शोध पत्रिका ‘मीडिया मीमांसा’ का विमोचन

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लोकेंद्र सिंह

‘सार्थक एजुविज़न-2021’ के चर्चा सत्र में कुलपति प्रो. केजी सुरेश, एनबीए के सदस्य सचिव डॉ. अनिल कुमार नासा और प्रवेश एवं शुल्क नियंत्रण समिति के अध्यक्ष डॉ. रविन्द्र कान्हेरे ने एमसीयू की ब्लाइंड पीयर रिव्यु शोध पत्रिका ‘मीडिया मीमांसा’ का विमोचन भी किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. अविनाश वाजपेयी, आरएफआरएफ के नोडल अधिकारी डॉ. पवन सिंह मलिक, संपादक डॉ. राखी तिवारी, सह-संपादक लोकेन्द्र सिंह, डॉ. रामदीन त्यागी, डॉ. उर्वशी परमार और मनीष वर्मा उपस्थित रहीं। 

विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका ‘मीडिया मीमांसा’ में पत्रकारिता, संचार, प्रबंधन, कंप्यूटर, विज्ञापन, जनसंपर्क एवं फ़िल्म सहित अन्य क्षेत्रों में नवोन्मेषी, समाजोपयोगी एवं गुणवत्तापूर्ण शोध पत्रों को प्रकाशित किया जाता है। कुलपति और पत्रिका के मुख्य संपादक प्रो. केजी सुरेश ने बताया, राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अपेक्षा है कि विश्वविद्यालय शोध संस्कृति को बढ़ावा दें। नये ज्ञान की रचना करें। नवोन्मेषी और लोकहित के शोध कार्यों को बढ़ावा दें। हमारा संकल्प है कि हम संचार के क्षेत्र में शोध कार्य संबंधी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आकांक्षा को पूरा करेंगे। मीडिया मीमांसा से हमने देशभर से संचार एवं शोध विशेषज्ञों को सलाहकार मंडल में शामिल किया है। इसके साथ ही शोध पत्रों के ब्लाइंड रिव्यु के लिए देशभर से विभिन्न विषयों के अध्येताओं एवं प्राध्यापकों को जोड़ा है। 

कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रे न्स फाउंडेशन शुरू कर रहा है ‘जस्टिस फॉर एवरी चाइल्डन’ अभियान

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अभियान में ब्रांड अम्‍बेसडर के रूप में शामिल हुए हिंदी फिल्‍मों के मशहूर अभिनेता और निर्देशक फरहान अख्तर

यौन शोषण और बलात्कार के शिकार बच्चों और उनके परिवारों को तय समय पर न्याय, स्वास्थ्य सहायता और पुनर्वास सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए कैलाश सत्यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन (केएससीएफ) देशव्‍यापी ‘जस्टिस फॉर एवरी चाइल्‍ड’ अभियान की शुरुआत करने जा रहा है। 21 मार्च को शुरु होने वाला यह अभियान एक वर्ष तक चलेगा। यह अभियान देश के उन 100 जिलों में चलाया जाएगा जो बाल उत्पीडन और बच्चों के बलात्कार के दृष्टिकोण से अति संवेदनशील हैं। अभियान के सरोकार और उद्देश्‍यों से लोगों को अवगत कराने के लिए हिंदी फिल्‍मों के मशहूर अभिनेता और निर्देशक फरहान अख्‍तर इस अभियान से बतौर ब्रांड अम्बेसडर शामिल हुए हैं।

इस अवसर पर फरहान अख्‍तर ने बाल यौन शोषण की भयावहता को  राष्ट्रीय आपातकाल की संज्ञा देते हुए कहा, ‘‘भारत में हर घंटे तीन बच्चों का बलात्कार होता है और पांच बच्‍चे यौन उत्‍पीड़न के शिकार होते हैं। उन्‍हें न्याय के लिए लम्‍बा संघर्ष करना पड़ता है, जो उन्‍हें जीवनभर पीड़ा देने का काम करता है। यह एक राष्ट्रीय आपातकाल है और भारत के बच्चों को हमारी मदद की आवश्यकता है। ऐसे में “जस्टिस फॉर एवरी चाइल्ड” मुहिम में कैलाश सत्यार्थी चिल्‍ड्रेन्‍स फाउंडेशन से जुड़ कर हम सब को इस लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहिए।’’

