उदासीनता और भ्रष्टाचार से आगरा के हरियाली के ख्वाब बेमानी हुए

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आगरा । उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित वृक्षारोपण मुहिमें, जिन्हें अक्सर पर्यावरणीय मील का पत्थर बताया जाता है, ज़मीनी हकीकत में बार-बार नाकाम हो रही हैं। इसका कारण है — सरकारी लापरवाही, जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार का धुंधलका। 2019 में घोषित 22 करोड़ पौधारोपण लक्ष्य की तरह कई घोषणाएं सिर्फ़ काग़ज़ों पर रह गईं। रिपोर्ट्स से पता चलता है कि पौधे तो लगाए जाते हैं, लेकिन देखरेख न होने से बड़ी संख्या में सूख जाते हैं, और फंड नौकरशाही की भूलभुलैया में गुम हो जाते हैं।

हरित कार्यकर्ता उंगली उठाते हैं: योजना की कमी: पौधों के लिए पॉलिथीन बैग और गुणवत्तापूर्ण नर्सरी पौधे समय से पहले ही अनुपलब्ध थे, जिससे किसानों को घटिया बीज इस्तेमाल करने पड़े जिनकी जीवन संभावना नगण्य थी।

रखरखाव भी नदारद: 2018 के महाअभियान में एक दिन में 9 करोड़ पौधे लगाए गए, लेकिन थर्ड पार्टी निगरानी के अभाव में ज़्यादातर नष्ट हो गए — “ना रहेगा बाँस, ना बजेगी बाँसुरी”।

भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं: नर्सरी और देखभाल के लिए तय बजट का ग़लत इस्तेमाल हुआ। “कागज़ी पेड़ों” ने सरकारी फाइलों में खूब हरियाली फैलाई, मगर धरातल पर सूखा ही सूखा।

यह सिलसिला जारी है — “सियासी तमाशा हावी है, पर्यावरणीय असर बेअसर।” और भ्रष्टाचार सिर्फ फाइलों में हरियाली उगाता है, धरती पर नहीं। जब तक पारदर्शिता और जन-सहभागिता को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, यूपी की हरियाली सिर्फ़ “मृग-मरीचिका” बनी रहेगी।

ताज ट्रेपेजियम ज़ोन (TTZ) — 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैले इस अति-संवेदनशील क्षेत्र में, जहां ताजमहल और अन्य मुग़ल धरोहरें स्थित हैं, वहां हरियाली घटती जा रही है। लाखों पौधे हर साल लगाए जाने के दावों के बावजूद ज़मीन पर जंगल कटते जा रहे हैं। वजह — अंधाधुंध निर्माण, प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्टाचार, और ज़मीन की भारी किल्लत।

रिवर कनेक्ट कैंपेन सदस्य कहते हैं कि ये असफलताएं केवल पर्यावरण के लिए ख़तरा नहीं हैं, बल्कि आगरा की ऐतिहासिक धरोहरों को रेगिस्तानी हवाओं और प्रदूषण से बचाने के संतुलन को भी बिगाड़ रही हैं। बड़ी-बड़ी परियोजनाएं — जैसे एक्सप्रेसवे, फ्लाईओवर, 29.6 किमी लंबा आगरा मेट्रो रेल मार्ग और चौड़े नेशनल हाइवे — ने हरे क्षेत्रों को निगल लिया है। “यमुना और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे” के विस्तार ने जंगलों को छीन लिया है, जिससे ताजमहल अब राजस्थान की धूलभरी हवाओं के निशाने पर है। अवैध बस्तियाँ, यमुना के डूब क्षेत्र में कॉलोनियां, रेलवे ज़मीन की नीलामी — इन सबने शहर की हरियाली को कंक्रीट में बदल डाला है। कभी अग्रवन (वन क्षेत्र) कहलाने वाला शहर अब मात्र 9% से भी कम हरित आवरण के साथ खड़ा है — जो राष्ट्रीय लक्ष्य 33% से बहुत कम है।

