22 जनवरी 2024 को जलेंगे ,11 दीपक हर घर

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डॉ. शोभा विजेन्द्र
आज मीरा की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था, जैसे ही उसने आज का अखबार खोला तो देखा कि 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीरामलला का प्राण प्रतिष्ठा समारोह होने जा रहा है। अरे! यह तो अद्भुत है। जब से मीरा ने होश संभाला तब से ही लगातार वह  रामजन्म भूमि के विषय में सुनती आई हैं और हमेशा से ही इस विषय को लेकर अचम्भित और क्रोधित रही है कि भगवान श्रीरामलला के मन्दिर के कपाट क्यों बंद रहे? इसके पीछे किन लोगों का स्वार्थ रहा? अयोध्या में श्रीराम के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगाकर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही थी। यह तो किसी को भी स्वीकार न था।
जैसे-जैसे समझ विकसित हुई वैसे-वैसे यह इच्छा बलवती हुई कि अयोध्या में अवश्य ही श्रीरामजन्म भूमि क्षेत्र एक तीर्थ के रूप में विकसित होना चाहिए जहाँ पर न केवल हिन्दू बल्कि सभी धर्मों के लोगों को भगवान राम के न केवल दर्शन हों बल्कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम के आदर्शों का हृदय में निवास हों किन्तु श्रीराम जन्मभूमि तो  विवादित स्थल है,मीरा जैसे करोड़ो भक्तों के लिए यह आत्मसम्मान का प्रश्न था। और तभी मोदी सरकार आ गई I और राम भक्तों की सरकार आने के साथ ही यह स्वप्न सच हो गया।
500 साल से लगातार राम भक्तों ने अपने इष्ट देवता के भव्य मंदिर निर्माण के लिए संघर्ष किया। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जहाँ इस भव्य मन्दिर का निर्माण हुआ है वह भगवान श्रीराम का जन्म स्थान है। 05 अगस्त 2020 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा भूमि पूजन का कार्य संपन्न हुआ था और मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ था।
 मीरा अभी कुछ सोच ही रही थी कि कहीं मन में यह भाव आया कि यह 500 वर्षों का इतिहास भी सभी को बताना चाहिए। 15वीं शताब्दी में मुगलों ने हिन्दू मंदिर को खंडित कर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया। 1850 के दशक में इसको लेकर यह विवाद हिंसक रूप में सामने आया और तब से लेकर न जाने कितने रामभक्तों ने इस के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए।
दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। कानूनी लड़ाई भी कम पेचीदा नहीं थी। 2019 में इस विवाद पर उच्चतम न्यायालय ने निर्णय लिया और इस भूमि को सरकार द्वारा घटित श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंप दिया।
अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 जनवरी 2024 को श्री राम जन्मभूमि मन्दिर मेंं भगवान श्री रामलला के श्री विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा करेंगे। प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर देश के 4,000 संत-महात्मा एवं समाज के 2,500 प्रतिष्ठित महानुभाव उपस्थित रहेंगे। मीरा के मन में आत्म संतुष्टि के अनेकों भाव आ- जा रहे थे। तभी उसे पता चला कि सम्पूर्णा संस्था द्वारा दिल्ली को अयोध्या बनाने का कार्य सम्पूर्णा संस्था दिल्लीवासियों के साथ कर रही है। संस्था दिल्लीभर में 1 करोड़ 11 हजार दीपक प्रज्जवलित करने जा रही है। उससे पूर्व जगह-जगह राम गोष्ठियां, राम कवि सम्मेलन एवं राम चित्रकला प्रतियोगिता भी आयोजित की जा रही हैं। मीरा ने सम्पूर्णा की कार्यकारी अध्यक्षा आशा जैन जी से संपर्क किया। योजना को समझ कर 22 जनवरी 2024 को तन-मन-धन से समर्पण की बात की। तभी कार्यकारी अध्यक्षा आशा जी ने बताया कि सम्पूर्णा ने भी गत् वर्षों में अयोध्या में भव्य राम मन्दिर बनें और उसमें रामलला विराजमान हों, ने भी अपना भगीरथी प्रयास किया है।
ज्ञात रहे कि जब राम मंदिर का मामला उच्चतम न्यायालय में लम्बित था। कांग्रेस पार्टी और उसके नेता कपिल सिब्बल द्वारा लगातार यह कोशिश की जा रही थी कि राम मंदिर को लेकर कोई फैसला न आए। उस समय सम्पूर्णा के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली के कोने-कोने में जाकर राम मन्दिर को लेकर कांग्रेस पार्टी के इस कुकृत्य को सबको अवगत कराया था।
सम्पूर्णा से जुड़े कार्यकर्ताओं, विशेषतः बहनों ने हर आम और खास व्यक्ति को एकत्र कर समझाया था कि राम मंदिर करोड़ों रामभक्तों की आस्था से जुड़ा मामला है और कांग्रेस पार्टी प्रत्यक्ष रुप से राम भक्तों को चुनौती दे रही है। संस्था ने अयोध्या में राम मन्दिर के निर्माण हेतु 08 दिसम्बर, 2018 को दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, श्री चम्पत राय जी पहुंचे थे। संस्था आपको हृदय सुमन भेंट करती है कि यह सब कुछ राष्ट्र और उत्तर प्रदेश में राम भक्तों की सरकार बनने के कारण हुआ।
सम्पूर्णा द्वारा 04 फरवरी 2020 को अपने केंद्र, रोहिणी में श्रीराम मंदिर स्थापित कर सैकड़ों लोगों द्वारा प्रतिदिन राम लला की आरती की गई और अयोध्या में श्रीराम मन्दिर के पुनः भव्य निर्माण के लिए धन संग्रह किया गया। 14 फरवरी 2020 को विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी को कृतज्ञता के भाव से धनराशि समर्पित की गई।
आशा जी ने बताया कि हिंदू, मुसलमान, सिक्ख, बौद्ध या पारसी, गरीब, अमीर, कोठी में रहने वाले या सड़क पर सोने वाले सबसे सादरपूर्वक अनुरोध करेंगे कि कण-कण में बसने वाले राष्ट्र पुरूष हमारे अराध्य भगवान रामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह पर दीपावली मनाएँ। हमने संकल्प लिया है कि 1 करोड़ 11 हजार दीपक जलाकर इस अनुपम, अद्वितीय और एतिहासिक दिन के साक्षी बनेंगे।

