सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चल रहे न्यूज चैनल्स को अब यूं होगा फायदा

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न्यूज वेब चैनल्स को सूची में सम्मिलित करने के लिए पंजाब सरकार ‘द पंजाब न्यूज वेब चैनल पॉलिसी 2021’ लेकर आयी है।

मीडिया खबर के मुताबिक, पंजाब सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि यह समय की मांग है कि पंजाब सरकार की नीतियों के प्रचार के लिए आज के युग के इन मंचों का सही तरीके से प्रयोग किया जाए।

यह भी प्रवक्ता ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स फेसबुक और यूट्यूब पर चल रहे न्यूज चैनल्स को इस नीति के अंतर्गत कवर किया जाएगा।

इन शर्तो पर मिलेंगे सरकारी विज्ञापन

नीति की अन्य शर्तों और नियमों के अलावा पंजाब आधारित न्यूज चैनल जिनमें मुख्य तौर पर 70 प्रतिशत खबरें पंजाब से संबंधित होती हैं, को सूची में सम्मिलित करने पर विचार किया जाएगा। इस नीति के अंतर्गत सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा सूचीबद्ध किए जाने वाले चैनल सिर्फ राजनैतिक इंटरव्यू या खबरों, डेली न्यूज बुलेटिन, बहस या चर्चा विशेषकर संपादकीय इंटरव्यू और पंजाब संबंधी खबरों के दौरान ही सरकारी विज्ञापन प्रदर्शित करेंगे।

मालूम हो कि पंजाब सरकार के पास अखबार, सैटेलाइट टीवी चैनल्स, रेडियो चैनल्स और वेबसाइट्स के लिए एक विज्ञापन नीति पहले से ही मौजूद है। यह नई नीति मौजूदा प्रचलन और फेसबुक और यूट्यूब चैनल्स की व्यापक उपलब्धता के मद्देनजर लाई गई है। इससे राज्य सरकार को और ज्यादा लोगों तक कल्याण योजनाओं संबंधी जागरूकता फैलाने में और मदद मिलेगी।

खबर के मुताबिक, नीति संबंधी विस्तृत नियम और शर्तें सूचना एवं लोक संपर्क विभाग, पंजाब से प्राप्त की जा सकतीं है या विभाग की वेबसाइट से भी डाउनलोड की जा सकतीं है।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में पंजाब में यू-ट्यूब और वेब चैनल्स की भरमार है, जो इस वक्त पंजाब की रोजाना खबरों को कवर कर रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान पंजाब सरकार इन वेब चैनल्स के माध्यम से अपनी उपलब्धियों का प्रचार प्रसार कर सकती है।

संविधान को ढाल बनाती नक्सली अपील

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राजीव रंजन प्रसाद

नक्सल हमले के बाद बस्तर में गृहमंत्री का आवश्यक दौरा हुआ। कार्रवाई के जो निर्देश और घोषणायें हुईं उसके बाद एक नक्सल पर्चा बाहर आया है जिसमें नृशंस हत्याओं के घिसे पिटे जस्टीफिकेशन के अतिरिक्त एक वाक्य गौर करने योग्य है। नक्सल पर्चे में लिखा है – “अमित शाह देश का गृहमंत्री होने के बावजूद बीजापुर की तेर्रेम घटना पर बदला लेने की असंवैधानिक बात कहता है।  इसका हम खण्डन करते हैं। यह उनकी बौखलाहट है और यह उनकी फासीवादी प्रवृत्ति को ही जाहिर कर रहे हैं”। बाकी पर्चे में क्या है उसे परे कीजिये इन पंक्तियों में बहुत कुछ ऐसा है जिसपर बात आवश्यक है। नक्सलियों ने तीन शब्द प्रयोग में लाये हैं पहला देश, दूसरा संविधान और तीसरा फासीवाद। क्रूर और नृशंस हत्यारे    “फासीवाद” शब्द को एसे उछालते हैं मानो वे अहिंसा की प्रतिमूर्ति हैं। बस्तर अंचल में जवानों की हत्या का जो सिलसिला है वह तो जारी है लेकिन रोज रोज मुखबिरी के नाम पर की जाने वाली ग्रामीण आदिवासियों की हत्या को फासीवाद नहीं कहते तो क्या इसे माक्सवाद-लेनिनवाद जैसे अलंकार मिले हुए है? खैर वामपंथी शब्दावली पर चर्चा मेरा उद्देश्य नहीं वे सिगरेट के छल्लों की तरह गोल गोल शब्द गढते हैं जिनके अर्थ हवा में मिल कर बदबू-बीमारी ही फैलाते हैं सार्थकता तो उनमें क्या खाक होगी। 