वृक्षारोपण अभियानों का नाटक देखिए: 2023 में 45 लाख, 2024 में 50 लाख और 2025 में 60 लाख पौधे लगाए जाने का दावा किया गया — लेकिन ये आंकड़े सिर्फ़ “काग़ज़ी पेड़” हैं। कोई देखरेख नहीं, कोई सुरक्षा नहीं — तो पौधे सूख ही जाते हैं। 2021 में यमुना किनारे, नदी की तलहटी में 12,000 पौधे लगाए गए थे, जो पहली बारिश में ही बह गए — फिर भी ठेकेदार को पूरा भुगतान हुआ। “इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए कि व्यवस्था गड़बड़ है?”

उदासीनता का आलम ये है कि सुप्रीम कोर्ट का 1996 का निर्देश कि TTZ में हरित बफर जोन बने — आज भी अनसुना है। चारों तरफ, वृंदावन से लेकर फिरोजाबाद तक पेड़ काटने की खबरें आ रही हैं। बिल्डर्स पेड़ कटवा रहे हैं, अवैध कटाई धड़ल्ले से जारी है।
सूर सरोवर बर्ड सेंक्चुरी और कीठम झील, जो अति महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी क्षेत्र हैं, वो भी अब कॉलोनाइज़रों की गिरफ्त में हैं, बताते हैं डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य।

भूमि की कमी एक बड़ी चुनौती:

फिल्म सिटी, एयरपोर्ट, मॉल — सबने ज़मीन खा ली। 60 लाख पौधों के लिए 5 मीटर की दूरी पर 1.5 लाख हेक्टेयर ज़मीन चाहिए — कहाँ से आएगी? सरकारें 1990 से हर साल करोड़ों पौधे लगाने का दावा करती हैं, पर हरियाली वहीं की वहीं — “नंबरों का घोटाला है ये!”
ग्रीन एक्टिविस्ट्स कहते हैं कि पौधे गलत मौसम और गलत जगहों पर लगाए जाते हैं, देखभाल के अभाव में सूख जाते हैं। आगरा में बंदरों की आबादी एक लाख से ज़्यादा है — प्रशासन इन्हें दोष देता है। लेकिन कार्यकर्ता कहते हैं — बंदर तो बहाना हैं, असली गुनहगार है जवाबदेही की कमी और लालच।
परिणाम भयावह हैं: बढ़ता प्रदूषण, घटती बारिश, जल-स्तर का गिरना, और ताजमहल की संगमरमर पर काले दाग। सिर्फ दयालबाग क्षेत्र में ग्रीन एरिया बढ़ा है, बाकी इलाकों में बढ़ती बसावट ने हरियाली नीली है।

पर्यावरण और हरियाली की मुहिम से जुड़े एक्टिविस्ट्स, TTZ में किए गए सभी वृक्षारोपण अभियानों की स्वतंत्र ऑडिट की मांग कर रहे हैं, ताकि गड़बड़ियाँ उजागर हो सकें और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जा सके।

मस्ती-भरा मेरा हिंदुस्तान: उल्टा-सीधा एक समान

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दिल्ली । बीते वर्ष इन्हीं दिनों, साउथ की एक यूनिवर्सिटी में “भारतीय दर्शन और विज्ञान” विषय पर आयोजित एक सेमिनार में, एक ज्ञानी साधु महाराज को लैपटॉप से प्रेजेंटेशन देते देखा, एक हाथ में मोबाइल, दूसरे में रिमोट l वाह, क्या अद्भुत संगम था टेक्नोलॉजी और फिलासफी का!!