‘मैपिंग ऑफ द आर्काइव्स इन इंडिया’ पुस्तक पर चर्चा का आयोजन

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अतीत को पुनर्जीवित करने में अभिलेखागारों की महत्त्वपूर्ण भूमिकाः पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कला निधि प्रभाग द्वारा 23 नवंबर 2023, गुरुवार को प्रो. (डॉ.) रमेश गौड़ और और विस्मय बसु की पुस्तक ‘मैपिंग ऑफ द आर्काइव्स इन इंडिया’ पुस्तक पर केंद्र के समवेत ऑडिटोरियम में एक चर्चा का आयोजन किया गया। पुस्तक चर्चा में आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय, सेवानिवृत्त केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री सत्यानंद मिश्रा, संचार एवं सूचना सलाहकार (यूनेस्को, दक्षिण-एशिया, नई दिल्ली) हेज़ेकील दलामिनी, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, आईजीएनसीए के कलानिधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश गौड़ और राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली के उप निदेशक डॉ संजय गर्ग उपस्थित थे। इस अवसर पर विवरणात्मक ई-कैटलॉग ‘आगम-तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र, खण्ड-3, भाग 1-5’ का लोकार्पण भी किया गया।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने सम्मानित अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया और आईजीएनसीए और यूनेस्को द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित ‘मैपिंग ऑफ द आर्काइव्स इन इंडिया’ तथा ‘आगम-तंत्र-मंत्र-यंत्र, खण्ड-3, भाग 1-5’ के विवरणात्मक ई-कैटलॉग के प्रकाशन पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि परियोजना 2018 में शुरू हुई, लेकिन औपचारिक रूप से इसका काम 2019 में प्रारम्भ हुआ। हालांकि वैश्विक महामारी कोविड कारण इसका काम थोड़ा धीमा भी हुआ। व्यापक साहित्य सर्वेक्षणों के माध्यम से, उन्होंने देश भर में 600 संस्थानों में अभिलेखागारों को चिह्नित किया, जिसके परिणामस्वरूप पुस्तक में 424 डायरेक्ट्री बनाई गईं। इन डायरेक्ट्री में निहित पुरालेखों की व्यापक प्रोफाइल शामिल है और ये उनके संरक्षण, डिजिटलीकरण और अभिलेखीय परिप्रेक्ष्य के पहलुओं पर प्रकाश डालती है। प्रो. गौड़ ने भारत में पुरालेख विज्ञान शिक्षा की सख्त आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि ये पुरालेख हमारी विरासत को संजोये हुए हैं, इन्हें सुरक्षित रखा जाना चाहिए। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले की प्राचीर से ‘पंच प्रण’ का उल्लेख किया था, उसका हवाला देते हुए प्रो. गौड़ ने विरासत को संरक्षित करने के महत्त्व को रेखांकित किया।

