कांग्रेसियो को भी कम नहीं रेला है दिलीप मंडल ने

mandal_1578203735.jpg

प्रवीण शुक्ल

दोपहर से अब देर रात तक अभी भी ट्विटर पर दिलीप मंडल छाए हुए है , मण्डल ना तो नेता हैं, ना सेनापति, ना सरकारी बाबू, ना धरनेवाले किसान, वे कभी पत्रकार हुआ करते थे, हिन्दूओ में जाति के प्रश्नों को उठाकर हिंदुत्व की राजनैतिक शक्ति को कमजोर करते थे।

शायद इसी वजह से मध्य प्रदेश में आई कमलनाथ की कांग्रेस सरकार ने उन्हें माखनलाल चतुरवेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय में पढ़ाने के लिए भी चुना, मेरी सूचना हैं की वे कभी किसी जमाने में विट्रिओलिक (जहर उगलने वाले) शरद यादव के जातिवादी भाषण लिखते थे। अभी हाल फिलहाल में अपने ओबीसी वर्ग के मुख्यमंत्री स्टालिन के करीब आये।अब लोकसभा चुनावों के दौरान ही कर्नाटक में ओबीसी कोटा में सम्पूर्ण मुस्लिम समाज को घुसाने की वजह से कांग्रेस के खिलाफ मुखर हुए , फिर तो अलीगढ मुलिम यूनिवर्सिटी , जामिया मिलिया ईश यूनिवर्सिटी में सैंवैधानिक आरक्षण प्राप्त एससी, एसटी और ओबीसी कोटे में सेंधमारी करने के लिए पूर्व शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह द्वारा ‘मायनॉरिटी संस्था’ की कांग्रेसी चाल पर हमलावर हुए।

क्यों सुर्खियों में हैं ?

मोदी की भाजपा सरकार ने अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ 2014 के बाद एकाएक संघ प्रेमी बने फुस्स पत्रकारों को मीडिया कंसल्टेंट जरूर बनाया था पर राहुल गाँधी के “मोदी आरक्षण ख़त्म कर देंगे” जैसे झूठे प्रोपोगैंडा को ना तो वो काउंटर कर पाए ना ही पार्टी को समय रहते बता पाए इसलिए जाति और आरक्षण पर मुखर रहने वाले सोसियल मीडिया वीर दिलीप मंडल को सरकार अपने मंत्रालय में लायी हैं। यह बिलकुल अप्रत्याशित कदम है, हिन्दुओं की फॉल्ट लाइन जाति भेद पर लिख कर हिंदुत्व को कमजोर करने वाला ही अब हिंदुत्व के खेमे में आया हैं।

किन्हे लग रही है मिर्ची :

1) भाजपा दफ्तर में तमाम बेरोजगार पत्रकार दल्लु दलाल बने फिरते थे सबके पेट में मरोड़ उठ रही है पर भैया आपकी कलम और तर्क में वैसा दम नहीं , जलते हो तो जलते रहो भाजपा ने पहली बार किसी गैर संघी आदमी यानी दिलीप मंडल को सूचना प्रसारण मंत्रालय में कंसल्टेंट बना कर अच्छा काम किया है।

2) मियां लोग एएमयू और जामिया में आरक्षण खत्म करने के कांग्रेसी दांव को सामने लाने के बाद खफा खफा हैं, मंडल ने बखूबी है इस बात को हाईलाइट किया किया की कैसे मायनॉरिटी इंस्टीट्यूशन के नाम पर सरकारी पैसों पर चलने वाले यह इंस्टीट्यूट सिर्फ मुसलमानों को आरक्षण दे रहे है ओबीसी , एस सी, एस टी या गरीब को नहीं