अब नक्सल पर्चे के दूसरे शब्द देश पर आते हैं। किसका है यह देश? नृशंश लाल-हत्यारों और उनके शहरी समर्थकों का? यह देश पारिभाषित होता है अपने संविधान से और उसी अनुसार चलेगा….अरे हाँ मैं तो भूल ही गया कि लाल-आतंकवादियों ने गृहमंत्री को संविधान के अनुसार चलने के लिये कहा है। उस संविधान के अनुसार जिसे लालकिले पर लाल निशाल लगाने का चेखचिल्ली सपना देखने वाले हत्यारे मानते ही नहीं? संविधान में देश के विरुद्ध युद्ध करने वालों के लिये कुछ व्यवस्थायें हैं, संविधान में उन नागरिकों को भी सांस लेने का अधिकार है जो हसिया हथैडा वाली मध्यकालीन सोच से तंग आ चुके हैं, संविधान के पास अपनी न्यायव्यवस्था और अदालते हैं वे राक्षसी जन-अदालत तंत्र से संचालित नहीं हैं और संविधान हथियार ले कर हत्या करने वालों को क्रांतिकारी किस पृष्ठ संख्या में मानता है? राज्य और केंद्र सरकार को एक पृष्ठ पर आ कर इन वैचारिक रक्तबीजों का मुकाबला करना ही होगा यही देश के संविधान से आम आदमी की अपेक्षा है। नक्सल और उनके शहरी तंत्र की शब्दावलियों की बारीक जांच कीजिये, इस बार “संविधान” शब्द का प्रयोग इसे न मानने वाले नक्सलियों ने अपनी ढाल बनाने के लिये किया है। 

न्यूजरूम में काम करने की प्रक्रिया पर मीडिया दिग्गज की राय

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तीन अप्रैल को दिल्ली के द इंपीरियल होटल में देश में टेलिविजन न्‍यूज इंडस्ट्री को आगे बढ़ाने में अपना बहुमूल्य योगदान देने वालों को सम्मानित करने के लिए ‘एक्सचेंज4मीडिया’ समूह की ओर से ‘एक्‍सचेंज4मीडिया न्‍यूज ब्रॉडकास्टिंग अवॉर्ड्स’ (enba)  2020 दिए गए। इनबा का यह 13वां एडिशन था। इस मौके पर ‘न्यूजनेक्स्ट कॉन्फ्रेंस 2021’ के तहत वर्चुअल रूप से कई पैनल डिस्कशन भी हुए। ऐसे ही एक पैनल का विषय ‘How much should algorithms control the newsrooms?’ रखा गया था।

लेखक, पत्रकार और रक्षा विशेषज्ञ अभिजीत अय्यर मित्रा, नेटवर्क18 के मैनेजिंग एडिटर (साउथ) विवेक नारायण, नेटवर्क18 के डिप्टी ग्रुप हेड (डिजिटल वीडियो) शुभजीत सेनगुप्ता और इंडिया टुडे के सीनियर एडिटर विवेक त्यागी इस पैनल डिस्कशन में शामिल हुए। इस सेशन को न्यूजएक्स के एसोसिएट एडिटर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) और भारत सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले थिंक-टैंक ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स’ (IICA) के लिए गठित मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य तरुण नांगिया ने मॉडरेट किया।

तरुण नांगिया का कहना था, ‘यह टॉपिक काफी रोचक है और मेरे दिल के काफी करीब है कि क्या न्यूज चैनल्स के लिए लाइक्स और स्टोरी की लोकप्रियता ही उसके चुनाव का आधार होना चाहिए और उन्हें उसी के साथ आगे बढ़ना चाहिए। यह विशेष रूप से ज्यादा प्रासंगिक है, क्योंकि मैंने पिछले तीन-चार सालों में देखा है कि कंटेंट की लोकप्रियता से तय होता है कि उसे चैनल्स द्वारा लिया जाए। जब हमारे जैसे पॉलिसी जर्नलिस्ट कहते हैं कि यह क्या है और यह क्यों है तो हमें दिखाया जाता है कि बॉटम लाइन किसी भी अन्य लाइन से ज्यादा महत्वपूर्ण है और मुझे लगता है कि कुछ बिंदुओं पर हम सभी को इससे सहमत होना चाहिए, जब आर्थिक माहौल अनुकूल न हो। तमाम निर्णयों पर अर्थशास्त्र भारी पड़ता है। चूंकि हम सभी कंटेंट की तरफ से हैं, हम इस बारे में स्पष्ट हो सकते हैं।’

