दिल्ली : कांग्रेस-मुक्त भारत, यह नारा किसका है?
आज के राजनीतिक गलियारों में गूंजता है। पर इसकी पहली आहट बहुत पहले सुनाई दी थी।
एक बाग़ी दिमाग में। एक बेचैन आत्मा में। डॉ. राम मनोहर लोहिया के भीतर।
23 मार्च। जयंती। सिर्फ फूल चढ़ाने का दिन नहीं। थोड़ी असहज सच्चाइयों से टकराने का दिन भी।
लोहिया, कद काठी छोटी, मगर असर विराट।
1934। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी। साथ में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव। कांग्रेस के भीतर समाजवाद का बीज बोया गया। लोहिया विदेश विभाग के सचिव बने। फिर 1942, भारत छोड़ो आंदोलन। भूमिगत जीवन। कांग्रेस रेडियो की आवाज़।दबाने की हर कोशिश नाकाम।
आज़ादी आई। पर लोहिया संतुष्ट नहीं हुए। नेहरू का मॉडल उन्हें अधूरा लगा। मिश्रित अर्थव्यवस्था। केंद्रीकृत योजना। उन्हें यह “ऊपर से विकास” दिखा, जनता से दूर, सत्ता के करीब।उन्होंने राह बदली।
1955, सोशलिस्ट पार्टी। फिर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी। अपना मंच। अपनी लड़ाई। संसद में पहुंचे तो आंकड़ों को हथियार बनाया। “तीन आने रोज।” गरीबी की रेखा का नंगा सच देश के सामने रख दिया।
सड़क पर उतरे तो मुद्दे और तेज हो गए; जाति के खिलाफ। अंग्रेज़ी के प्रभुत्व के खिलाफ। किसान के शोषण के खिलाफ।
फिर आया 1967, एक नारा नहीं, एक रणनीति। “गैर-कांग्रेसवाद।” आज की भाषा में कहें तो, यही था “कांग्रेस-मुक्त भारत” का पहला ब्लूप्रिंट।
लोहिया ने विपक्ष को जोड़ा। कांग्रेस की दीवारों में दरार डाली। कई राज्यों में सत्ता बदली। गठबंधन राजनीति ने यहीं जन्म लिया।
यहीं एक असहज सवाल खड़ा होता है। आज जो “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा गूंजता है; क्या उसके पहले शिल्पकार को याद किया जाता है?
क्या सत्ता को अपने वैचारिक पूर्वजों के प्रति आभार नहीं जताना चाहिए?
पर कहानी सीधी रेखा नहीं है। लोहिया जितने तेज थे, उतने असहज भी। कटु
आलोचना। बिना फिल्टर की भाषा। नतीजा, अपने ही खेमे में दरारें। दोस्त विरोधी बनते गए।आंदोलन बड़ा हुआ, संगठन छोटा रह गया।
अब उनके दिमाग की ओर चलते हैं।
बर्लिन विश्वविद्यालय। नमक कर पर पीएचडी। मार्क्स को पढ़ा, पर आंख मूंदकर नहीं अपनाया। वर्ग-संघर्ष की कठोरता ठुकराई। सोवियत मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने गढ़ा: “नया समाजवाद।” न पूंजीवाद। न साम्यवाद। दोनों से “समान दूरी।” उनका समाजवाद किताबों का नहीं, ज़रूरतों का था।
उत्पादन, ज़रूरत के हिसाब से। केंद्र में: मनुष्य। मशीन नहीं। और फिर; सप्त क्रांति। एक साथ कई मोर्चे।आर्थिक असमानता के खिलाफ।जाति के खिलाफ। लिंग भेद के खिलाफ। रंगभेद के खिलाफ। विदेशी वर्चस्व के खिलाफ।
यह विचार नहीं; एक बहु-आयामी संघर्ष था। “चौखंबा राज्य।” गांव, जिला, प्रांत, केंद्र। सत्ता का विकेंद्रीकरण। दिल्ली की पकड़ ढीली करने का सपना। नेहरू की केंद्रीकृत सोच के ठीक उलट।
पर असली ट्विस्ट यहां है। लोहिया गांधी के उत्तराधिकारी थे; पर कॉपी-पेस्ट नहीं।
एक अपग्रेडेड संस्करण। अहिंसा ली।सत्याग्रह लिया। ग्राम स्वराज लिया।पर उसमें समाजवाद का बारूद भरा।
गांधी नैतिक सुधार की बात करते थे।लोहिया ने कहा, संरचना बदलो। “रोटी और बेटी।” एक साथ खाना।एक साथ शादी। जाति पर सीधा प्रहार।
यह नारा नहीं था; सामाजिक विस्फोट का फार्मूला था। उन्होंने गांधीवाद को रीब्रांड किया। आंदोलन को हथियार बनाया। न शुद्ध आदर्शवाद। न विदेशी विचारधारा।
एक देसी मिश्रण, जो जमीन से जुड़ा था, और झकझोरने वाला भी। लेकिन हर विरासत की तरह, यह भी धुंधली और विवादित हो गई, लोहिया के अनेकों शिष्यों, उत्तराधिकारियों की करतूतों की वजह से। राज नारायण, मधु लिमए, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश, मंडल, मुलायम सिंह यादव, बड़ी लिस्ट है!!
कुछ नीतियों पर सवाल भी उठे। विकेंद्रीकरण; कहीं विखंडन का डर।अंग्रेज़ी विरोध; मध्यम वर्ग की दूरी।टूटती पार्टियां; कमजोर राजनीतिक असर। तीखे व्यक्तिगत हमले; बड़ी सोच पर परदा।
फिर भी एक तस्वीर याद रखिए।
1967। गरीबी में जीवन। सादगी में मौत। न सत्ता का लोभ। न संपत्ति का मोह।
आज जब असमानता फिर सिर उठा रही है। जब नवउदारवाद का शोर है।जब विकास की चमक के पीछे असंतुलन छिपा है ; तब लोहिया फिर याद आते हैं।
उनका “नया समाजवाद”; एक तरह का सशस्त्र गांधीवाद। जहां स्वराज सिर्फ आज़ादी नहीं, बराबरी भी है।
लोहिया संत नहीं थे। पर चिंगारी जरूर थे। एक विद्रोही गांधीवादी, जिसने सत्ता को ललकारा। समाज को आईना दिखाया। और आज भी उनकी आवाज़ गूंजती है; “जब सड़क खामोश है, सदन आवारा हो जाती है।”
जाति पर उनका प्रहार आज भी उतना ही सटीक है; “जाति अवसर को सीमित करती है… और अवसर क्षमता को।”
और स्त्री पर उनकी कल्पना; सीता नहीं, द्रौपदी। आज्ञाकारिता नहीं, बुद्धि और साहस।
यही लोहिया थे: असुविधाजनक, असहज, लेकिन जरूरी।
सवाल अब भी हवा में तैर रहा है? क्या हम लोहिया को सिर्फ याद कर रहे हैं, या सच में उन्हें समझ भी रहे हैं?



