रेयांश
रेयांश नाम के किसी लेखक ने पूज्य सावरकर जी के ऊपर लेखमाला लिखी थी। उसकी 24वीं किश्त निम्न थी, जिसे मैंने प्रसिद्ध इतिहासकार श्री भगवान सिंह जी के फेसबुक वॉल पर पढ़ा, तब से इस लेखमाला को ढूंढ रहा हूँ। यदि आपमें से कोई उस लेखमाला के बारे में बता सकें तो कृपया बताएँ।
मुम्बई: दो आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद सावरकर को बंबई के डोगरी जेल में रखा गया। यही पर उन्हें जेल के कपड़े दिए गये और गले में पहनने के लिए एक गोल सरिया भी दिया गया जिसपर 1960 नंबर अंकित था जो जेल से उनके छूटने का वर्ष भी था।
इसी दौरान कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक सर हेनरी कॉटन एक सभा में बोलते हुए सावरकर की तस्वीर को देखा और कहा की अफसोस की उज्जवल भविष्य वाला एक युवा, एक प्रतिभाशाली व्यक्ति आज कितनी दयनीय स्थिति में पहुंच गया है। इस बयान पर विवाद हो गया । कांग्रेस ने तुरंत अपने संस्थापक के बयानों से अपने को अलग किया। कांग्रेस सत्र के अध्यक्ष सर विलियम बैडरबर्न और सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने भी बयान जारी करके कहा कि वह विनायक सावरकर जैसे व्यक्ति के लिए सर हेनरी कॉटन की संवेदनाओं की पैरवी नहीं करते हैं।
इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यह थी कि राष्ट्रवादी कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक के “केसरी”ने भी हेनरी कॉटन का निजी विचार कहते हुए खुद को इससे अलग कर लिया।
जहां एक तरफ विदेशी और यूरोपियन समाचार पत्र विनायक दामोदर सावरकर को एक वीर देशभक्त कह रहे थे वहीं भारतीय समाचार पत्र बचाव की मुद्रा अपनाते हुए डर रहे थे उन पर अंतिम फैसला आने के बाद “द टाइम्स आफ इंडिया” के आलेख का दुर्भाग्यपूर्ण शीर्षक था–
“धूर्त को उसके किए की सजा मिल गयी”
1 महीने बाद सावरकर को डोंगरी जेल से मुंबई के ही बायकुला जेल लाया गया। डोगरी में विनायक को दूध और रोटी मिलती थी। यहां दूध बंद कर दिया गया और सिर्फ सूखी रोटी खाने के लिए सावरकर को दी जाने लगी। सावरकर ने यहां जॉन बन्यन की “द प्रिल्ग्रिम्स प्रॉग्रेस”, डब्ल्यू टी स्टीड या रूसी जनरल कुरोप्तकिन की पुस्तकों में से किसी एक की मांग रखी। लेकिन शाम को उन्हें अंग्रेजी बाइबल की एक प्रति दी गई। बाकी मांगों को खारिज कर दिया गया।
बायकुला जेल से उन्हें जल्द ही एक दूसरी जेल ठाणे जेल में स्थानांतरित किया गया। यहां पर किसी भी कैदी को विनायक के पास आने की अनुमति नहीं थी विनायक की निगरानी के लिए दुर्दांत पहरेदार रखें गए जो सब मुस्लिम थे।
यहां खाने में आधे पके ज्वार और अधपकी सब्जियां मिलती थी, जो कड़वी होती थी। अक्सर रोटी तोड़कर मुंह में डालकर उसे पानी से निगलना पड़ता था। सावरकर की सभी संपत्तियां जप्त कर ली गई उनके संदूक पुस्तक, कपड़े और अन्य साज और सामान सब कुछ जिसकी कुल कीमत 27000 रुपए थी । यहां तक की खाना पकाने के बर्तन भी जप्त कर लिए गए थे। एक सुबह जेल में सावरकर से कहा गया कि वह अपना चश्मा और छोटी सी भागवत गीता की प्रति भी दे दें क्योंकि यह भी उनकी संपत्ति है लेकिन बाद में रहम दिखाते हुए सरकार को गीता और चश्मा लौटा दिया , जिसे अब सरकारी संपत्ति के तौर पर सावरकर को इस्तेमाल करना था।
25 जून 1911 सावरकर की स्वास्थ्य जांच की गई ताकि उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के बारे में जाना जा सके फिर उन्हें स्वस्थ घोषित करके मद्रास और वहां से अंडमान भेजने की तैयारी की गई।
एक बनियान, उस पर एक पुराना कंबल, हाथ में छोटा प्याला लोहे की तश्तरी, बगल में कंबल और गद्दा दबाए सावरकर को कड़े पहरे के बीच मद्रास जाने वाले वैन में बैठाया गया। इस दौरान सावरकर के हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेडी थी।
27 जून 1911 को एस एस महाराजा नामक जहाज से विनायक दामोदर सावरकर की एक खतरनाक अपराधी के तौर पर अंडमान द्वीप के सेल्यूलर जेल की यात्रा शुरू हुयी। इस कष्टदायी पल के बारे में विनायक सावरकर लिखते हैं–
“आजीवन कारावास के लिए अंडमान के लिए रवाना होना किसी जीवित व्यक्ति को उसके ताबूत में लिटाने जैसा है। इस दौरान हजारों अंडमान गए कोई 10 भी भारत वापस लौटकर नहीं आए।………. बाहरी दुनिया के लिए मैं मृत था, यह भावना उनके चेहरों पर अंकित थी।……. मेरी और देखना, निकट से जाने वाली किसी अर्थी को देखने जैसा ही था। यदि कोई मेरा साथी मुझसे कहता , “जाओ मेरे भाई, जाओ, मैं और मेरे जैसे अन्य भारत को आजाद कराने की तुम्हारी प्रतिज्ञा को पूर्ण करेंगे” तो मुझे लगता कि मेरी आर्थी मुझे फूलों की सेज जैसी महसूस होती।”
#Savarkar 24
Reyansh की पोस्ट से साभार
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