एक साधारण तस्वीर, एक बड़ा विवाद

2-32.jpeg

दिल्ली। आजकल सोशल मीडिया और राजनीति का मेल इतना गहरा हो गया है कि एक मामूली सी फोटो भी किसी की छवि को धूमिल करने का हथियार बन जाती है। हाल ही में प्रयागराज के एडिशनल पुलिस कमिश्नर आईपीएस अजय पाल शर्मा की एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें वे हवाई चप्पल पहने, प्लास्टिक के सादे स्टूल पर रखे छोटे से केक को काटते नजर आ रहे हैं। उनके इर्द-गिर्द कुछ लोग खड़े हैं, माहौल बिल्कुल सामान्य-सा उत्सव वाला लगता है-शायद किसी जन्मदिन या छोटे समारोह का। लेकिन इसी तस्वीर को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मीडिया के सामने पेश कर गंभीर आरोप लगा दिए। उनका कहना है कि यह फोटो साबित करती है कि अजय पाल शर्मा शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी से मिले हुए हैं, और उनके खिलाफ चल रही जांच (जिसमें यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं) निष्पक्ष नहीं हो सकती।

तस्वीर देखकर सच में लगता है—क्या इतना ही काफी है किसी को अपराधी साबित करने के लिए? एक पुलिस अधिकारी का किसी के साथ केक काटना, वो भी अनौपचारिक माहौल में, क्या इसे सीधे मिलीभगत या साजिश का सबूत मान लिया जाए? यह फोटो किसी बड़े भ्रष्टाचार, रिश्वत या गैरकानूनी काम की नहीं है-बस एक सामान्य उत्सव की है। फिर भी इसे हथियार बनाकर अफसर की ईमानदारी पर सवाल उठाए जा रहे हैं। शंकराचार्य ने इसे प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाकर कहा कि ”हिस्ट्रीशीटर के साथ पुलिस अफसर बर्थडे मना रहा है, तो जांच कैसे निष्पक्ष होगी?” 

यह घटना आज की राजनीति की कड़वी सच्चाई दर्शाती है। जहां असहमति या विरोध को व्यक्त करने के बजाय, चरित्र हनन और बदनामी का रास्ता अपनाया जा रहा है। “देखो, किसके साथ खड़ा है” या “इसके साथ फोटो है”—बस इतना ही काफी हो जाता है किसी को बदनाम करने के लिए। कोई सबूत की गहराई नहीं देखता, कोई संदर्भ नहीं तलाशता। बस एक क्लिक, एक शेयर, और विवाद तैयार।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी पहले से ही राजनीतिक बयानबाजी और सक्रियता के लिए चर्चित हैं। वे दिन-रात राजनीति करते दिखते हैं-कभी सत्ता पर सवाल, कभी जांच पर आरोप। अगर राजनीति में इतना रुचि है, तो खुलकर मैदान में क्यों नहीं आते? योगी आदित्यनाथ की तरह कोई पार्टी जॉइन कर लें, चुनाव लड़ें, सत्ता में आएं और सिस्टम को अपने तरीके से सुधारें। लेकिन बाहर रहना और दूसरों की छवि खराब करना आसान रास्ता है। यह न तो आध्यात्मिक गरिमा के अनुरूप है, न ही लोकतंत्र की।

समाज में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं, जहां बिना ठोस आधार के लोगों को बदनाम किया जाता है। पुलिस, न्यायपालिका या प्रशासन पर विश्वास कम हो रहा है, क्योंकि हर मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। आईपीएस अजय पाल शर्मा एक अधिकारी हैं-उनकी जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन एक साधारण तस्वीर से उन्हें ‘मिला हुआ’ घोषित करना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है।
अगर हम ऐसी राजनीति को बढ़ावा देते रहे, तो कल कोई भी तस्वीर-चाहे कितनी भी इनोसेंट हो-किसी की जिंदगी बर्बाद कर सकती है। समय है कि हम तथ्यों पर ध्यान दें, संदर्भ समझें और बदनामी की इस गंदी राजनीति को रोकें। अन्यथा, सम्मान और सत्य दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।

Share this post

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top