कांग्रेस पर ‘लायबिलिटी’ तो नहीं बन रहा संदीप सिंह

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दिल्ली। संदीप सिंह, जो स्वयं को ‘द एक्टिविस्ट संदीप’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं और सोशल वर्कर होने का दावा करते हैं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी सक्रियता के लिए जाने जाते हैं। उनकी पोस्ट्स और लेखन शैली पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि उनकी भाषा अक्सर आक्रामक, अतिशयोक्तिपूर्ण और तथ्यात्मक रूप से कमजोर होती है। यह लेखन शैली न केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करती है, बल्कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को भी गंभीरता से लेने में बाधा डालती है। उनकी पोस्ट्स में तर्क की कमी और भावनात्मक उत्तेजना का अधिक उपयोग देखा जाता है, जो एक प्रभावी सामाजिक कार्यकर्ता के लिए आवश्यक संतुलन का अभाव दर्शाता है।

कांग्रेस की आईटी सेल के साथ उनके संबंध की बात करें तो यह कहना मुश्किल है कि वे प्रत्यक्ष रूप से इस सेल द्वारा ‘पालित’ हैं या नहीं। हालांकि, उनकी पोस्ट्स में कांग्रेस के प्रति एक स्पष्ट झुकाव और विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा, के खिलाफ आलोचना देखी जा सकती है। यह संभव है कि वे कांग्रेस की विचारधारा से प्रेरित हों या उनकी कुछ पोस्ट्स का उपयोग पार्टी के प्रचार के लिए हो। फिर भी, उनकी अराजक और अतिवादी भाषा कांग्रेस के लिए भी एक ‘लायबिलिटी’ साबित हो सकती है, क्योंकि यह गंभीर राजनीतिक विमर्श को नुकसान पहुंचाती है और पार्टी की छवि को धूमिल कर सकती है।

संदीप जैसे व्यक्तियों का विश्लेषण करते समय यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर एक्टिविज्म अक्सर ध्यान आकर्षित करने का माध्यम बन जाता है। उनकी लेखन शैली और सामग्री से लगता है कि वे तथ्यों और तर्कों से अधिक भावनात्मक अपील पर निर्भर करते हैं। इससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं और वे एक गंभीर सामाजिक कार्यकर्ता के बजाय प्रचारक की छवि बनाते हैं। कांग्रेस को ऐसे व्यक्तियों से दूरी बनाए रखने की जरूरत है, ताकि उनकी विश्वसनीयता और प्रभाव बरकरार रहे।

रोहिंग्याओं की वजह से खतरे में बंगाली पहचान

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अरुण मुखर्जी 

कोलकाता । पश्चिम बंगाल, जो आज़ादी से 400 साल पहले दुनिया के औद्योगिक और व्यापारिक केंद्रों में से एक था, अब खंडहर में तब्दील हो चुका है।

 मुर्शिदाबाद, जो कभी दुनिया के 15% व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता था, अब श्रम आपूर्ति केंद्र बन गया है। कोलकाता, जिसकी तुलना 80 साल पहले भी लंदन से की जाती थी, अब रेगिस्तान बन गया है। और इसीलिए आज करोड़ों बंगाली पलायन कर रहे हैं। वे अपनी ज़मीन-जायदाद बेचकर दिल्ली से कैलिफ़ोर्निया जा रहे हैं। ऐसे में, एक नया वोट बैंक बनाने के लिए, पश्चिम बंगाल सरकार लाखों बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को लाकर उन्हें अवैध पहचान पत्र दे रही है। साथ ही, बंगाली पहचान के नाम पर दशकों से भारत भर में पलायन कर रहे बंगालियों को भी खतरे में डाल रही है। 

 आज पश्चिम बंगाल की हालत ऐसी है कि कंप्यूटर इंजीनियर, एमबीए, डॉक्टर, वकील, अकाउंटेंट, लेखक, इतिहासकार, लेस आर्टिस्ट, सुनार, फिटर, बढ़ई और किसानों के लिए कोई काम नहीं है। कश्मीर में सेब तोड़ते समय बंगाली किसानों की गोली मारकर हत्या तक की जा रही है, राज्य की ऐसी दुर्दशा है। इस स्थिति में, जिस तरह से ममता बनर्जी नक्सल-संचालित मीडिया, शराबी बुद्धिजीवियों और लोगों को गुमराह करने के लिए अस्थायी नौकरी दिए गए शिक्षकों और प्रोफेसरों के समूह के साथ भारत विरोधी आंदोलन शुरू कर रही हैं, कल उपरोक्त सभी कारक श्रमिकों को खतरे में डाल देंगे।

