IIC Book Launch: Abhay K’s English translation of Jayanath Pati’s Magahi novel “Fool Bahadur” unveiled: A Journey into the Heart of Bihari Literature

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Penguin India recently unveiled the English translation of Jayanath Pati’s Magahi novel “Fool Bahadur,” translated by renowned poet and diplomat Abhay K. This event, held at IIC, celebrated the rich cultural heritage of Bihari literature and its global significance.

‘Fool Bahadur’ holds a special place in Indian literature, and Abhay K’s meticulous translation ensures that its essence is preserved while making it accessible to a wider audience. Through this translation, readers around the world are presented with the opportunity to immerse themselves in the captivating narrative crafted by Jayanath Pati.

“The publication of the English translation of ‘Fool Bahadur’ as a Penguin modern classic marks a significant high point in the history of Magahi language and literature, which has a very rich literary history. I hope that my translation of the first Magahi novel will pave the path for more translations from Magahi and other languages of Bihar such as Angika, Bajjika, Bhojpuri, Maithili and Surjapuri among others,” rejoiced Abhay K.

The launch event featured a panel discussion and readings by Abhay K, providing insights into the significance of “Fool Bahadur” within the context of Bihari literature and its relevance in contemporary society. The panelists included noted Indian filmmaker Suraj Kumar, acclaimed writer Vandana Rag, Milee Ashwarya, Publisher – Penguin India, and journalist Aditi Chakraborty. The moderator for the session was Murtaza Ali Khan, cultural writer and critic.

“Bihar has a very rich literary tradition and Abhay K’s meticulous translation of Fool Bahadur into English gives us a rare sneak peek into the treasure trove of Bihari literature. The story of Fool Bahadur is not just compelling in a literary sense but what’s really exciting is that it also holds a great promise when seen from the point of view of cinematic storytelling,” opined Suraj Kumar.

This interactive session aimed to foster intellectual exchange and dialogue, highlighting the diversity and richness of Indian literature.

थूकने, मुतने, कंडोम छोड़कर आने की मंशा वालों पर बरपा स्वामी कोरगज्जा का कहर

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भगवान कोरगज्जा के भक्त देश में ही नहीं, विदेश में भी हैं। तीन साल पुरानी लिखी हुए एक कहानी है। जिसे भगवान के संबंध में जो नहीं जानते उनके लिए लिखी गई है।

कर्नाटक के मंगलुरू में स्वामी कोरगज्जा को लेकर स्थानीय लोगों के मन असीम आस्था है। उन्हें भगवान शिव का अवतार माना जाता है। वे एक जागृत देवता हैं। पिछले कुछ समय से कोरगज्जा मंदिर में कई अभद्र घटनाएं एक के बाद एक करके हो रहीं थीं। एक दिन मंदिर के दानपात्र में कोई कंडोम रखकर चला गया। यह वर्ष 2021, जनवरी की घटना है।

कोरगज्जा भगवान को लेकर उनमें आस्था रखने वालों का मानना है कि वे न्याय के लिए अपने भक्तों के बीच जाने जाते हैं। उनके न्यायालय में जल्दी से जल्दी न्याय होता है और दोषियों को वहां सजा जरूर मिलती है। मंदिर को लेकर ऐसी कई कथाएं प्रचलित हैं, जिसमें स्वामी कोरगज्जा को लेकर कोई अपमानजनक विचार रखने वाला व्यक्ति वापस आया और उसने अपनी भूल के लिए माफी मांगी। स्वामी के श्रद्धालुओं के लिए अब यह कोई चमत्कार नहीं है लेकिन जब कंडोम वाली घटना घटी मानो स्वामी के श्रद्धालुओं पर कोई वज्रपात हो गया हो। जांच—पड़ताल के बाद भी जब वे दोषियों तक नहीं पहुंच पाए फिर उन्होंने स्वामी कोरगज्जा से ही प्रार्थना की कि स्वामी दोषियों को सजा दें। यह अपमान उन हजारों—लाखों का श्रद्धालुओं का भी था, जिनकी आस्था स्वामी पर है।