देश में बच्चों के यौन शोषण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है। बच्चों के शोषण पर रोक लगाने के खिलाफ बने कानून पॉक्सों अधिनियम के अनुसार एक निश्चित समय में जांच प्रकिया पूरी कर पीड़ितों को न्याय दिलाने का प्रावधान है। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। “जस्टिस फॉर एवरी चाइल्ड” अभियान का लक्ष्‍य बच्चों के यौन उत्पीडन के मामले में देश के उन 100 संवेदनशील जिलों में यौन अपराधों से बच्‍चों का संरक्षण (पॉक्‍सो) अधिनियम के तहत चल रहे कम से कम 5000 मामलों में बच्‍चों को तय समय में त्वरित न्‍याय दिलाना है। इस अवधि के दौरान केएससीएफ यौन शोषण और बलात्कार के पीडि़त बच्‍चों को कानूनी और स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं, पुनर्वास, शिक्षा और कौशल विकास के अवसरों की सुविधाएं प्रदान करेगा। बाल यौन शोषण के पीडि़तों और उनके परिवारों को विशेष रूप से मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य सहायता भी संगठन मुहैया कराएगा। इस दौरान केएससीएफ लोगों को “बाल मित्र” बनाने की प्रक्रिया के तहत न्यायपालिका और प्रशासनिक प्रणालियों से संबंधित हितधारकों को संवेदनशील बनाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यशालाओं का भी आयोजन करेगा।

केएससीएफ द्वारा हालिया प्रकाशित एक अध्‍ययन रिपोर्ट ‘पुलिस केस डिस्‍पोजल पैटर्न: एन इन्‍क्‍वायरी इनटू द केसेस फाइल्‍ड अंडर पॉक्‍सो एक्‍ट 2012’ के अनुसार बच्चों के यौन शोषण के पॉक्‍सो के तहत दर्ज लगभग 3000 मामले हर साल निष्पक्ष सुनवाई के लिए अदालत तक पहुंचने में विफल रहते हैं। यानी हर दिन यौन शोषण के शिकार चार बच्‍चों को न्याय से इसलिए वंचित कर दिया जाता है, क्योंकि यौन उत्पीडित होने के बावजूद पर्याप्‍त सबूत और सुराग के अभाव में पुलिस द्वारा उनके मामलों को थाने में ही बंद कर दिया जाता है। लिहाजा, ये मामले सुनवाई के लिए अदालत तक पहुंच ही नहीं पाते। रोंगटे खड़े कर देने वाले ये आंकड़े बताते हैं कि वक्‍त का तकाजा है कि बच्‍चों के लिए न्‍याय को सुनिश्चित करने के लिए ‘जस्टिस फॉर एवरी चाइल्ड’ अभियान की शुरुआत की जाए।

यौन शोषण के शिकार पीडितों और उनके परिवारवालों के दर्द औ पीड़ा को उजागर करते हुए केएससीएफ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एससी सिन्हा कहते हैं, “जब बच्‍चों के साथ यौन दुर्व्‍यवहार होता है, तो उन्‍हें न केवल शारीरिक यातना के दौर से गुजरना पड़ता है, बल्कि उन्‍हें असहनीय मानसिक आघात का भी सामना करना पड़ता है। पुलिस जांच प्रकिया के दौरान पीड़ित और उनके परिवार की पीड़ा उस समय और बढ़ जाती है, जब उन्हें बार-बार उस घटना का उल्‍लेख करना पड़ता है। न्‍याय के लिए भी उनको लंबा इंतजार करना पड़ता है। ये सारी प्रतिकूलताएं उनकी हताशा और दुश्चिंताओं को बढ़ाने का काम करती हैं और न्‍याय पाने की उनकी आकांक्षाओं को समाप्‍त कर देती हैं।”

