एक वामपंथी उस पार था और एक इस पार

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दिलीप कुमार कौल
श्रीनगर। फोटो में extreme right hand side पर जो गली दिख रही है उसके साथ लगा हुआ बड़ा सा गुलाबी आभा वाला घर मेरा घर है जहां मेरा जन्म हुआ। इस घर में अब्दुल अहद आज़ाद जैसे सुविख्यात कश्मीरी कवि आते थे। कश्मीर के हिन्दी कवियों कथाकारों की अनेक गोष्ठियां यहां होती थीं। कम्युनिस्ट माहौल का घर था। इस घर के ठीक पीछे हमारे पड़ोसी रहते थे जिनका बेटा हिलाल अहमद जे के एल एफ का प्रमुख आतंंकवादी था। आतंकवाद के आरंभ में किसी आतंकी गुट के कुछ लड़के हमारे घर के दरवाज़े पर भी आये थे। मेरी मां दरवाज़े पर ही उनसे बहस करने लग गयीं। शोर सुनकर हिलाल अहमद और उसका छोटा भाई प्रिंस सलीम नीचे आये और प्रिंस सलीम ने कहा, ” बंदूक का बच्चा लेकर जो तुम घूम रहे हो उससे हमारे घर के बच्चे खेलते हैं।” तब हमें पता चला कि जो लड़के आये थे बंदूक लेकर आये थे हमें कश्मीर से निकालने। हिलाल अहमद ने कहा, ” यह मेरा घर है। इसकी ओर आंख उठाकर भी देखा तो यहां से वापस नहीं जाओगे।” इसके बाद हमारे घर की ओर आंख उठाकर भी किसी ने नहीं देखा। हम सुरक्षित थे। भारत कहीं नहीं था।

जम्मू से सामान लेने हमारे मोहल्ले के एक पंडित जी आये। उन्हें हमारी गली के बाहर ही गोली मार दी गयी। हिलाल अहमद की मां हब्बा हमारे घर आई और बोली, “डरना मत। तुम्हारा बाल भी बांका न होगा। इस इलाके के एरिया कमांडर को पता है कि तुम वैसे लोग नहीं हो।”
हम वैसे लोग नहीं थे। हम सुरक्षित थे। कश्मीरी पंडितों को गोली मारी जाती रही और कोई न कोई हमारे घर आता रहा कि तुम सुरक्षित हो तुम्हारा बाल भी बांका न होगा।

सुरक्षित पिता दिन रात सिगरेट बीडी जो भी मिलता पीते रहते। बार बार दिन में और रात में उठते और देखते कि दरवाज़े पर सांकल लगी है या नहीं। कम्युनिस्ट पिता।

गुरुदेव हरिकृष्ण कौल कश्मीरी भाषा के अद्वितीय कथाकार, जिनका हिन्दी में भी बहुत नाम हुआ उससे भी अच्छे अध्यापक थे। कश्मीर विश्वविद्यालय में उनसे पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 1989 में गली गली में जुलूस निकलते थे जिनमें कश्मीर के लगभग हर घर के लोग निकलते थे। आज हंसी आती है सुनकर कि कश्मीर में कुछ लोग हैं जो आतंक के हिमायती नहीं हैं।

जुलूस निकल रहा था, ” हम क्या चाहते आज़ादी। आज़ादी का मतलब क्या लाइलाह इलिल्लाह। पाकिस्तान से रिश्ता क्या लाइलाह इलिल्लाह।
हरिकृष्ण कौल सड़क के उस पार सब्ज़ी वाले से सब्ज़ी ख़रीद रहे थे। प्रखर वामपंथी हरिकृष्ण कौल। इस पार मैं था और बीच से जुलूस गुज़र रहा था, “हम क्या चाहते आज़ादी।”

जुलूस बस गुज़रा ही था की गुरुदेव हरिकृष्ण कौल की नज़र मुझ पर पड़ी। जिस व्यंग्य के लिये वे विख्यात थे सारा उनकी मुस्कान में आ गया। वे सड़क के उस पार से चिल्लाये, ” दिलीप, वामपंथ कहां पहुंचा?”

“अभी अभी गया है सर.” मैंने जवाब दिया।
पीछे से एक और जत्था आ रहा था आज़ादी के नारे लगाता हुआ।
एक वामपंथी उस पार था और एक इस पार।

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