अब सारा मामला साफ हो चुका है। वास्तव में मुस्लिम समुदाय से आने वाले कुछ युवकों ने मंदिर में दाखिल होकर ना सिर्फ दान पेटी में कंडोम डाला बल्कि वहां पेशाब भी किया। यह कोई एक बार नहीं हुआ, बल्कि कई बार हुआ। मंदिर की तरफ से इसकी शिकायत पुलिस को की गई लेकिन पुलिस भी दोषियों को तलाश नहीं पाई।

अचानक एक दिन अब्दुल रहीम और अब्दुल तौफीक नाम के दो युवक मंदिर के मुख्य पुजारी के सामने गिरगिराने लगे। वे स्वामी कोरगज्जा से माफी मांगना चाहते थे। उन्हें अपने दोस्त नवाज की मौत के बाद अपनी भूल का एहसास हो गया था। नवाज मंदिर में पेशाब करने और कंडोम का पैकेट डालने वाली घटना में अब्दुल रहीम और अब्दुल तौफिक के साथ शामिल था।

नवाज अपने अपराध के लिए स्वामी कोरगज्जा से क्षमा माँगने के लिए जीवित नहीं था। कंडोम डालने के बाद उसे खून की उल्टियाँ हुईं। उसे पेचिश हुआ। उसके मल से खून निकला। उसका अंत बेहद दर्दनाक रहा। अपराध में उसके दोनो साथी रहीम और तौफिक के अनुसार— वह अपने घर की दीवारों पर सिर पटक—पटक कर। खून की उल्टियां करते—करते मरा। मरते- मरते नवाज ने ही अपने दोस्तों को बताया कि स्वामी कोरगज्जा के दरबार में उनसे जाकर माफी मांग ले। स्वामी उनसे बहुत नाराज हैं।

नवाज की हालत देखने के बाद दोनों अपनी जान जाने के डर से घबरा गए और ईश्वर की शरण में जीवन की भीख माँगने लगे। मंदिर के पुजारी के सामने दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। पुलिस को अभी तक की जाँच में दोनों आरोपियों ने बताया है कि उन्होंने 03 जगह और ऐसा किया था।

जब मुस्लिम मंदिर में पूजा करने नहीं आ रहा है। देवी की अर्चना करने नहीं आ रहा है फिर उसका मंदिर परिसर में आने का उद्देश्य क्या है? यदि वह पूजा में शामिल हो। देवी का प्रसाद ग्रहण करे। फिर किसी मंदिर को उनके प्रवेश पर प्रतिबंध क्यों लगाना होगा?

उत्तर प्रदेश में कुरआन को लेकर एक बहस प्रारम्भ हुई है।इस्लाम के मौलवियों और जानकारों को अब इस्लाम सुधार पर विचार करना चाहिए।

श्रीराम वन गए तो बन गए..

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आचार्य दीप चंद भारद्वाज

कुछ प्राप्त करने के लिए कुछ त्यागना भी अनिवार्य माना गया है। हमारे शरीर को ही ले लीजिए श्वास लेने के लिए पहले श्वास छोड़नी पड़ती है, तभी इस शरीर की आंतरिक संरचना में नवीनता तथा सक्रियता का संचार होता है। त्याग हमें सांसारिक मोह से अलग करने के साथ हमारे आध्यात्मिक व्यक्तित्व को परिपक्वता प्रदान करता है।