3) सारे रिटायर्ड बुजर्ग पत्रकार मंडल पर अपनी कोफ़्त कंसल्टेंट को मिलने वाले डेढ़ से दो लाख रूपये की तनख्वाह हैं की वजह से निकाल रहे हैं। इनके साथ ही 2014 से ही कांग्रेस के चरण चुम्बन कर रहे मिडिल एजेड पत्रकारों को भी बुरा लगा वे 10 साल से मलाई के कतार में थे। एक तो कांग्रेस सरकार आई नही , दूसरे उनके एंटी बीजेपी ग्रुप से सिर्फ मंडल को ही क्यों अपना लिया और उनको छोड़ दिया।

4) कांग्रेसी तो खैर राहुल और गांधी परिवार पर डायरेक्ट किये सवालों से दुखी हैं अपने ट्वीट में वे पूछ रहे है की राजीव गांधी फाउंडेशन में क्यों नहीं कोई ओबीसी , एस सी, एस टी वर्ग का प्रतिनिधि हैं , इस फाउंडेशन में कम से कम तीन लोग गांधी परिवार के है यह कैसे डायवर्सिटी हैं यह कैसे प्रतिनिधित्व हैं ??

स्थिरता (Sustainability) के लिए भू-राजनीति (Geopolitics) भारत के लिए एक अवसर!

artificial-intelligence-india-2024-01-e4cb53967a0285a70a33b38bb58cff96-3x2.jpg.webp

एस.के. सिंह

रूस से लौटने के कुछ महीनों के भीतर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की पोलैंड और यूक्रेन की वर्तमान यात्रा भारत की बहु-संरेखण भू-राजनीतिक रणनीति का प्रमाण है। प्रधानमंत्री की यात्रा के नतीजे को लेकर अटकलें कई गुना बढ़ गई हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री के रूप में उनकी यह पहली यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है। भारत एक दुर्लभ राष्ट्र है जिसके यूक्रेन के प्रमुख समर्थक रूस और पश्चिम दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं और कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मोदी दोनों पक्षों को बातचीत की ओर धकेलने में भूमिका निभा सकते हैं। यह उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि संघर्ष का मुख्य कारण यह है कि यूक्रेन की पश्चिमी दुनिया के साथ निकटता के कारण रूस को यूक्रेन से ख़तरा महसूस हुआ और विशेष रूप से यूक्रेन के नाटो में शामिल होने की स्थिति में नाटो के साथ एक लंबी सीधी सीमा होने की प्रत्याशा पर।

एक राष्ट्र के रूप में, भू-राजनीति का मुख्य कार्य अपने मित्र, शत्रु और प्रतिस्पर्धियों के पैटर्न की निगरानी करना और उसे प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के लिए तैयार करना और प्रतिक्रिया देना है। भू-राजनीति के लिए पारंपरिक और गैर-पारंपरिक रणनीति, सामरिक और रणनीतिक उपायों के माध्यम से मुख्य रूप से सुरक्षा और आर्थिक दृष्टिकोण से हमारे हितों की रक्षा करने की मांग करती है। संभवत: यूक्रेन अपने दीर्घकालिक हितों के लिए भू-राजनीतिक पैटर्न का विश्लेषण करने में विफल रहा।

पिछले 3 दशकों से एकध्रुवीय विश्व में शक्ति संतुलन नाटो और विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के पक्ष में होने के कारण भू-राजनीति पर टुकड़े-टुकड़े दृष्टिकोण वाले राष्ट्र के लिए अशांति का खतरा बढ़ गया है। शक्तिशाली देशों के गहरे राज्यों की बढ़ती भूमिका किसी राष्ट्र की स्थिरता को उसकी सबसे खराब स्थिति की ओर झुका सकती है। बांग्लादेश में उथल-पुथल का मौजूदा उदाहरण इस बात का प्रमाण है.