एक खबर अगले दिन अखबार में पढ़ी। आष्टांग योग के विख्यात शिक्षक गुरु, हार्ट अटैक की वजह से ICU में इलाज के लिए भर्ती। उधर रॉकेट से अंतरिक्ष में सैटेलाइट सफलता पूर्वक भेजने के लिए हवन, प्रार्थना सभा में बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

भारत देश महान है। विसंगतियों और विरोधाभासों को हम विविधता कहकर सम्मान देते हैं। ये हमारा बड़प्पन है कि असफलताओं का क्रेडिट खुद न लेकर सितारों को देते हैं, जबकि सफलता के कई बाप होते हैं। चिमटाधारी चिलमची बाबा को वोही महत्व देते हैं जितना मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर को।
ये पावन भूमि विचित्रताएं का एक ऐसा मेला है जहाँ हर चीज़ “जुगलबंदी” करती है—चाहे वो पुराना हो या नया, पवित्र हो या पगला, सब मिलकर एक रंग-बिरंगी रेनबो कलर की पोर्ट्रेट बनाते हैं, जहां मुंह में राम बगल में छुरी लिए दुश्मन भी दोस्ती का किरदार खूबी से निभाते हैं।

हमारे यहाँ संतों ने मोक्ष पाने के लिए जंगलों में तपस्या की, लेकिन आज के आध्यात्मिक गुरु, बेंगलुरु के टेक पार्क में “मोक्ष” (IPO) की तलाश करते हैं! महात्माओं को जंगल में वृक्ष के नीचे ज्ञान मिला, पर आज के गुरु “लिंक्डइन” पर ज्ञान बाँटते हैं। पैसा कमाओ प्राणायाम से, मोह माया के खिलाफ तकरीर करके।

22 भाषाएँ, 1000 से ज्यादा बोलियाँ, पर जब भारत-पाक मैच होता है, तो सब एक हो जाते हैं! हम सब एक हैं… बस टीवी स्क्रीन तोड़ने के लिए! ट्रेन में बैठकर अगर आप इडली-सांभर ऑर्डर करें, तो तैयार रहें पैंट्री वाला आपको इडली के साथ, सांभर की जगह सब्जी रायता थमा सकता है!
हम मंगल पर मिशन भेजते हैं, लेकिन गाँव में 4G का सिग्नल पकड़ने के लिए लोग पेड़ पर चढ़ जाते हैं! कोविड काल में बहुतों ने ये प्रयोग किया। इसरो ने चंद्रयान भेजा, हमने व्हाट्सएप फॉरवर्ड भेजा! सवेरे उठते ही सभी को धार्मिक संदेश, या देवी देवताओं के आशीर्वाद वॉट्सएप पर फॉरवर्ड करना, एक हेल्थी रिचुअल बन चुका है जिससे देश पर ग्रह नक्षत्र मनमानी नहीं कर पाते।

आवारा कुत्ते, बंदर, गायें सड़क पर राज करते हैं, और हम उनके आगे हॉर्न बजाओ, देश बचाओ वाले नारे लगाते हैं। यातायात नियम? वो क्या होता है? गाय माता जहाँ चलें, वहीं सबको रुकना पड़ता है! साइलेंट जोन में जोर से भोंपू बजाए। जिधर जगह मिले, घुसो, आगे निकलो, चालान आयेगा, देख लेंगे विधायक जी!

आजकल लोग “स्वाइप राइट” करके प्यार ढूँढ़ते हैं, लेकिन शादी तब तक नहीं होती जब तक पंडित जी कुंडली नहीं मिला लेते! रिश्ता शादी की वेबसाइट से, परखा जाएगा पंडितजी की ज्योतिषी चाल से, यजमान हाथ जोड़े नतमस्तक सितारों की गति और दिशा से। यानी अब जन्म कुंडली का मैच कराओ!
अमीरी गरीबी की रेखा मोह माया या मृग तृष्णा है। एक तरफ अंबानी का 27 मंजिला घर, दूसरी तरफ झुग्गी में रहने वाले लोग। ट्रिकल-डाउन इकोनॉमी? जब रोकड़ा प्रथम पायदान पर ही रुक जाए तो समृद्धि का बंटवारा, कभी न खत्म होने वाला सपना ही बना रहता है।