 


राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली के उप निदेशक डॉ. संजय गर्ग ने अपने संबोधन में देश में अभिलेखागारों के ऐतिहासिक महत्त्व पर जोर दिया और इन अभिलेखागारों के मानचित्रण में निरंतर हो रहे प्रयासों की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने धार्मिक व शैक्षिक संस्थानों और रियासतों, राज्य अभिलेखागारों और कॉर्पोरेट अभिलेखागारों द्वारा निभाई गई महत्त्वपूर्ण भूमिका का हवाला देते हुए अभिलेखागारों के बारे में विस्तार से बताया। डॉ. गर्ग ने बैंकों, न्यायिक प्रतिष्ठानों और संरक्षक प्रतिष्ठानों में अभिलेखागार की उपस्थिति पर जोर दिया। उन्होंने आगे कहा कि उचित संरक्षण तंत्र के अभाव में इस विशाल विरासत के लुप्त हो जाने का खतरा है। उन्होंने ‘मैपिंग ऑफ द आर्काइव्स इन इंडिया’ पुस्तक की सराहना करते हुए इसे देश की विरासत को सुरक्षित रखने का एक अद्भुत प्रयास बताया।

आईजीएनसीए सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कोविड महामारी से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद, इन प्रकाशनों को सफलतापूर्वक सामने लाने पर संतोष और गर्व व्यक्त किया और इस उपलब्धि का श्रेय इसमें शामिल टीम के अटूट प्रयासों को दिया। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान समाज इस बारे में चर्चा कर रहा था कि सिनेमाहॉल फिर से कब खुलेंगे, मॉल कब खुलेंगे, लेकिन लोगों को इस बात की चिंता नहीं थी कि संग्रहालय, पुस्तकालय और अभिलेखागार कब खुलेंगे! उन्होंने पुरालेख विज्ञान के प्रति रुझान की कमी पर अफसोस जताया। उन्होंने छात्रों और जनता के बीच अधिक जागरूकता की आवश्यकता पर बल देते हुए आर्काइविंग विज्ञान के विकास की वकालत की। उन्होंने महाभारत, रामायण और भगवद्गीता जैसे अमूल्य ग्रंथों को संरक्षित करने में पुरालेखाकारों की भूमिका को स्वीकार करते हुए, इस क्षेत्र के पेशेवरों की सराहना और समर्थन का आग्रह भी किया।

