एक्स-मुस्लिम मूवमेंट को कोई  सहायता या संरक्षण नहीं

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दिल्ली। पिछले दस वर्षों में भाजपा शासित केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने एक्स-मुस्लिम मूवमेंट को कोई वास्तविक सहायता या संरक्षण नहीं दिया। कमलेश तिवारी, कन्हैयालाल और उमेश कोल्हे जैसे उन लोगों की हत्याओं के बाद न्याय की प्रक्रिया धीमी और अपर्याप्त रही, जबकि हत्यारों को सजा देने में गंभीरता की कमी दिखी।

कमलेश तिवारी की 2019 में हुई निर्मम हत्या में मुख्य साजिशकर्ता सैयद असिम अली को 2024 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई, जबकि कई आरोपी अभी भी लंबित मुकदमों में फंसे हैं। कन्हैयालाल तेली की 2022 में उदयपुर में हुई सिर काटकर हत्या के मामले में कुछ आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, और मुख्य हत्यारों के खिलाफ प्रक्रिया अभी भी न्यायिक जांच के दौर में है।

उमेश कोल्हे की 2022 में अमरावती में हत्या के मामले में NIA जांच के बावजूद कई आरोपियों को बेल मिलने की खबरें आई हैं, और पूर्ण सजा का इंतजार लंबा खिंच रहा है। इन हत्याओं के पीछे ब्लासफेमी या नुपुर शर्मा समर्थन जैसे मुद्दे थे, जो एक्स-मुस्लिम या हिंदू अधिकारों से जुड़े थे, लेकिन सरकार ने इन मामलों को प्राथमिकता नहीं दी।

इन हत्याओं के बाद एक्स-मुस्लिम चेहरों, जैसे सलीम वास्तिक, को कोई विशेष सुरक्षा प्रदान नहीं की गई। सलीम वास्तिक जैसे लोग खुले तौर पर इस्लाम की आलोचना करते हैं और एक्स-मुस्लिम आंदोलन का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें सरकारी स्तर पर कोई Y या Z कैटेगरी सुरक्षा नहीं मिली। वहीं, चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ जैसे नेताओं को केंद्र सरकार ने 2024 में Y+ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की, जो CRPF कमांडोज के साथ आती है। यह विडंबना स्पष्ट करती है कि मोदी सरकार की प्राथमिकताएं राजनीतिक गठजोड़, चुनावी गणित और मुख्यधारा के मुद्दों पर ज्यादा केंद्रित हैं, न कि एक्स-मुस्लिम जैसे हाशिए पर मौजूद आंदोलनों पर।

अब जब सलीम वास्तिक पर हाल ही में जानलेवा हमला हुआ और वे अस्पताल में गंभीर हालत में हैं, तो भाजपा आईटी सेल और पेड हैंडल अचानक भावुक होकर रोने-धोने का नाटक शुरू कर देंगे। वे ट्रोल आर्मी के जरिए सहानुभूति जुटाएंगे, लेकिन अतीत में कभी एक्स-मुस्लिम कंटेंट को प्रमोट नहीं किया, न ही इन आवाजों को प्लेटफॉर्म दिया। यह सब दिखावा मात्र है-जब खतरा टल जाता है या वायरल हो जाता है, तब याद आती है। असल में, एक्स-मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा और न्याय की मांग को सरकार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। यह दोहरा चेहरा एक्स-मुस्लिमों के लिए संदेश है कि उनकी लड़ाई अकेले की लड़ाई है, और सत्ता की प्राथमिकताओं में वे कहीं नहीं हैं।

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