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, लेकिन नेता वही पुराने खानदान से आते हैं। चुनाव आता है, जाता है… पर नेता वही रहते हैं! ये एक नई जाति व्यवस्था है, जिसमें नेता के बच्चे नेता, डॉक्टर के डाक्टर, सीए के सीए, जजों के जज वकील, आईएस के बच्चे ऑफिसर, एंड सो ऑन। हम फ्लेक्सिटेरियन नहीं, बस थोड़े कन्फ्यूज्ड हैं! मीट खाना गुनाह, दारू पीकर मांसाहारी गाली गलौज तर्क संगत! घर में दादी हल्दी वाला दूध पिलाती हैं, और हम कैफे में “हल्दी लट्टे” के लिए ₹500 देते हैं! पुराना ज्ञान, नया पैकेजिंग! विषमताएं और ढोंग, आडंबर life ko रोचक बनाते हैं । लड़कियां हवाई जहाज उड़ा रही हैं, लेकिन शादी के बाद सबसे पहला सवाल— “रोटी बनाना आता है न? कोई बॉय फ्रेंड तो नहीं है न?”

हम दीये जलाकर अंधेरा भगाते हैं, फिर पटाखों से हवा को इतना जहरीला बना देते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है! पहले प्रदूषण फैलाओ, फिर एयर प्यूरीफायर खरीदो! पर्सनल या कम्युनिटी हाइजीन की किसे चिंता, बस फ़ोग deo है तो, स्प्रे करते रहो। पाप को धुएं में उड़ाओ, भंडारे में प्रसाद पाओ।

सबका साथ, सबका विकास। हम सबको साथ लेकर चलते हैं… बस चुनाव के लिए ही धर्म याद आ जाता है! “वोट बैंक की पूजा, सबसे बड़ा धर्म!”

भारत को समझना हो तो हार्वर्ड की डिग्री कम पड़ेगी, और अगर समझ आ गया तो पक्का आप बाबा बन जाएंगे! यहाँ विरोधाभास कोई सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हमारी यूएसपी है। जितने फन, उतनी गहनता; जितनी सादगी, उतनी जुगाड़ टेक्नोलॉजी! सच कहें तो हम भारतीयों की खासियत ये है कि हमारी ट्रैजिक ट्रैफिक जाम भी कॉमिक कॉन्सर्ट लगती है।

हमारी संस्कृति ऐसी है कि एक ही व्यक्ति हवन भी करता है और ठेके पर लाइन में भी लगता है। सुबह योग, शाम को जलेबी! मंदिर में मत्था टेकते हैं, और बाहर निकलकर हेलमेट फेंककर ट्रैफिक नियम तोड़ते हैं। जय श्री, बोलते हुए बाइक स्टार्ट करना भी अब इंश्योरेंस का हिस्सा बन गया है। यहाँ हर चीज़ में ड्यूलिटी है। मंदिर में माथा टेकते हैं और पूजा के बाद मोबाइल से वीडियो बनाकर अपलोड भी करते हैं — “जय बाबा वायरलनाथ की!”
हम भारतीय उस थाली की तरह हैं जिसमें सब कुछ होता है — और कभी-कभी कुछ ऐसा जो न तो पकवान है, न पहचान — जैसे “प्याज वाली खीर।”

विकास की दौड़ में परंपरा अक्षुण्ण है विरासत के साथ

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सुभाष चन्द्र

जयपुर । विकास की रफ्तार से दौड़ते शहरों के बीच कभी-कभी कोई दृश्य हमें अपनी जड़ों से जोड़ देता है। ऐसा ही एक दृश्य हाल ही में जयपुर की व्यस्त सड़कों पर देखा गया, जहां एक व्यक्ति कांवड़ प्रसाद को कंधों पर उठाए हुए आगे बढ़ रहा था। जयपुर में इसे “कांवड़ प्रसाद” कहा जाता है, तो वहीं मिथिला में इसे भार-भड़िया कहा जाता है। यह नज़ारा आधुनिकता और परंपरा के सुंदर संगम का प्रतीक बन गया।