संचार एवं सूचना सलाहकार (यूनेस्को, दक्षिण-एशिया, नई दिल्ली) हेज़ेकील दलामिनी ने अपने उद्बोधन के दौरान, सामूहिक मिशन में युनेस्को और आईजीएनसीए की निरंतर साझेदारी पर खुशी व्यक्त की। अभिलेखागार के ऐतिहासिक महत्त्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि कैसे अभिलेखागार ज्ञान और संस्कृति इतिहास का आधार बनते हैं। श्री दलामिनी ने यह भी कहा कि अभिलेखागार ज्ञान के भंडार के रूप में काम करते हैं और यूनेस्को भारत के संस्थागत और विशिष्ट आर्काइविंग कार्यक्रमों में गहरी रुचि रखता है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री सत्यानंद मिश्रा ने अभिलेखों के संरक्षण और समर्थन के महत्त्व पर जोर देते हुए कहा, “अभिलेखीय सामग्री का उपयोग करते हुए इतिहास का लेखन अतीत को जीवंत बनाता है।” उन्होंने इस पुस्तक की एक प्रासंगिक पहल के रूप में सराहना की। मिश्रा ने अतीत को पुनर्जीवित करने में अभिलेखीय सामग्रियों के उपयोग के गहन प्रभाव पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने प्रो. (डॉ.) रमेश गौड़ को बधाई देते हुए कहा कि उन्होंने बहुत ही सराहनीय  कार्य किया हैं। इस किताब में बहुत-सी अच्छी सूचनाएं हैं, इसको पढ़ना चाहिए। श्री रामबहादुर राय ने आगे कहा कि  पुस्तकालयों और अभिलेखागारों को सर्वसुलभ बनाये जाने की आवश्यकता है, ताकि नई पीढ़ी उसका रचनात्मक उपयोग कर सके। उन्होंने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि क्या संग्रहालयों से सूचना प्राप्त कर पाना शोधार्थीयों के लिए सुलभ है? क्या लोगों को आसानी से सूचनाएं उपलब्ध हो पा रही हैं? उन्होंने कहा कि इस सम्बंध में एक आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है।

हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिबंध एक अनिवार्य और उचित कार्यवाही संपूर्ण भारत में लगे प्रतिबंध