 लोग अब सचमुच बांग्लादेशियों या रोहिंग्याओं के साथ बंगालियों पर भी हमला करना शुरू कर देंगे। प्रवासी बंगाली समुदाय (दिल्ली क्षेत्र) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री से अपील करता है कि वोट पाने के लिए इन करोड़ों असहाय बंगालियों को खतरे में न डालें।
प्रवासी बंगाली समाज

नशा मुक्त जीवन ही आपको श्रेष्ठ बनाता हे – दीपाली चंदौरिया

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मुरैना – मध्यप्रदेश पुलिस महानिदेशक के द्वारा पूरे प्रदेश में संचालित “नशे से दूरी हे जरूरी” के तहत “नशा मुक्त भारत ” को लेकर जन – जागरूकता अभियान चलाया जा रहा हे। जिसके तहत राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के संयुक्त तत्वाधान में प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह अभियान 15 जुलाई से 30 जुलाई तक संपूर्ण प्रदेश में चलाया जा रहा हे। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समाज को नशा मुक्त बनाना हे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारी शहर की पुलिस उपाधीक्षक दीपाली चंदौरिया ने विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन बेहद कीमती हे और इसको किसी भी प्रकार के नशे से बर्बाद नहीं करना चाहिए। एक श्रेष्ठ जीवन जीने में नशा बहुत बड़ी बाधा बन जाता हे और कई लोगों के भविष्य इस नशे की लत से गर्त में चले गए यहां तक कि कई परिवार भी इस नशा की आदत से तबाह हो गए हे। युवाओं में नासमझी के चलते जो औरों की देखा देखी ने नशे की लत लग जाती हे वह उनको सामाजिक, मानसिक पीड़ा में डाल देती हे यहां तक कि कई लोग इस वजह से अवसाद का शिकार हो जाते हे। इसलिए हम प्रतिज्ञा करे कि स्वयं नशे से दूर रहे और समाज को भी जागरूक करें।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के केंद्रीय प्रचार समिति सदस्य एवं प्रांत प्रचार प्रमुख, पत्रकार अर्पित शर्मा ने युवाओं को स्वाभिमान की एहमियत बताते हुए कहा कि युवा जीवन स्वाभिमान और मेहनत से जीने का सबसे बड़ा प्रेरणा स्त्रोत होता हे इस अवस्था में युवा अपनी मेहनत की दम पर गर्व के साथ जीवन में हर कार्य को करने के लिए तत्पर रहता हे और जीवन को बड़ी ही आजादी के साथ जीने का आनंद लेता हे ऐसे में जब वह नशे की लत में आता हे तो छुप छुप रहना शुरू कर देता हे और घरवालों को, समाज को कहीं पता ना चल जाए उसके लिये वह बुरी संगत में पड़ जाता हे और खुद को नशे की लत से बाहर नहीं निकाल पाता यहां तक कि जब उसका जेब खर्च नशे के पदार्थों पर खर्च हो जाते हे तो वह उसे पूरा करने क्राइम के रास्ते पर भी चला जाता हे। इन सब की वजह से जो युवा अपना उच्च भविष्य बनाकर देश के काम आ सकता था वह स्वयं को नशे में ऐसा बर्बाद कर लेता हे कि फिर वह अपने लक्ष्य से भी भटक जाता हे, इसलिए युवाओं को हमेशा सर उठाकर जीने के लिए नशे जैसी बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए और घर में भी अगर कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का नशा करता हे तो उनको इस बार का विरोध अपने घर में भी दर्ज कराना चाहिए। स्वयं बदलेंगे तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो देश बदलेगा। इसलिए आप सभी इस देश और परिवार की धरोहर हो, इस स्वयं की धरोहर को हमेशा सम्भल कर रखे और देश को महान बनाने में अपना योगदान दे स्वामी विवेकानंद जी को अपना आदर्श बनाए और उनके जैसा उच्च जीवन जीने का प्रयास करें।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि फिल्म निर्माता एवं समाजसेवी अंकित शर्मा ने नशे से होने वाले नुकसानों को बताते हुए कहा कि हर वर्ष 1 लाख से ज्यादा लोग इस नशे की वजह से मृत्यु को प्राप्त हो रहे और यह आंकड़ा कोरोना जैसी महामारी से होने वाली मृत्यु से भी भयानक हे। नशे से होने वाली बीमारियों के इलाज में ना जाने कितने परिवार तबाह हो गए, कितनो के घर, जेवर तक बिक गए। इसलिए सभी लोग इस नशा खोरी से स्वयं से दूर रखते हुए समाज में जहां रहे वहां इस नशे के खिलाफ प्रचार करें। स्वयं की एवं परिवार की कीमत समझे और नशे जैसे खतरनाक राक्षस को समाज से खत्म करें।