मिथिला में अब ऐसे दृश्य कम ही देखने को मिलते हैं। हालांकि, नवरात्रि के दौरान छठे दिन अपराह्न में पालकी दिखाई देती है और सप्तमी की सुबह विशेष आह्वान के साथ मां जगदंबा को बिल्व वृक्ष से दुर्गा पूजा स्थल तक लाया जाता है। यह परंपरा आज भी वहां की सांस्कृतिक स्मृति को संजोए हुए है।

जयपुर के त्रिपोलिया गेट से तीज महोत्सव के दौरान जब मां की स्वर्ण-रजत पालकी निकली, उससे पहले कांवड़ प्रसाद लिए सज्जन को देखकर अतीत की स्मृतियां ताज़ा हो गईं। यह कांवड़, नाम से ही स्पष्ट है, मां के विशेष प्रसाद की सामग्री से युक्त होती है। यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा भी है।

महिलाओं के रंग-बिरंगे पर्व तीज के उपलक्ष्य में राजस्थान पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय तीज महोत्सव-2025 का भव्य शुभारंभ रविवार को हुआ। पहले दिन तीज माता की पारंपरिक शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं, स्थानीय नागरिक, देश-विदेश से आए पर्यटक और जनप्रतिनिधि शामिल हुए।

छोटी चौपड़ पर बने भव्य मंच से राज्यपाल हरिभाऊ बागडे, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, उप मुख्यमंत्री व पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्री दिया कुमारी, उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सहित कई गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में तीज माता की महाआरती की गई। यह पहली बार था जब उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी ने स्वयं मंच से तीज माता की आरती की।

इस महोत्सव की विशेष बात रही महिलाओं की झांकी, जिसमें उन्होंने लहरिया साड़ियों में सजकर माथे पर कलश रखकर पारंपरिक नृत्य किया। यह दृश्य न केवल आकर्षक था, बल्कि उसने राजस्थान की सांस्कृतिक गहराई को सजीव कर दिया। इस दौरान महिला पंडितों द्वारा तीज माता की पूजा की गई, जो महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बना।

शाही शोभायात्रा में बिखरा राजस्थानी लोक संस्कृति का रंग
तीज माता की शोभायात्रा ने सिटी पैलेस स्थित जनानी ड्योढ़ी से प्रारंभ होकर त्रिपोलिया गेट, छोटी चौपड़, चौगान स्टेडियम होते हुए तालकटोरा पौंड्रीक पार्क तक नगर भ्रमण किया। इस यात्रा में घोड़े-बग्घियां, हाथी, ऊंट, बैल, बैंड, राजस्थानी झांकियां, और शहनाई-नगाड़ों से सजी एक राजसी झलक देखने को मिली।

शोभायात्रा में करीब 200 लोक कलाकारों ने राजस्थान की विविध सांस्कृतिक विधाओं का प्रदर्शन किया। बनवारीलाल जाट की कच्छी घोड़ी, शेखावाटी का गैर नृत्य, बहुरूपिया कलाकारों के नारद-कृष्ण-शंकर रूप, कालबेलिया नृत्यांगनाएं, चरी नृत्य, हेला ख्याल, और राजू भाट के कठपुतली नर्तन ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

आज जब देश डिजिटलीकरण, स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है, ऐसे दृश्य यह याद दिलाते हैं कि हमारी असली ताकत हमारी परंपराओं में निहित है। तकनीकी प्रगति जरूरी है, लेकिन अपने संस्कार, अपनी विरासत को सहेजना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

तीज महोत्सव-2025 ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि राजस्थान की परंपरा, रंग और लोक कला देश-दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है। इस आयोजन ने नारी शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक समरसता का भव्य मंच प्रस्तुत किया। यह महोत्सव न केवल राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का प्रयास है, बल्कि पर्यटन को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