सिन्हा ने ‘जस्टिस फॉर एवरी चाइल्ड’ अभियान के उद्देश्य को स्पष्ट करत हुए कहा कि अभियान ऐसे पीड़ित बच्‍चों को सहायता उपलब्‍ध कराएगा, ताकि उन्‍हें न केवल समय पर न्याय मिले, बल्कि उन्‍हें उचित मानसिक, पुनर्वास और शैक्षिक सहायता भी मिल सके। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सिन्‍हा कहते हैं, “कानून के मुताबिक बच्चों के यौन उत्पीडन के मामले में एक साल में अदालत में ट्रायल पूरा हो जाना चाहिए। हम एक संगठन के रूप में बाल संरक्षण के लिए सरकार और न्यायपालिका के साथ काम करना चाहते हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर बच्चे को न्याय और उसका प्राकृतिक अधिकार मिले। जिससे वह एक खुशहाल और उन्‍मुक्‍त बचपन का आनंद उठा सके।

गौरतलब है कि केएससीएफ लंबे समय से बाल यौन शोषण के खिलाफ अभियान चला रहा है। संगठन ने 2017 में नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित कैलाश सत्‍यार्थी के नेतृत्‍व में बाल यौन शोषण और ट्रैफिकिंग (दुर्व्‍यापार) के खिलाफ कन्याकुमारी से कश्मीर तक 12,000 किलोमीटर की ‘भारत यात्रा’ का भी आयोजन किया था। जिसमें बाल यौन शोषण के शिकार रहे बच्‍चे, सिविल सोसायटी संगठन, विभिन्‍न राजनीतिक दलों के नेताओं, फिल्‍मी हस्तियों, धर्मगुरुओं, जजों आदि ने भाग लिया था।

डिजिटल मीडिया को आलोचना का अधिकार : बरतनी होगी सावधानी

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डिजिटल मीडिया से जुड़े किसी भी व्यक्ति को जेल भेजने की धमकी देने से केंद्र सरकार ने इनकार किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बारे में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का कहना है कि सरकार ने कभी भी ट्विटर समेत किसी भी डिजिटल मीडिया कंपनी के कर्मचारी को जेल भेजने की धमकी नहीं दी है।

मंत्रालय का फेसबुक, वॉट्सऐप और ट्विटर आदि के कर्मचारियों के लिए जेल की सजा का प्रावधान किए जाने की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहना है कि इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म अन्य व्यवसायों की तरह भारत के कानूनों और देश के संविधान का पालन करने के लिए बाध्य हैं।

मंत्रालय के अनुसार, जैसा कि संसद में कहा गया है डिजिटल मीडिया यूजर्स सरकार, प्रधानमंत्री या किसी भी मंत्री की आलोचना कर सकते हैं। लेकिन हिंसा को बढ़ावा देना, सांप्रदायिक विभाजन और आतंकवाद के प्रसार को रोकना होगा।

उल्लेखनीय है कि सरकार ने हाल ही में ट्विटर को सैकड़ों पोस्ट, अकाउंट और हैशटैग हटाने का आदेश दिया था। सरकार का कहना था कि ये नियमों का उल्लंघन करते हैं। ट्विटर ने शुरू में पूरी तरह से इसका अनुपालन नहीं किया, लेकिन सरकार द्वारा दंडात्मक प्रावधानों का हवाला देने के बाद उसने अमल किया था। खबर के अनुसार, मंत्रालय का कहना है कि इंटरनेट मीडिया के लिए पिछले दिनों जारी गाइडलाइंस का मकसद सिर्फ इतना है कि ये प्लेटफॉर्म्स यूजर्स के लिए मजबूत शिकायत निवारण तंत्र का गठन करें। मंत्रालय के अनुसार, ‘सरकार आलोचना और असहमति का स्वागत करती है। हालांकि, आतंकी समूहों द्वारा देश के बाहर से नफरत और हिंसा फैलाने के लिए इंटरनेट मीडिया का इस्तेमाल गंभीर चिंता की बात है।’

काक के कार्टून में सेंस ऑफ ह्यूमर और कटाक्ष में गजब की ताजगी थी

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अरविंद गौड़

अपने समय के चर्चित कार्टूनिस्ट काक से आज की पीढ़ी शायद ज्यादा परिचित ना हो, पर 1983 से 1990 के थोड़ा आगे तक का एक ऐसा भी दौर था, जब ज़्यादातर पाठक अखबार हाथ में आते ही काक का कार्टून पहले देखते थे, हेडलाइन बाद में पढ़ते थे। उनकी सेंस ऑफ ह्यूमर और कटाक्ष में गजब की ताजगी थी। उनके कार्टूनों मे रोजाना की देशव्यापी राजनीतिक  हलचलों का पोस्टमार्टम दिखता था।