इस संसार की जितनी भी भौतिक संपदा, वस्तुएं एवं पदार्थ हैं वे सभी मनुष्य जीवन को सम्यक प्रकार से निर्वाह करने के लिए ही बने हैं। इस दृश्य संसार की प्रत्येक वस्तु भोग और अपवर्ग की प्राप्ति के लिए बनी है, इसीलिए मनुष्य को सभी सांसारिक भौतिक पदार्थों का त्याग की दृष्टि से उपभोग करना चाहिए। नश्वर भौतिक संपदा का निरंतर संग्रह करने की प्रवृत्ति मनुष्य को लोभ और तृष्णा के बंधन में बांध देती है। जो भी पदार्थ मनुष्य को इस संसार में प्रयोग करने के लिए मिले हैं उनका अंत भी अवश्य होना है। अर्थात एक न एक दिन उन सभी पदार्थों से हमें अवश्य अलग होना है। त्याग से मनुष्य को सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। *श्रीराम जब महल में थे तो राजा राम कहलाए और जब उन्होंने महल त्यागा तो पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम कहलाए। सिद्धार्थ गौतम ने जब त्याग के आदर्श को अपनाया तो गौतम बुद्ध के रूप में प्रतिष्ठित हुए।*

त्याग के बिना शाश्वत सुख एवं शांति की कल्पना नहीं की जा सकती। त्याग जीवन का एक अनिवार्य नियम है। त्याग के बिना आनंद का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। भौतिक सांसारिक पदार्थों के बंधन में बंधे रहना जीवन में दुखों का मूल कारण है। आनंद की अनुभूति के लिए त्याग के आदर्श को अपनाना पड़ता है। केवल मात्र भौतिक संपदाओं का संग्रह करने की प्रवृत्ति मनुष्य को आंतरिक रूप से भीरू बना देती है। इन नश्वर संपदाओं का संग्रह एक न एक दिन नंष्ट अवश्य होगा। जीवन में त्याग के आदर्श का अनुसरण मनुष्य को आंतरिक संतुष्टि एवं आनंद प्रदान करता है।

“सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय विचारों के प्रखर पुञ्ज डॉक्टर द्वय”

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

नागपुर। भारत भूमि ने अपनी कोख से समय-समय पर ऐसे – ऐसे रत्न उत्पन्न किए हैं जिन्होंने अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से समाज जीवन में एक गहरी अमिट छाप छोड़ी है। रत्नगर्भा भारत माता के ऐसे ही दो महान सपूत – एक स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और दूसरे – संविधान निर्माण की प्रारुप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर हैं। एक को भारतीय समाज आदर एवं श्रध्दा के साथ डॉक्टर जी के रूप में स्मरण करता है तो दूजे को बाबासाहब के रूप में। ये महापुरुष द्वय सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय विचारों के ऐसे प्रखर पुञ्ज हैं जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। डॉक्टर जी जहां चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को तदनुसार 1 अप्रैल 1889 को जन्मे वहीं बाबासाहेब अम्बेडकर का जन्म 14अप्रैल 1891 को हुआ। अपने कार्यों एवं विचारों से क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले इन दोनों महापुरुषों ने समाज जीवन के समक्ष अनेकानेक आदर्श सौंपे हैं।

यद्यपि डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और डॉ.अम्बेडकर के कार्य क्षेत्र अलग – अलग रहे हैं। किन्तु दोनों के विचारों एवं कार्यों में समानता दिखती है। जन्मजात राष्ट्रभक्त डॉक्टर जी ‘अखण्ड भारत’ के लिए कृतसंकल्पित थे । स्वतंत्रता आंदोलन के समय जब वे कांग्रेस में थे तो उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।कारावास की सज़ा भुगतनी पड़ी। आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के विरुद्ध भाषण देते हुए वर्ष 1921 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और एक वर्ष के कारावास की सज़ा दी गई। इसके पूर्व सन् 1917 में गांधी जी द्वारा चलाए गए ‘सत्याग्रह आन्दोलन’ दौरान भी उन्हें ‘राज्य समिति के सदस्य’ के रूप में क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने के चलते जेल जाना पड़ा था। आगे चलकर जब उन्होंने विजयादशमी की तिथि को सन् 1925 में संघ की स्थापना की। उस समय वे हिन्दू समाज को संगठित कर राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिए तैयार कर रहे थे। उन्होंने घोषणा की थी “हमारा उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता है, संघ का निर्माण इसी महान लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए हुआ है।”