यही संतुलन हमें एक ऐसा समाज बनाता है, जहां परंपरा और प्रगति दोनों साथ-साथ चलती हैं कृ न तो कोई बोझ बनती है, न ही कोई बाधा। कांवड़ प्रसाद से लेकर स्वर्ण पालकी तक, यह केवल आस्था की झलक नहीं, बल्कि हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व की पहचान है। यही पहचान हमें भीड़ से अलग करती है और भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए भी अपनी जड़ों से जोड़े रखती है।

राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भाई वीरेंद्र पर एफआईआर: दलित समाज के लिए क्या है राजद का संदेश

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के मनेर से विधायक भाई वीरेंद्र एक बार फिर विवादों में हैं। उनके खिलाफ पंचायत सचिव संदीप कुमार ने पटना के एससी-एसटी थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है। यह मामला एक वायरल ऑडियो से उपजा, जिसमें विधायक कथित तौर पर सचिव को धमकाते और अपशब्द कहते सुने गए। यह विवाद एक मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने को लेकर शुरू हुआ, जब सचिव ने विधायक को पहचानने से इनकार किया। ऑडियो में विधायक का गुस्सा साफ है, जहां वे कहते हैं, “जूता से मारूंगा” और “पूरा हिंदुस्तान मुझे जानता है, तुम कैसे नहीं जानते?” इस घटना ने बिहार की सियासत में तूफान खड़ा कर दिया है।

संदीप कुमार ने शिकायत में आरोप लगाया कि विधायक ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और धमकी दी, जिससे उन्हें मानसिक उत्पीड़न सहना पड़ा। पुलिस ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया और जांच शुरू की, जिसमें ऑडियो की प्रामाणिकता और कॉल डिटेल्स की पड़ताल हो रही है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो भाई वीरेंद्र की गिरफ्तारी संभव है, क्योंकि यह एक्ट गंभीर धाराएं लगाता है। हालांकि, गिरफ्तारी से पहले पुलिस को ठोस सबूत और कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

इस घटना ने आरजेडी की कार्यशैली और दलित समाज के प्रति उसके रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कुछ समय पहले लालू प्रसाद यादव का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वे कथित तौर पर बाबासाहेब आंबेडकर की तस्वीर को पैरों तले रखे हुए थे। इस वीडियो को पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने दलित समुदाय को यह संदेश देने के प्रयास के रूप में देखा कि बिहार में दलित वोट हासिल करने के लिए दबाव की रणनीति अपनाई जा सकती है। यह धारणा अब भाई वीरेंद्र के व्यवहार में भी झलकती है। एक दलित कर्मचारी के साथ उनका कथित दुर्व्यवहार और पार्टी की ओर से कार्रवाई का अभाव इस बात का संकेत देता है कि दलित समाज के प्रति सम्मानजनक रवैया अपनाने का संदेश शायद पार्टी के भीतर नहीं पहुंचा है। भाई वीरेंद्र का आचरण उसी मानसिकता को दर्शाता है, जो पार्टी आलाकमान से प्रेरित हो सकती है।

भाई वीरेंद्र ने फेसबुक पर सफाई दी कि सचिव ने शिष्टाचार नहीं दिखाया और जनता के काम में लापरवाही बरती, जिससे उनकी भाषा तल्ख हो गई। उन्होंने ऑडियो को विपक्ष द्वारा वायरल करने का आरोप लगाया। लेकिन यह सफाई उनकी छवि को बचाने में नाकाफी रही। तेज प्रताप यादव ने खुलकर उनकी आलोचना की और कार्रवाई की मांग की, जिससे पार्टी के भीतर मतभेद उजागर हुए।

जनप्रतिनिधि से समाज उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षा करता है। यदि कोई कर्मचारी भूल करता है, तो शिकायत के लिए कानूनी और प्रशासनिक रास्ते हैं। धमकी और अभद्रता न समाधान है, न ही यह जिम्मेदार नेतृत्व का परिचय देता है। यह मामला न केवल भाई वीरेंद्र की साख पर सवाल उठाता है, बल्कि आरजेडी की दलित समाज के प्रति नीति और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

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