सतत विकास तीन मूलभूत स्तंभों पर आधारित है: सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय। इन सभी का किसी राष्ट्र की सुरक्षा से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंध होता है। रूस-यूक्रेन और इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्षों ने न केवल इन देशों और उनके पड़ोसियों के लिए बल्कि दुनिया भर के सभी देशों के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को परेशान कर दिया है, क्योंकि हमारे जीवन में कुछ भी अराजनीतिक नहीं है। इसलिए, सामाजिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार राजनीति के लक्ष्यों को तय करना समझ है।

सतत पर्यावरण भू-राजनीति एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है जो इस बात पर विचार करती है कि पर्यावरणीय विषयों को भू-राजनीतिक एजेंडा की सेवा में कैसे लाया जाता है। विशेष चिंता का विषय पर्यावरण से संबंधित सुरक्षा और जोखिम के बारे में दावे और उन दावों से निपटने के लिए प्रस्तावित कार्यों (या निष्क्रियता) का औचित्य है। स्थिरता प्राकृतिक संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करने का अभ्यास है, ताकि वे वर्तमान और भविष्य दोनों पीढ़ियों का समर्थन कर सकें। संरक्षण, समुदाय और परिपत्र अर्थव्यवस्था को अपनाकर हम सामूहिक रूप से अधिक टिकाऊ और लचीले भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भारत का रुख उसकी सूक्ष्म कूटनीति का उदाहरण है। रियायती दरों पर तेल की खरीद जारी रखने सहित रूस के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखते हुए, भारत ने संघर्ष पर भी चिंता व्यक्त की है। भारतीय प्रधान मंत्री के रूसी राष्ट्रपति के बयान कि “आज का युग युद्ध का नहीं है” ने वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। इसके अलावा भारतीय प्रधानमंत्री ने इटली में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेन के राष्ट्रपति से मुलाकात की। यह संतुलित दृष्टिकोण भारत को वैश्विक संघर्षों में संभावित मध्यस्थ के रूप में तैनात करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की अनुमति देता है।

विश्लेषकों का मानना है कि इसकी जटिलता के कारण और एक परिधीय खिलाड़ी के रूप में भारत की भूमिका के कारण मोदी के शांतिपूर्ण समाधान की संभावना बहुत कम है, लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के पास ऐसा करने के लिए कोई मजबूत प्रोत्साहन नहीं है। भारत की भू-राजनीति में जो कमी है वह है युद्ध से तबाह देश के लिए स्थायी भू-राजनीतिक प्रयासों को प्रभावित करना और उनका नेतृत्व करना। अगर प्रधानमंत्री मोदी यूक्रेन और रूस के बीच समझौता कराने में सफल होते हैं तो यह भारत की भू-राजनीति के लिए एक नई शुरुआत होगी। भारत जो पेशकश कर सकता है, वह अपने कौशल और संसाधनों के माध्यम से स्थिरता के लिए यूक्रेन जैसे युद्ध से तबाह देश का निर्माण करने में मदद कर सकता है।

अब बाबा साहिब के संविधान उखाड़ कर फेक देगे

71WJoZfzGeL._AC_UF10001000_QL80_.jpg

महेंद्र शुक्ल

जम्मू कश्मीर में आजादी के बाद पहली बार बाबा साहिब के संविधान अनुसार त्रिस्तरीय पंचायती व्यवस्था के अंतर्गत एक राष्ट्रीय ध्वज और एक विधान से आम चुनाव होने वाले है! फारुख अब्दुल्ला एंड कंपनी हो या वहा की अन्य तथाकथित दल अपने अलगाव वादी एजेंडे के साथ अपने घोषण पत्र जनता के बीच ला चुके है ! 1953 की पहले की स्तिथि बहाल करेगे अपना संविधान लागू करेगे! अब इनके गठबंधन के साथी कॉन्ग्रेस अभी तक बाबा साहिब का संविधान हाथ में ले कर उसकी रक्षा का ऐलान करने वाले कांग्रेस दल के युवराज ने भी अपने इरादे साफ़ कर दिए हैं, के गर जीते तो पूर्व की स्तिथि लागू होगी। वर्तमान व्यवस्था को जड़ से उखाड़ कर फेक देगे यानी जीते तो फिर दो विधान होगे, दो प्रधान होगे और दो निशान होगे।

