ट है, उसका ही पालन धर्म है।

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