ज्ञान, शोध और ‘सिमिलैरिटी’ का युग: एक बौद्धिक विडंबना

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डॉ. अमलेश पांडेय

दिल्ली। ज्ञान का यह नया युग सचमुच विचित्र है—इतना विचित्र कि यहाँ विचार की मौलिकता से अधिक मूल्य “सिमिलैरिटी इंडेक्स” का हो गया है। एक समय था जब शोध का अर्थ था—अज्ञात को जानने की जिज्ञासा, सत्य की खोज, और ज्ञान के विस्तार का संकल्प। पर आज अनेक स्थानों पर यह प्रक्रिया एक तकनीकी औपचारिकता में बदलती दिखाई देती है, जहाँ सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं रह गई कि आपने क्या नया सोचा, बल्कि यह हो गई है कि आपकी थीसिस में “plagiarism report” 10% से नीचे कैसे लाई जाए।
शोध की आत्मा बनाम तकनीकी औपचारिकता

शोध की मूल आत्मा जिज्ञासा है। यह वह आंतरिक बेचैनी है जो किसी व्यक्ति को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है—“क्यों?”, “कैसे?”, “क्या यह और बेहतर हो सकता है?”। किंतु वर्तमान समय में यह जिज्ञासा कई बार “paraphrasing tools” और “AI rewriters” के शोर में दब जाती है। शोधार्थी अब विचारों के स्रोत नहीं खोजता, बल्कि ऐसे साधनों की तलाश करता है जो पहले से उपलब्ध सामग्री को इस प्रकार बदल दें कि वह मौलिक प्रतीत हो।

यहाँ सबसे चिंताजनक बात केवल शोधार्थियों का व्यवहार नहीं है, बल्कि वह मौन स्वीकृति भी है जो कभी-कभी मार्गदर्शकों और संस्थानों की ओर से मिलती है। जब यह कहा जाता है कि “बस similarity कम कर दो, ज्ञान बाद में देख लेंगे”, तब यह केवल एक सलाह नहीं, बल्कि एक पूरी बौद्धिक संस्कृति के पतन का संकेत बन जाता है।

‘डिग्री प्रबंधन’ की उभरती संस्कृति

धीरे-धीरे विश्वविद्यालयों में एक नई संस्कृति आकार ले रही है—जहाँ शोध कम और “डिग्री प्रबंधन” अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें उद्देश्य ज्ञान का सृजन नहीं, बल्कि औपचारिकताओं को पूरा कर एक प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है।

जब किसी विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में थीसिस में समानता पाई जाती है, तो यह केवल एक सांख्यिकीय समस्या नहीं है। यह उस गहरे संकट का लक्षण है जिसमें शोध की प्रक्रिया अपनी आत्मा खो चुकी है। असली प्रश्न यह नहीं है कि similarity 20% है या 40%—असल प्रश्न यह है कि क्या शोध अब भी जिज्ञासा से उत्पन्न होता है, या केवल डिग्री की आवश्यकता से?

परंपरा से विचलन: तप से तकनीक तक

भारतीय ज्ञान परंपरा में शोध को तपस्या के समान माना गया है। यह एक लंबी, धैर्यपूर्ण और ईमानदार प्रक्रिया थी जिसमें शोधार्थी अपने विषय के साथ जीता था, उसे अनुभव करता था और अंततः उसमें कुछ नया जोड़ता था।

आज, कई मामलों में यह तपस्या “डाटा संकलन + paraphrasing + formatting” के एक यांत्रिक क्रम में बदलती जा रही है। ज्ञान की जगह “PDF” तैयार हो रही हैं—ऐसी PDF जो देखने में शोध लगती हैं, पर जिनमें विचारों की गहराई का अभाव होता है।

मशीन और मनुष्य: एक उलटती हुई भूमिका

सबसे गहरी विडंबना यह है कि जिस समय मशीनें मानव-सदृश लेखन सीख रही हैं, उसी समय मनुष्य मशीनों की तरह कॉपी-पेस्ट करने में अधिक दक्ष होता जा रहा है। यह एक विचित्र उलटाव है—

पहले मनुष्य सोचता था, मशीन गणना करती थी

अब मशीन लिखने लगी है, और मनुष्य “संपादन” करने लगा है

यह स्थिति केवल तकनीकी परिवर्तन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस बौद्धिक आलस्य का भी द्योतक है जो धीरे-धीरे हमारी शैक्षणिक संस्कृति में प्रवेश कर रहा है।
ज्ञान का भविष्य: संग्रह या सृजन?

यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो भविष्य में विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियाँ हजारों थीसिस से भर जाएँगी—पर वे थीसिस ज्ञान का भंडार नहीं होंगी, बल्कि एल्गोरिद्म की गूँज मात्र बनकर रह जाएँगी। वे पढ़ी नहीं जाएँगी, केवल संग्रहित रहेंगी।

इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि एक समय ऐसा भी आया जब मनुष्य के पास सूचना की कोई कमी नहीं थी, परंतु मौलिक विचारों का अभाव हो गया था। ज्ञान का उत्पादन तो हुआ, पर ज्ञान का सृजन नहीं।

समाधान की दिशा: पुनः जिज्ञासा की ओर

इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए केवल तकनीकी नियमों को सख्त करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता है—

शोध के उद्देश्य को पुनः परिभाषित करने की

मार्गदर्शकों की भूमिका को अधिक उत्तरदायी बनाने की

शोधार्थियों में जिज्ञासा और आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करने की

मूल्यांकन प्रणाली को केवल “similarity index” से आगे ले जाने की

जब तक हम शोध को केवल एक औपचारिक प्रक्रिया मानते रहेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। पर यदि हम इसे फिर से एक बौद्धिक यात्रा के रूप में देखना शुरू करें—जहाँ प्रश्न पूछना, संदेह करना और नया सोचना सबसे बड़ा मूल्य हो—तभी वास्तविक परिवर्तन संभव है।

अंततः, प्रश्न यह नहीं है कि तकनीक हमारे शोध को कैसे प्रभावित कर रही है; प्रश्न यह है कि हम तकनीक का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहे हैं। यदि उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना है, तो शोध एक औपचारिकता बन जाएगा। पर यदि उद्देश्य ज्ञान की खोज है, तो वही तकनीक एक शक्तिशाली साधन बन सकती है।

शायद अभी भी समय है यह तय करने का कि हम “थीसिस” बनाना चाहते हैं या “ज्ञान”।

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