किस को उखाड़ फेकेंगे विधान को जो बाबा साहिब द्वारा बना है 370और 35A लागू होगी यानी फीर दलित समाज का बच्चा सरकारी तौर पर सिर्फ कूड़ा उठाने का ही कार्य करेगा किसी भी अन्य सरकारी नौकरी में उसका कोई प्रतिनिधित्व नहीं होगा।

ये इतनी बडी घोषणना हैं जिस से देश में उबाल आ जाना चाहिए था पर सब शांत है और ये शान्ति बताती हैं के संविधान बचाओ और दलित के नाम पर जो भीड़ सड़को पर दिखती हैं वो एक ड्रामा से अधिक कुछ नहीं है असल में इनको बाबा साहिब या आम दलित से कुछ लेना देना ही नही न ये जानते हैं संविधान न बाबा साहिब इन नेताओ का जो दिन रात दलित पिछड़े का नारा देते घूमते हैं सिर्फ एक मानसिक कुंठा पैदा करते हैं समाज में आज आम जन मानस को चेतना चहिए और पूछना चाहिए के अब बाबा साहिब के संविधान को उखाड़ फेंकने वाले को हम क्यो न उखाड़ कर फेक दे !

कब तक महिलाएं शिकार होती रहेंगी

2-17.jpeg

देश में एक के बाद एक जिस तरह अलग अलग प्रदेशों से बलात्कार से जुड़ी भयावह खबरें आ रहीं है, उसके बाद प्रश्न उठता है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था बलात्कार की पीड़िताओं को न्याय दिलवा पाने मेें सक्षम नहीं है?

किश्तवाड़/ जम्मू कश्मीर: थाने के एसएचओ जहीर इकबाल ने दिया बलात्कार के आरोपी मुस्लिम लड़के का साथ। जहीर सस्पेंड कर दिया गया है लेकिन ऐसे मामलों में सस्पेंड पुलिस वाला कुछ दिनों बाद फिर वापस लौट आता है। बलात्कार का आरोपी भी निचली नहीं तो उससे बड़ी अदालत से छूट कर फिर समाज के बीच महिलाओं के लिए हमेशा खतरा बना घूमता रहता है। देश में एक के बाद एक जिस तरह अलग अलग प्रदेशों से बलात्कार से जुड़ी भयावह खबरें आ रहीं है, उसके बाद प्रश्न उठता है कि क्या वर्तमान न्याय व्यवस्था बलात्कार की पीड़िताओं को न्याय दिलवा पाने मेें सक्षम नहीं है? अब समाज के बीच इस सामाजिक बुराई खिलाफ एक स्वर में आवाज उठनी चाहिए। मिलकर सब फैसला करें कि महिलाओं की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो और कानून के हाथ से अपराधी के निकलने के लिए कोई सुराख ना बचे।

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में एक मुस्लिम युवक ने नाबालिग हिंदू लड़की का अपहरण कर उसके साथ दुष्कर्म किया। इस घिनौनी घटना पर इलाके के लोगों और पीड़िता के परिजनों ने रोष प्रकट करते हुए प्रदर्शन किया। न्याय की मांग करते हुए वे सड़क पर उतरे।

जानकारी के अनुसार इन प्रदर्शनकारियों पर एसएचओ जहीर इकबाल ने लाठीचार्ज करवाया। एसएचओ पर आरोपी का साथ देने का भी आरोप लगा है। वहीं इस लाठीचार्ज में एक महिला के घायल होने की भी सूचना मिली है। फिलहाल मौके पर माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। वहीं मजिस्ट्रेट द्वारा मामले की जांच शुरू कर दी गई है और एसएचओ इकबाल को सस्पेंड कर दिया गया है।

इतने गंभीर आरोप के बाद सस्पेंड हुआ। ऐसे मामलों में आम तौर पर देखा गया है कि सस्पेंड पुलिस वाला मामला ठंडा होते ही फिर वापस ड्यूटी पर बुला लिया जाता है।

scroll to top