अनूप नारायण सिंह
पटना। बिहार के वरिष्ठ पत्रकार एवं Live Cities के संस्थापक ज्ञानेश्वर वात्सायन के हालिया पोस्ट ने बिहार के डिजिटल मीडिया जगत में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। यह बहस सिर्फ व्यूज़ और रेवेन्यू की गिरावट की नहीं, बल्कि पूरे डिजिटल मीडिया इकोसिस्टम के बदलते चरित्र की है।
आज डिजिटल मीडिया का सबसे बड़ा मंच माने जाने वाले YouTube ने अपने एल्गोरिद्म में ऐसा बदलाव किया है, जिसने चैनलों की कमर तोड़ दी है। संस्थागत चैनलों के व्यूज़ में 50-60 प्रतिशत तक की गिरावट और मोनेटाइजेशन में 70 प्रतिशत तक की कमी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सिर्फ वीडियो की संख्या मायने नहीं रखती। पहले यदि किसी बड़े इवेंट या प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो देखी जाती थी, तो उससे जुड़े अन्य चैनलों की वीडियो भी दर्शकों तक स्वतः पहुंच जाती थी।
इससे सभी को व्यूज़ मिलते थे। अब ‘Repetitive Content’ के नाम पर यह चक्र लगभग समाप्त हो चुका है।इस बदलाव का सीधा असर यह हुआ है कि संस्थानों में नई भर्तियां रुक गई हैं, कई जगह मैनपावर कम किया जा रहा है। जहां नियुक्तियां हो भी रही हैं, वहां न्यूनतम गारंटीड भुगतान से अधिक पाने के लिए व्यूज़ का लक्ष्य निर्धारित किया जा रहा है। यह मीडिया कर्मियों के पेशेवर जीवन में असुरक्षा की नई परत जोड़ रहा है।दूसरी ओर, Facebook ने तो वर्षों पहले ही वीडियो न्यूज़ पर लगभग भुगतान बंद कर दिया था। कभी एक मिलियन व्यूज़ पर संस्थानों को इतनी आय हो जाती थी कि रिपोर्टर और एडिटर को प्रोत्साहन राशि दी जा सके। आज हालत यह है कि एक मिलियन व्यूज़ पर 1 डॉलर भी मिल जाए तो उपलब्धि मानी जाती है। यह डिजिटल विज्ञापन बाजार के बदलते स्वरूप और प्लेटफॉर्म-नियंत्रित अर्थव्यवस्था की कठोर सच्चाई है।एल्गोरिद्म के इस नए दौर में नेताओं के बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस और तात्कालिक प्रतिक्रियाओं का महत्व घट रहा है।
प्लेटफॉर्म अब ‘Explainer’ और ‘Decoder’ को प्राथमिकता दे रहा है। यानी अनुभव, विश्लेषण और संदर्भ आधारित पत्रकारिता की आवश्यकता बढ़ गई है। यह बदलाव एक अवसर भी है—उनके लिए जो विषय की गहराई समझते हैं और सतही सनसनी से आगे बढ़कर तथ्य और व्याख्या प्रस्तुत कर सकते हैं।क्राइम कंटेंट को लेकर भी सख्ती बढ़ी है। मर्डर, रेप, सुसाइड जैसे विषयों पर प्लेटफॉर्म की निगरानी और प्रतिबंध अधिक कठोर हो गए हैं। ऐसे वीडियो न केवल सीमित सर्कुलेशन पाते हैं, बल्कि उन पर विज्ञापन भी न्यूनतम मिलते हैं। इससे स्पष्ट संकेत है कि केवल सनसनीखेज सामग्री के भरोसे डिजिटल मीडिया का भविष्य सुरक्षित नहीं है।एक और दिलचस्प पहलू बेरोजगारी से जुड़े कंटेंट का है। ऐसे वीडियो भारी व्यूज़ तो बटोरते हैं, लेकिन विज्ञापन कमाते नहीं। कारण स्पष्ट है—विज्ञापनदाता उन दर्शकों तक पहुंचना चाहते हैं जिनकी क्रय-शक्ति हो।
प्लेटफॉर्म की प्राथमिकता भी वहीं झुकती है।समग्र रूप से देखें तो डिजिटल मीडिया का ‘मात्रा युग’ समाप्ति की ओर है और ‘गुणवत्ता युग’ की शुरुआत हो रही है। यदि दिन भर में दर्जनों वीडियो डालने के बजाय 4-5 सशक्त, विश्लेषणात्मक और विश्वसनीय वीडियो प्रकाशित कर समान राजस्व अर्जित किया जा सकता है, तो यह आत्ममंथन का समय है।जो संस्थान विश्वसनीयता की पूंजी के साथ आगे बढ़े हैं, वे इस संक्रमण काल में भी टिकेंगे।
गप-गॉसिप और तात्कालिक उत्तेजना स्थायी समाधान नहीं दे सकते। अंततः दर्शक वही मंच चुनता है, जिस पर उसे भरोसा हो।डिजिटल मीडिया का यह संकट दरअसल एक अवसर भी है—पत्रकारिता को उसके मूल स्वरूप, तथ्य, विश्लेषण और जिम्मेदारी की ओर लौटने का अवसर। और शायद यही वह मोड़ है, जहां से अगली डिजिटल क्रांति जन्म लेगी।