महाविद्याल के प्राचार्य ऋषभ पाल सिंह ने सभी विद्यार्थी को समझाते हुए कहा कि वह स्वयं को नशे से दूर रखे और अपने महाविद्यालय परिषर के आस पास भी ऐसा जागरूक अभियान चलाए, साथ ही उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उनका स्वयं का एक रिश्तेदार जो पढ़ने से लेकर खेल की गतिविधि में भी सबसे अव्वल आता हे वह अचानक कुछ गलत संगत में आकर नशे की लत में पड़ गया जिस वजह से आज उसका पूरा जीवन तबाह हो गया और जो किसी उच्च पद तक जाकर देश की सेवा कर सकता था वह अब अपने परिवार को भी ठीक से नहीं संभाल पा रहा। आगे उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरण देख कर हमें सिख लेना चाहिए और स्वयं को, अपने परिवार को इन सबसे दूर रखना चाहिए। एवं अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की ओर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

मंच संचालक प्रोफेसर दिलीप कटारे द्वारा आखिर में कार्यक्रम के समापन में पुलिस विभाग द्वारा सभी को शपथ दिलाई गई कि वह स्वयं को नशे से दूर रखेंगे एवं अपने परिवार और समाज को भी नशे से दूर रहने के लिये प्रेरित करेंगे और समाज में एक आदर्श जीवन के रूप में स्वयं को स्थापित करेंगे।

पत्नी के अपमान पर खामोश क्यों हैं अखिलेश यादव

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लखनऊ। डिम्पल यादव पर मौलाना साजिद रशीदी द्वारा की गई अभद्र टिप्पणी, जिसमें उनकी मस्जिद में बैठने की शैली और कपड़ों को लेकर आपत्तिजनक बयान दिया गया, ने उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। इस मुद्दे पर अखिलेश यादव और डिम्पल यादव की चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए हैं। इस चुप्पी की वजह को समझने के लिए हमें सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों को देखना होगा।

पहली बात, अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी (सपा) की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सपा ने हमेशा “मुस्लिम-यादव” (MY) समीकरण को अपनी ताकत माना है। मौलाना साजिद रशीदी जैसे प्रभावशाली धार्मिक नेताओं की टिप्पणियों का विरोध करने से मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में नाराजगी की आशंका रहती है, जो सपा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। अखिलेश की चुप्पी को इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि वह वोट बैंक को नाराज करने से बचना चाहते हैं, खासकर तब जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।

दूसरी ओर, डिम्पल यादव की चुप्पी को उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक व्यक्तित्व के नजरिए से समझा जा सकता है। डिम्पल एक सांसद के रूप में अपनी छवि को मजबूत और संयमित बनाए रखना चाहती हैं। इस तरह के विवाद में प्रत्यक्ष रूप से उलझने से उनकी छवि को नुकसान हो सकता है। साथ ही, वह इस मुद्दे को अनदेखा कर इसे समय के साथ ठंडा होने देना चाहती होंगी।

मुलायम सिंह यादव को “मुल्ला मुलायम” कहे जाने का तंज उनके मुस्लिम समुदाय के प्रति कथित तुष्टिकरण नीति से जुड़ा है। अखिलेश भी इस छवि से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस मामले में उनकी चुप्पी इसे और पुख्ता करती दिखती है। हालांकि, यह कहना कि एक नेता अपनी पत्नी के अपमान को केवल वोट बैंक के लिए सहन करेगा, सरलीकरण होगा। यह संभव है कि अखिलेश इस मुद्दे को तूल न देकर सांप्रदायिक तनाव से बचना चाहते हों।

अखिलेश और डिम्पल की चुप्पी रणनीतिक हो सकती है, जो राजनीतिक नुकसान से बचने और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की कोशिश को दर्शाती है। लेकिन यह चुप्पी सपा की छवि को कमजोर भी कर सकती है, क्योंकि यह उनके समर्थकों में यह संदेश दे सकती है कि वे अपमान के खिलाफ खड़े होने में असमर्थ हैं।

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