उनकी तीखी ‘काक’ दृष्टि वाले करारे कार्टून शुरुआत मे जनसत्ता में छपते थे। बाद में काक ने नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज प्रभाष जोशी से लेकर राजेन्द्र माथुर और सुरेन्द्र प्रताप सिंह तक उनके कायल थे।

उस समय काक स्टार थे। यह वह वक्त था, जब जनसत्ता में तेज तर्रार खोजी और खांटी पत्रकारिता की नई जमीन तैयार हो रही थी। काक के कार्टून पहले पेज पर प्रकाशित हो रहे थे। काक पहले दैनिक जागरण, धर्मयुग से लेकर दिनमान और शंकर वीकली में छप चुके थे, पर जनसत्ता में नियमित प्रकाशित बेबाक और तीक्ष्ण कार्टूनों से उन्हें देशव्यापी पहचान मिली। तभी 1985 में अचानक उन्होंने जनसत्ता छोड़ नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। कारण कुछ भी रहा हो, पर उनका जाना हमारे जैसे जनसत्ता के हजारों पाठकों के लिए पीड़ादायक था।

उन दिनों मैं थियेटर के साथ साथ फ्रीलांस पत्रकारिता करता यहां वहां भटकता रहता था। काक सेलिब्रिटी थे, वो मुझे शायद ही पहचानते हो, पर हम खफा थे, सो कुछ दिनों तक सामने दिखने पर भी पहले की तरह भागकर नमस्ते करने की कोशिश, चाहकर भी नहीं हुई। पर उनके कार्टूनों का नशा था, सो अब घर में दो अखबार आने शुरू हो गए। फिर वही रोजाना सुबह उनके कार्टूनों को देखकर ही खबरों को पढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ।

ऐसा ही कुछ दिवंगत सुथीर तैलंग के नवभारत टाइम्स से अंग्रेजी के हिन्दुस्तान टाइम्स मे जाने के बाद भी हुआ था। हिन्दुस्तान टाइम्स उनकी वजह से ही घर में आना शुरू हुआ था।

यह वह समय था जब हिंदी अखबारों में युवा कार्टूनिस्ट अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाने लगे थे। सुधीर तैलंग, इरफान, राजेन्द्र धोड़पकर से लेकर चंदर तक कार्टूनिस्टों की नई जमीन तैयार कर रहे थे। इन सबका गजब का फैन क्लब बन रहा था। राजनैतिक कार्टून्स को लोकप्रियता दिलाने में इस नई पीढ़ी का अद्भूत योगदान है।

बाद में इससे आगे की  हिंदी अखबारों की दास्तानें, विशुद्ध व्यापारीकरण, उत्थान-पतन के साथ भटकाव, बिखराव के क़िस्से है। आज इसका प्रभाव दैनिक अखबारों की खबरों से लेकर कार्टूनों तक भी दिखता है। 

खैर, अपने समय के सुप्रसिद्ध चर्चित कार्टूनिस्ट काक आज 81 के हो गए। आदरणीय काक साहब को जन्म दिन पर हार्दिक शुभकामनाएं। काक का जन्मजात नाम हरीश चंद्र शुक्ल (काक)  है। काक उनका बतौर कार्टूनिस्ट सिग्नेचर है।  

इनका जन्म 16 मार्च 1940 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव के गाँव पुरा में हुआ था। वह पेशे से भूतपूर्व मैकेनिकल इंजीनियर थे। काक जी के पिता, शोभा नाथ शुक्ला, एक स्वतंत्रता सेनानी थे।

अखबारों से सेवानिवृत्त होने के बाद  काक साहब आज भी लगातार कार्टून बना रहे हैं। गाहे-बगाहे अभी भी उनके पेज पर जाकर कार्टून देखता रहता हूं। हम उनके छोटे पर पक्के वाले पुराने फैन हैं। उनके स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी की हार्दिक मंगलकामनाएं।

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