उसी समय संघ की शाखा में सभी स्वयंसेवक यह प्रतिज्ञा लेते थे कि —“मैं अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए तन–मन – धन पूर्वक आजन्म और प्रामाणिकता से प्रयत्नरत रहने का संकल्प लेता हूं।”

इस प्रकार डॉक्टर जी अखण्ड भारत की संकल्पना को लेकर तपस्वी स्वयंसेवकों को तैयार कर समाज को संगठित कर रहे थे। समाज के‌ विविध क्षेत्रों में कार्य कर रहे थे। इसी प्रकार अखंड भारत को लेकर डॉ.अम्बेडकर के भी विचार सुस्पष्ट थे। वे किसी भी स्थिति में भारत विभाजन के पक्षधर नहीं थे। पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया पुस्तक में उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों को लेकर सविस्तार लिखा है। मुस्लिम मानसिकता और इस्लामिक ब्रदरहुड पर कटुसत्य उद्धाटित किया है।साथ ही विभाजन को लेकर उन्होंने जहां – जिन्ना को लताड़ा वहीं विभाजन पर कांग्रेस सहित गांधी और नेहरू को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने भारत विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार करने को स्पष्ट रूप से कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण बताया था। डॉ. अम्बेडकर ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर तीखा प्रहार किया था। उन्होंने पाकिस्तान बन जाने के बाद जनसंख्या की अदला बदली को लेकर स्पष्ट रूप से कहा था —

“प्रत्येक हिन्दू के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि पाकिस्तान बनने के बाद हिन्दुस्थान से साम्प्रदायिकता का मामला हटेगा या नहीं, यह एक जायज प्रश्न था और इस पर विचार किया जाना जरूरी था। यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के बन जाने से हिंदुस्थान साम्प्रदायिक प्रश्न से मुक्त नहीं हो पाया।पाकिस्तान की सीमाओं की पुनर्रचना कर भले ही इसे सजातीय राज्य बना दिया गया हो लेकिन भारत को तो एक संयुक्त राज्य ही बना रहना चाहिए। हिंदुस्थान में मुसलमान सभी जगह बिखरे हुए हैं, इसलिए वे ज्यादातर कस्बों में एकत्रित होते हैं। इसलिए इनकी सीमाओं की पुनर्रचना और सजातीयता के आधार पर निर्धारण सरल नहीं है। हिंदुस्थान को सजातीय बनाने का एक ही रास्ता है कि जनसंख्या की अदला-बदली सुनिश्चित हो, जब तक यह नहीं किया जाता तब तक यह स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी, बहुसंख्यक समस्या बनी रहेगी। हिंदुस्थान में अल्पसंख्यक पहले की तरह ही बचे रहेंगें और हिंदुस्थान की राजनीति में हमेशा बाधाएं पैदा करते रहेंगे।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया संस्करण 1945, थाकेर एंड क. पृष्ठ-104)

डॉक्टर हेडगेवार और डॉ. अम्बेडकर दोनों आजीवन सामाजिक समरसता को मूर्तरूप देने में लगे रहे। डॉक्टर जी की उसी संकल्पना का सुफल है सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण संघ में सर्वत्र दिखता है। संघ में कभी भी किसी भी स्वयंसेवक से जाति- धर्म नहीं पूछा जाता है। संघ का स्वयंसेवक केवल स्वयंसेवक होता है। सभी एक पंक्ति में एक साथ बैठकर भोजन करते हैं – साथ रहते हैं और संघ कार्य में जुटे रहते हैं। इसी सम्बन्ध में 1 मार्च 2024 को डॉक्टर जी की जीवनी ‘मैन ऑफ द मिलेनिया: डॉ. हेडगेवार’ के विमोचन के अवसर पर संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने अपने उद्बोधन के दौरान कहा — “संघ ने पहले दिन से जाति, अस्पृश्यता के बारे में कभी सोचा तक नहीं। इतना ही नहीं, डॉक्टर हेडगेवार जी ने सामाजिक समरसता के लिए डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर के साथ पुणे में चर्चा-संवाद किया। बाद में बाबासाहब संघ के कार्यक्रम में आए। साळुके जी ने उस बातचीत को अपनी डायरी में रिकॉर्ड किया है। उस पर पुस्तक भी छपी है।”