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सनातन हिंदू समाज की आस्था की रक्षा करने के लिए एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए प्रदेश में हलाल प्रमाणित उत्पादों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इसके बाद  से ही प्रदेश की खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की टीमें व एटीएस सक्रिय हो गई हैं, पूरे प्रदेश में छापामारी चल रही है और भारी मात्रा में अवैध रूप से प्रमाणित हलाल उत्पादों की जब्ती भी की जा चुकी है जिसके कारण अवैध रूप से हलाल प्रमाणन का गोरख धंधा करने वाले गिरोहों व संगठनों में खलबली मच गयी है वहीं समाजवादी पार्टी, बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस सहित सभी विरोधी दल इसे मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को धार देने के लिए प्रयोग करते दिख रहे हैं  ।
एक अनुमान के अनुसार अवैध रूप से चल रहा हलाल प्रमाणन का गोरखधंधा लगभग 3000 करोड़ से अधिक का है और इस धन का दुरुपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों व आतंकवादी संगठनों की मदद करने के लिए किया जा रहा  है। हलाल प्रमाणन का धंधा केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत में चल रहा है और इस धंधे का भारत में आगमन 1974 में एक घृणित साजिश के तहत हुआ था। हलाल प्रमाणन की प्रक्रिया एक देश दो विधानवाली तथा संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
प्रदेश सरकार ने हलाल प्रमाणन के  इस अवैध धंधे को पूरी तरह से रोकने के लिए लखनऊ की हजरतगंज कोतवाली में शैलेंद्र कुमार शर्मा की शिकायत पर विभिन्न संगठनों पर एक एफआईआर दर्ज कवाई है, जिनमें   हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिंद हलाल ट्रस्ट दिल्ली व लखनऊ, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुंबई और कुछ अन्य कंपनियां शामिल हैं।
भारत से बड़ी मात्रा में खााद्य उत्पादों का निर्यात सिंगापुर, मलेशिया, सऊदी अरब, कतर आदि खाड़ी देशों और कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में होता है जहां बड़ी संख्या में इस्लामिक आबादी है। ऐसे में देश की अधिकांश कंपनियां अपने उत्पादों के लिए हलाल सार्टिफिकेशन करवाती हैं। दुर्भाग्यवश भारत में हलाल प्रमाणन के लिए कोई सरकारी कंपनी नहीं है जिसके कारण यह ठग कंपनियां अनुचित व अवैध धंधा करने में कामयाब हो रही हैं। ये अकूत धन कमा रही हैं और उसे देश के विरुद्ध इस्तेमाल कर रही हैं । इन कंपनियों के सम्बन्ध अलग अलग आतंकवादी संगठनों से होने की आशंका है।
उत्तर प्रदेश में  हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिंबध से इस बेहद गम्भीर व खतरनाक विषय पर राष्ट्रव्यापी बहस आरम्भ हो गयी है। हलाल उत्पादों पर प्रतिबन्ध का समर्थन करने वाले लोग कह रहे हैं कि इस अवैध धंधे पर संपूर्ण भारत में प्रतिबंध लगना चाहिए। यह बात सही भी है कि हलाल उत्पादों पर प्रतिबंध तभी प्रभावी होगा जब देश के सभी राज्यों में इस पर प्रतिबंध लगाया जाए और प्रमाणन पर एक कड़ा कानून बनाते हुए निर्यात की दृष्टि से प्रमाणन का यह कार्य किसी राष्ट्रीय संस्थान को दिया जाये।
हलाल का समर्थन करने वाले लोग संविधान की बार- बार दुहाई दे रहे हैं किंतु शायद इन  लोगों को यह नहीं पता कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत सरकार का अपना भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसआई) है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यूपी सरकार के कदमों का समर्थन करते हुए कहा कि सरकारी एजेंसियों को ही यह पता लगाना चाहिए कि खाद्य उत्पादों में किस तरह के रासायनिक संयोजक, कृत्रिम व हानिकारक तत्व मौजूद हैं।उन्होंने कहा कि सरकारी निकायों को यह प्रमाणित करने का अधिकार होना चाहिए कि लोगों के उपयोग के लिए कौन सा भोजन गुणवत्तापूर्ण है।
अवैध हलाल प्रमाणन के खिलाफ हो रही कार्यवाही का विरोध करने वाले बहसों के दौरान इस अवैध कृत्य को संवैधानिक बता रहे हैं, दावा कर रहे हैं कि हम जीएसटी दे रहे हैं और इनका मानना है कि हलाल प्रमाणित उत्पादों पर कार्यवाही करने से महंगाई बढ़ सकती है, बेरोजगारी बढ़ सकती है,  बाजारों में खाद्य उत्पादों का संकट पैदा हो सकता है आदि -आदि । हलाल प्रामणित उत्पादों के पक्ष में यह भी दलील दी जा रही है कि यह मुस्लिम समाज के लिए धर्म व आस्था का विषय है।अगर यह मान भी लिया जाये कि हलाल प्रमाणन मुस्लिम समाज के लिए धर्म व आस्था का विषय है तो हिंदू समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जो व्रत व उपवास के अवसर पर पूर्णरूप से शाकाहारी रहता है उसको  हलाल प्रमाणन वाले खाद्य पदार्थ बेचकर उसकी आस्था पर क्यों चोट पहुंचाई जा रही है?