नारायण का कहना था कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने वाली चीजों के बारे में बोलने में कुछ भी गलत नहीं है। उनका कहना था, ‘हम न्यूज के बिजनेस में हैं और यदि सोशल मीडिया से न्यूज मिल रही है तो इसमें गलत क्या है। आप बाद में यह पता कर सकते हैं कि यह गलत है या सही, लेकिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे किसी विषय को उठाने में कुछ भी गलत नहीं है।’

अभिजीत अय्यर मित्रा का एल्गोरिदम, यूट्यूब न्यूज और ओपिनियन किस तरह लोकप्रिय हो गए हैं, इस पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहना था कि मेरे लिए यह बहुत स्पष्ट है। मीडिया हाउस खुद को कैसे देखता है? क्या यह एक वैचारिक धर्मयुद्ध है या यह एक व्यवसाय है? और यहां दूसरा मुद्दा यह है कि क्या मीडिया हाउस खुद को किसी भी तरह से सामूहिक ज्ञान से श्रेष्ठ मानते हैं, क्योंकि आप जिसे न्यूज के रूप में देखते हैं, वह उस रूप में न हो, जिसे लोग न्यूज की तरह देखना चाहते हैं। यह बहस काफी पुरानी है कि न्यूज क्या होनी चाहिए और क्या नहीं होनी चाहिए। आजकल लोगों के पास तमाम विकल्प हैं। यदि लोगों को वह न्यूज पसंद नहीं है जो आप उन्हें दे रहे हैं तो वे आगे बढ़ जाएंगे और उन स्टोरीज को सुनेंगे, जिन्हें वे सुनना चाहते हैं।

न्यूजरूम को कितने एल्गोरिदम को कंट्रोल करना चाहिए, इस बारे में शुभजीत सेनगुप्ता ने कहा, ‘डिजिटल न्यूजरूम मैनेजर के रूप में यदि मैं ये कहूं कि एल्गोरिदम हमारे काम करने के तरीकों को नियंत्रित नहीं करता है, तो यह गलत होगा। अब सवाल यह है कि लंबे समय तक ऐसा चलेगा या नहीं। सवाल यह है कि आप कितना एल्गोरिदम तय करना चाहते हैं। एल्गोरिदम के अपने फायदे और नुकसान हैं। आखिरकार दिन के अंत में न्यूजरूम को ज्यादा रीडरशिप चाहिए।’

वहीं, विवेक त्यागी के अनुसार सबकुछ भरोसे और विश्वसनीयता पर निर्भर करता है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितना एल्गोरिदम या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल हो रहा है। उनका कहना है, ‘यह एक अच्छा टूल है, इससे समय की बचत होती है, लेकिन आखिर में एक मानवीय स्टोरी में विश्वसनीयता भी जुड़ी होती है। मेरा मानना है कि जहां तक ​​न्यूज की बात है, उसमें मानवीय पहलू और प्रौद्योगिकी अथवा एल्गोरिथ्म का समामेलन होना चाहिए।

जाने माने फिल्म पत्रकार मोहन अय्यर की जिंदगी कोरोना ने निगल ली

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सोमवार शाम जाने-माने फिल्म पत्रकार और पीआरओ मोहन अय्यर का निधन हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मोहन अय्यर कुछ दिनों पूर्व कोरोनावायरस (कोविड-19) की चपेट में आ गए थे। इसके बाद उन्हें न्यूमोनिया हो गया और डायबिटीज भी थी।

मुंबई के भयंदर स्थित एक हॉस्पिटल में इलाज के लिए मोहन अय्यर को भर्ती कराया गया था, जहां 29 मार्च को उन्होंने अंतिम सांस ली। 30 मार्च की सुबह उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। वह करीब 60 साल के थे। मोहन अय्यर के परिवार में पत्नी और एक बेटा है।

शुभचिंतकों ने मोहन अय्यर के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए दिवंगत आत्मा को सद्गति और शोकाकुल परिवार को साहस देने की ईश्वर से प्रार्थना की है।

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