एक समय में आकाशवाणी और डीडी के एंकरों की लोकप्रियता फिल्म स्टारों जैसी थी- डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), नई दिल्ली के कला निधि विभाग द्वारा सुश्री संगीता अग्रवाल की पुस्तक ‘दूरदर्शन: आधी आबादी की सशक्त गाथा’ के लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा उपस्थित रहीं। अपने संबोधन में उन्होंने पुस्तक को भारतीय दूरदर्शन के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की यात्रा का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बताया और कहा कि यह कृति आधी आबादी की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका को सशक्त स्वर प्रदान करती है।

पुस्तक परिचर्चा सत्र में अंतरराष्ट्रीय न्यायविद परिषद्, लंदन के अध्यक्ष एवं सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आदर्श सी. अग्रवाल, आईजीएनसीए के डीन एवं कला निधि विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़, वाणी प्रकाशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री अदिति माहेश्वरी, आकाशवाणी की उप-निदेशक सुश्री प्रज्ञा देवड़ा तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका सुश्री संगीता अग्रवाल ने भी अपने विचार रखे।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सचिदानंद जोशी ने कहा कि किसी भी चुनौतीपूर्ण और जोखिमपूर्ण विषय पर पुस्तक का प्रकाशन लेखक से कहीं अधिक साहस का कार्य होता है, क्योंकि आज समाज में पढ़ने वालों और विशेषकर पुस्तकें खरीदकर पढ़ने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने दूरदर्शन के स्वर्ण-युग को स्मरण करते हुए कहा कि एक समय दर्शक पूरे कार्यक्रम धैर्यपूर्वक देखते थे, जबकि आज के रील-युग में ध्यान-अवधि कुछ सेकंड तक सीमित रह गई है। उन्होंने कहा कहा, उस दौर के एंकरों और रचनाकारों की लोकप्रियता फिल्म स्टारों जैसी थी, लेकिन इसके पीछे निरंतर संघर्ष, अनुशासन और प्रतिबद्धता थी।

डॉ. जोशी ने यह भी रेखांकित किया कि ‘आधी आबादी’ का संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ है और कैमरे के सामने तथा पीछे कार्यरत महिलाओं की भूमिका को समान रूप से स्वीकार करने और उस पर संवाद करने की आवश्यकता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में कैमरे के पीछे कार्य करने वाले लोगों के संघर्ष पर केंद्रित गंभीर लेखन सामने आएगा, जो समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘कृषि दर्शन’ में अपनी एंकरिंग के दिनों को भी रोचकता से याद किया।

मुख्य अतिथि कुमुद शर्मा ने पुस्तक के शीर्षक पर बात करते हुए कहा कि भारतीय परम्परा के आलोक में स्त्रियां आधी आबादी नहीं हैं, बल्कि वे आधेपन के पूरा करने वाली हैं। आज मीडिया में जो स्त्रियां हैं, वो पुरुष के चैतन्य को कसौटी पर कस रही हैं। मीडिया इंडस्ट्री बहुत तेज़ी से बदली है और उसने बहुत विकास किया है। मीडिया में महिलाएं बहुत सशक्त स्थिति में हैं, नीति-निर्माताओं में शामिल हैं। पूरे परिदृश्य में उनकी विजिबिलिटी बहुत सशक्त है। उन्होंने यह भी कहा, स्त्रियों का मीडिया में जो संघर्ष रहा है, वह बहुत कठिन रहा है। महिलाओं ने प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चौतरफा संघर्ष करके अपना मुकाम बनाया है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के संघर्ष के साथ-साथ उनकी प्रगति और विकास की गाथा आना भी ज़रूरी है।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण करते हुए कहा, हमारी पीढ़ी, जो दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून सुनकर बड़ी है, उसका लगाव आज भी दूरदर्शन और आकाशवाणी से है। उन्होंने कहा कि पुस्तक के तीन खंड हैं- आकाशवाणी, दूरदर्शन और डीडी न्यूज़। इस पुस्तक में बहुत सारी नई जानकारियां हैं।

आदिश सी. अग्रवाल ने कहा, भारतीय जनमानस में दूरदर्शन और आकाशवाणी का जो स्थान है, वह स्थान देश के बड़े-बड़े उद्योगतियों द्वारा चलाए जा रहे चैनल कभी नहीं ले सकते। लेखिका संगीता अग्रवाल ने कहा, इस पुस्तक में मैंने बताने का प्रयास किया है कि आकाशवाणी, दूरदर्शन, डीडी न्यूज़, डीडी इंडिया में विभिन्न पदों पर कार्यरत महिलाओं ने कितना संघर्ष किया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बताना भी ज़रूरी है कि देश की आज़ादी से लेकर देश निर्माण के हर कार्य में आधी आबादी यानी महिलाओं की हमेशा महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

अदिति माहेश्वरी ने कहा, विश्व के सबसे अनोखे ब्रॉडकास्ट नेटवर्क (आकाशवाणी व दूरदर्शन) के बारे में जितनी बात की जाए, उतना कम है। इस नेटवर्क ने आज़ादी से लेकर अब तक देश की भावना को आवाज़ दी है। इस किताब में कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें आप परत दर परत खोलेंगे, तो देखेंगे कि अगर आप अपनी शिक्षा और अभिव्यक्ति के अधिकार का देश के लिए उपयोग करेंगे, तो आपको कोई रोक नहीं सकता। इस अवसर पर आकाशवाणी की उप-निदेशक सुश्री प्रज्ञा देवड़ा ने भी आकाशवाणी के अपने अनुभव साझा किए।

परिचर्चा में सभी वक्ताओं ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि दूरदर्शन ने किस प्रकार भारतीय समाज में महिलाओं की आवाज़, पहचान और सशक्तिकरण को मंच प्रदान किया तथा यह पुस्तक उस यात्रा की सजीव और प्रामाणिक गाथा प्रस्तुत करती है।

कार्यक्रम की ख़ासियत यह भी रही कि पुस्तक में जिन महिलाओं की कहानियां शामिल हैं, उनमें से कई उपस्थित रहीं और उनका परिचय भी श्रोताओं से कराया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी, मीडिया प्रतिनिधि और कला-संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

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