विभिन्न उत्पादों के हलाल प्रमाणन के गोरखधंधे में शामिल लोग धर्म – संविधान जैसे  गलत तथ्यों की आड़ में कुतर्क कर रहे हैं, सनातन हिंदू सहित सिख, जैन, बौद्ध आदि विभिन्न मतावलंबियों की आस्था विश्वास और मान्यता से कोई सरोकार नहीं है । इन लोगों को  केवल मजहब विशेष की ही आस्था दिखती है। हिंदू नवरात्र, हरितालिका , छठ, करवा चौथ जैसे पर्वों के अतिरिक्त नियमित व्रत जैसे सप्ताह के कोई एक दिन या कोई तिथि जैसे एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा आदि  उपवास करते हैं और इन्हें हलाल प्रमाणित सेंधा नमक मिलता है। दूध व दुग्ध उत्पादों के पैकेटों पर हलाल लिखा जाने लगा है। साबुन शैम्पू तक का हलाल प्रमाणन हो रहा है ।
वास्तव में हलाल के दायरे में केवल मांसाहार आता है, हलाल मांस के लिए पशुवध की विशेष पीड़ादायक प्रक्रिया है  किंतु प्रमाणन का धंधा करने वाले लोगों ने धीरे- धीरे सौंदर्य प्रसाधन सामग्री और दवाएं भी शामिल कर लीं  जिनमें पशु रक्त, चर्बी, मांस, अल्कोहल आदि का उपयोग होता है। फिर लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते हुए हलाल उत्पादों का दायरा शाकाहारी उत्पादों तक फैला दिया गया और दाल, चावल, आटा, मैदा, शहद, चायपत्ती, बिस्किट, मसाले, साबुन, टूथपेस्ट उत्पाद भी इसमें शामिल कर लिए गये। अब बस हवा, पानी को ही हलाल और हराम घोषित करना शेष रह गया है।उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में तो हद ही हो गयी है क्योंकि यहां पर तुलसी अर्क, धनिया पाउडर, एलोवेरा जूस और आईड्राप  पैकिंग पर भी हलाल प्रिंट उत्पाद खूब बिक रहे हैं।
शिकायत कर्ता शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि तुलसी जी हिंदू धर्म में माता के रूप में पूज्य हैं। अर्क की पैकिंग पर हलाल लिखा है इससे करोड़ों हिन्दुओं की आस्था पर चोट पहुंची हैं। आज विभिन्न चैनलों पर चल रही बहस के दौरान हलाल समर्थकों से सवाल पूछा जा रहा है कि आप लोग दूध, दाल, चावल सहित विभिन्न शाकाहारी वस्तुओं को हलाल कैसे करते हैं उसकी विधा क्या है तब उन लोगों के पास कोई जवाब नहीं रहता है।
निजी संगठनों द्वारा अवैध हलाल प्रमाणपत्र बांटना पूरी तरह से गैरकानूनी और अवैध है। कर्नाटक विधानसभा में भी हलाल पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए एक निजी विधेयक आया था किंतु वह पास न हो सका। सुप्रीम कोर्ट में वर्ष 2020 से हलाल प्रमाणपत्र के खिलाफ एक याचिका विचाराधीन है जिसमें कहा गया है कि देश के 15 फीसदी लोगों के लिए 85 फीसदी आबादी को उनकी इच्छा के विरुद्ध हलाल प्रमाणित वस्तुओं के इस्तेमाल के लिए मजबूर किया जा रहा है अतः इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। वंदे भारत एक्सप्रेस में पवित्र श्रावण  माह एक यात्री को हलाल प्रमाणित चाय देने पर उसके विरोध का वीडिओ वायरल हो चुका है।
प्रदेश सरकार ने हलाल सार्टिफिकेशन देने वाली कंपनियों के लिए पंजीकरण अनिवार्य कर दिया है। हलाल के लिए राष्ट्रीय प्रमाणन निकाय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीसीबी) से मान्यता लेना अनिवार्य है। डीजीएफटी के निर्देशों के अनुसार मीट को हलाल  सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही उसके उत्पादक को निर्यात करने की अनुमति दी जाती है किंतु अभी तक यह कंपनियां किसी भी नियम का पालन ही नहीं कर रही थी जबकि हलाल समर्थक प्रवक्ता बड़ी ही बेशर्मी से हलाल प्रमाणन को वैध धंघा बता रहे हैं। यहां पर यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि दूध व उससे बने सभी उत्पादों को हलाल कैसे किया जाता है। आटा, दाल, चावल आदि को हलाल कैसे किया जा सकता है।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि जिन चीजों का इस्लाम से कोई सम्बंध नहीं है उनका कारोबारी इस्लामीकरण हो रहा है। उन्होंने बिहार में भी हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।  उत्तर प्रदेश सरकार ने हलाल प्रमाणित उत्पादों पर प्रतिबंध लगाकर सनातन हिंदू समाज की आस्था व संस्कृति को बचाने के लिए एक अत्यंत सराहनीय कार्य किया है और इस विषय पर हर हिंदू समाज के घर -घर में जागरूक गृहणियों ने उपयोग में आने वाले उत्पादों के पैकेट की जांच प्रारम्भ कर दी है कि कहीं उसमें हलाल तो नहीं लिखा है।यह जनजागरण का एक बड़ा महत्वपूर्ण विषय है जिसके माध्यम से मुसिलम संगठनों के नापाक मंसूबो को ध्वास्त किया जा सकता है।
हलाल एक अरबी शब्द है जो ऐसी प्रक्रिया को इंगित करता है  जिसमें पशु का वध धीरे -धीरे अत्यंत पीड़ा देकर किया जाता है। इसका अर्थ होता है कानून सम्मत या जिसकी इजाजत शरिया कानून में दी गई है। ये शब्द खाने- पीने की मांसाहारी चीजों, कॉस्मेटिक्स, दवाइयों आदि पर लागू होता है। भारत देश का  अपना एक संविधान है जो पशु संरक्षण भी करता है। भारत में हलाल प्रक्रिया अवैध है क्योंकि यहां पर शरीया कानून नहीं लागू है। अगर हिंदू समाज हलाल प्रमाणित उत्पादों का संपूर्ण बहिष्कार करना प्रारम्भ कर दे तो लाखों की संख्या में हमारा जो गोवंश काटा जा रहा है वह सुरक्षित हो जाएगा। हलाल का समर्थन करने वाले लोग हिंदू सनातन विरोधी  और आतंकवाद का समर्थन करने वाले लोग हैं और यही लोग अभी हमास का समर्थन करते हुए भी दिखाई पड़ रहे थे। अतः हिंदू समाज जागृत होकर अपनी रसोई में अगर हलाल प्रमाणित पैकेट रखा हो तो उसे बाहर फेंक दे और अगला पैकेट वही ख़रीदे जिस पर हलाल प्रमाणित न लिखा हो।