प्रायः विभाजनकारी कलुषित मानसिकता के लोग संघ के विषय में अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं।किन्तु संघ वीतरागी भाव से राष्ट्रोत्थान में लगा रहता है। संघ के स्वयंसेवकों द्वारा प्रतिदिन गाए जाने वाले एकात्मता स्त्रोत में भी महापुरुषों के पुण्यस्मरण में “ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः” के रूप में बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर का स्मरण किया जाता है। यह अपने आप में कलुषित मानसिकता को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त है। जो – ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। ; के इस भाव का द्योतक है। यहां यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि – बाबासाहेब अम्बेडकर – कांग्रेस, महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित अन्य समकालीन नेताओं की खूब आलोचना एवं कटु भर्त्सना भी करते थे। किन्तु एक भी ऐसा प्रसंग नहीं आता है जब उन्होंने ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की आलोचना की हो।

इसी सन्दर्भ में पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ चिंतक विचारक रमेश पतंगे डॉ.अम्बेडकर और डॉ. हेडगेवार के सामाजिक समरसता के लिए किए कार्यों के अन्तर्सम्बन्धों पर महत्वपूर्ण विचार रखते हैं‌ । उनके अनुसार — “डॉ. अम्बेडकर का लक्ष्य था हिंदू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, छुआछूत, जाति-पाति आदि बुराइयों को खत्म करना। इन बुराइयों को खत्म किए बिना देश बड़ा नहीं हो सकता और समाज शक्तिशाली भी नहीं हो सकता। उन्होंने धार्मिक सुधार एवं सामाजिक सुधार के जरिए समता प्राप्त करने के लिए आजीवन संघर्ष किया। नागरिकों की स्वतंत्रता एवं समता पर उन्होंने अधिक बल दिया। हमारा संविधान हमें यह अधिकार देता है। लेकिन केवल कानून बनाने से ऐसा होना संभव नहीं है। यह समाज में स्वाभाविक रूप से आनी चाहिए। इसके लिए सभी में बंधुत्व की भावना आनी चाहिए। यह सब डॉ. अम्बेडकर ने कहा, लेकिन कैसे आनी चाहिए इसका चिंतन, विचार, क्रिया उन्होंने नहीं बताई। मेरे अध्ययन व आंकलन के अनुसार – सामाजिक समरसता का सिद्धांत डॉ.अम्बेडकर ने दिया और डॉ. हेडगेवार ने उसे यथार्थ में कर दिखाया। इसमें दोनों की एक दूसरे से तुलना नहीं करनी चाहिए और न ही उनमें समानता की बात करनी चाहिए। दोनों का कार्यक्षेत्र अलग था।अपने–अपने कार्यों के आधार पर दोनों ही महापुरूष हैं। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक ऐसा तंत्र शाखा के माध्यम से स्थापित किया है कि ऑपरेशन भी हो जाता है, जख्म भी भर जाता, जख्म के निशान तक दिखाई नहीं देते और मरीज को पता भी नहीं चलता है। उक्त सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए अनेक महापुरूषों ने बड़ा संघर्ष व प्रयत्न किया। बावजूद इसमें वे शत-प्रतिशत सफल नहीं हुए। लेकिन दूरद्रष्टा डॉ. हेडगेवार ने सहजता से परिवर्तन कर दिया और समाज व देश के लिए वे आदर्श बने। इसलिए संघ में कहीं भी जाति-पाति, छूआछूत और अस्पृश्यता नहीं है।”

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