डीपफेक’ से निपटने के लिए नए नियम लाएंगे: अश्वनी वैष्णव

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डीपफेक के मुद्दे पर एक एहम बैठक में, जिसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और कई मशहूर हस्तियों ने हरी झंडी दिखाई है, यह फैसला लिया गया है कि सरकार और IT क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां इसका पता लगाने, रोकथाम और प्रमोशन पर विस्तृत दिशानिर्देश लाएंगी। गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में IT मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने कहा कि डीपफेक लोकतंत्र के लिए एक नया खतरा बनकर उभरा है और सरकार इसके लिए नियम लाने पर भी विचार कर रही है।

पिछले कुछ दिनों से डीपफेक सुर्खियों में बना हुआ हैं। रश्मिका मंडाना, कैटरिना कैफ, काजोल, सारा तैंडुलकर, शुभमन गिल, से लेकर कई बॉलीवुड सेसेब्स इस डीपफेक का शिकार बन चुके हैं।

‘डीपफेक’ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल करते हुए किसी तस्वीर या विडियो में मौजूद व्यक्ति की जगह किसी दूसरे को दिखा दिया जाता है। इसमें इतनी समानता होती है कि असली और नकली में अंतर करना काफी मुश्किल होता है। आईटी मंत्रालय ने 20 नवंबर को भारत में 50 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ताओं वाली सभी सोशल मीडिया कंपनियों को नवंबर में एक बैठक में भाग लेने के लिए कहा, इसके दो दिन बाद आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि उनका मंत्रालय उन्हें डीपफेक के बारे में विचार-मंथन करने के लिए बुलाएगा।

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